पर्यावरण विज्ञानी डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने जीडीपी के साथ जीईपी को जरूरी बताया। झारखंड में पर्यावरणीय आकलन के लिए आईआईएम रांची से बातचीत और गांवों को पारिस्थितिक संरक्षण का श्रेय देने की पहल।
- नेपाल के जनकपुर से मेरठ तक 3,000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा; झारखंड में सकल पर्यावरण उत्पाद का आकलन कराने की पहल, आईआईएम रांची से होगी बातचीत
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
विकास का आकलन अब केवल आर्थिक तरक्की के आधार पर नहीं, बल्कि पर्यावरण की स्थिति को ध्यान में रखकर भी किया जाना चाहिए। किसी देश या राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत हुई, यह जानने के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आंकड़ा सामने रखा जाता है, लेकिन इस विकास की कीमत प्रकृति को कितनी चुकानी पड़ी, इसका हिसाब भी जरूरी है। इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए पर्यावरण विज्ञानी डॉ. अनिल प्रकाश जोशी नेपाल के जनकपुर से मेरठ तक साइकिल यात्रा पर निकले हैं। करीब 60 दिनों की इस यात्रा में लगभग 3,000 किलोमीटर की दूरी तय की जाएगी। नेपाल और भारत से होकर गुजरने वाली इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास के साथ पारिस्थितिकी के संरक्षण को भी नीतिगत प्राथमिकता दिलाना है।
देवघर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. जोशी ने कहा कि देश और राज्यों को जीडीपी के साथ सकल पर्यावरण उत्पाद यानी जीईपी (ग्रॉस एनवायरनमेंट प्रोडक्ट) का भी आकलन करना चाहिए। उनका मानना है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति की अनदेखी करके हासिल की गई आर्थिक प्रगति लंबे समय तक कायम नहीं रह सकती। यदि हवा, पानी, मिट्टी और जंगल सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो अंततः इसका नुकसान समाज, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन को ही उठाना पड़ेगा।

बाबाधाम देवघर मंदिर में पर्यावरण विज्ञानी डॉ. अनिल प्रकाश जोशी और दिलीप दुबे
प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत प्रवाह संस्था के संस्थापक दिलीप कुमार दुबे ने की। उन्होंने डॉ. जोशी का परिचय कराते हुए बताया कि पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से निकली यह यात्रा जनकपुर से शुरू होकर मेरठ में संपन्न होगी। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर लोगों की भागीदारी और पर्यावरण के प्रति उनकी जिज्ञासा उत्साहजनक है। जिस मार्ग से यात्रा गुजर रही है, वहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर इसके उद्देश्य को समझने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के विषय पर सोमवार को एक बड़ी संगोष्ठी आयोजित की जाएगी, जिसमें संथाल परगना के साहिबगंज, गोड्डा, पाकुड़, दुमका और देवघर सहित विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की भागीदारी रहेगी।
विकास की तस्वीर में पर्यावरण का हिसाब भी जरूरी
डॉ. जोशी ने कहा कि विकास की मौजूदा अवधारणा में एक बुनियादी कमी रह गई है। दुनिया ने आर्थिक तरक्की को मापने के लिए जीडीपी को महत्वपूर्ण मानक बनाया, लेकिन प्रकृति की स्थिति का आकलन उसी गंभीरता से नहीं किया गया। नतीजतन, कई बार आर्थिक विकास के आंकड़े तो बढ़ते दिखाई देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इस दौरान जंगल, जलस्रोत, मिट्टी और हवा की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ या कितनी गिरावट आई।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आगरा का पेठा, नागपुर का संतरा, बीकानेर का नमकीन और बिहार का मखाना अपने-अपने क्षेत्रों की आर्थिक पहचान हैं। इन उत्पादों के उत्पादन और कारोबार से लोगों को रोजगार मिलता है तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। लेकिन किसी उत्पाद की वास्तविक उपयोगिता और उसके दीर्घकालिक लाभ को समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि उसके उत्पादन से स्थानीय पर्यावरण को क्या लाभ या नुकसान हो रहा है।
डॉ. जोशी के अनुसार, जिस क्षेत्र में कृषि, बागवानी, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन होता है, वहां आर्थिक गतिविधियों के साथ पारिस्थितिकी को भी मजबूती मिल सकती है। इसके विपरीत, यदि उत्पादन और विकास की प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है, तो उसका नकारात्मक प्रभाव भविष्य की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए विकास की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितना उत्पादन हुआ या आय कितनी बढ़ी, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि प्रकृति की स्थिति कितनी बेहतर हुई। उन्होंने कहा कि आर्थिक मजबूती के साथ पारिस्थितिक मजबूती को जोड़ना समय की आवश्यकता है। यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन उसके प्राकृतिक संसाधन लगातार कमजोर हो रहे हैं, तो विकास की उस तस्वीर को पूरी तरह सकारात्मक नहीं कहा जा सकता।
जीईपी से पता चलेगा, विकास के साथ प्रकृति को कितना लाभ हुआ
डॉ. जोशी ने बताया कि सकल पर्यावरण उत्पाद यानी जीईपी का उद्देश्य पर्यावरण की स्थिति में आए बदलावों को मापना और उन्हें विकास की प्रक्रिया से जोड़ना है। इसके तहत मुख्य रूप से पेड़-पौधों और वन क्षेत्र की स्थिति, जल संरक्षण एवं स्वच्छ पानी की उपलब्धता, मिट्टी की गुणवत्ता और वायु की शुद्धता जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है। उनके अनुसार, यदि किसी वर्ष जीडीपी में वृद्धि होती है, तो उसी अवधि में यह भी देखा जाना चाहिए कि पर्यावरण की स्थिति में कितना सुधार हुआ। कितने पेड़ लगाए गए, जलस्रोतों को बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए, कितने लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया, मिट्टी को जैविक और उपजाऊ बनाने के लिए क्या प्रयास हुए तथा वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए कौन-से उपाय किए गए। इन सभी पहलुओं का आकलन विकास की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकता है।
डॉ. जोशी ने बताया कि उत्तराखंड में इस अवधारणा को आगे बढ़ाया गया है। उनके अनुसार, वहां वर्ष 2020 में जीईपी के आंकड़े सामने आने के बाद शासन-प्रशासन का ध्यान पर्यावरण की स्थिति की ओर गया। उन्होंने दावा किया कि शुरुआती आंकड़े सामने आने पर राज्य के सचिवालय और मुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने इस विषय को गंभीरता से लिया। इसके बाद सरकार ने पर्यावरण से जुड़े प्रयासों पर ध्यान केंद्रित किया और वर्ष 2026 में जीईपी से संबंधित नए आंकड़े घोषित किए। डॉ. जोशी के मुताबिक, उत्तराखंड में जीईपी का आंकड़ा शुरुआती 0.90 से बढ़कर 3.45 प्रतिशत तक पहुंचा है। उन्होंने इसे पर्यावरणीय उपलब्धियों के आकलन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति बताया। उनका तर्क है कि जिस तरह जीडीपी में गिरावट या वृद्धि होने पर सरकार और प्रशासन की सक्रियता बढ़ती है, उसी तरह जीईपी के आंकड़ों में बदलाव होने पर भी पर्यावरण को लेकर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जीडीपी के साथ जीईपी को भी महत्व मिलने लगे, तो सरकारों और समाज के सामने यह स्पष्ट होगा कि विकास के लिए अपनाई गई नीतियों का प्रकृति पर क्या असर पड़ रहा है। इससे पर्यावरण संरक्षण केवल भाषणों और अभियानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसे मापने, समझने और सुधारने का ठोस आधार मिलेगा।
झारखंड में जीईपी लागू कराने की पहल, आईआईएम रांची से होगी चर्चा
डॉ. जोशी ने झारखंड में भी जीईपी के आकलन की व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि झारखंड प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य है। यहां जंगल, नदियां, जमीन और खनिज संपदा मौजूद हैं। दूसरी ओर, राज्य खनन और उससे जुड़ी गतिविधियों का दबाव भी झेलता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आर्थिक गतिविधियों से होने वाले लाभ के साथ पर्यावरण को कितना नुकसान या लाभ हो रहा है। डॉ. जोशी ने बताया कि इस विषय पर आईआईएम रांची के साथ बातचीत की गई है। उन्होंने प्रवाह संस्था से इस पहल को आगे बढ़ाने का आग्रह किया है। उनकी अपेक्षा है कि संस्था आईआईएम रांची के साथ समन्वय स्थापित कर झारखंड में जीईपी के आकलन की दिशा में काम करे।
प्रवाह संस्था के संस्थापक दिलीप कुमार दुबे ने भी बताया कि इस विषय पर आगे की चर्चा के लिए रांची में बैठक आयोजित करने की योजना है, हालांकि बैठक की तारीख अभी तय नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि संस्था इस दिशा में काम कर रही है। देवघर में आयोजित होने वाली संगोष्ठी में भी पर्यावरण संरक्षण और जीईपी की अवधारणा पर लोगों के साथ चर्चा की जाएगी।
डॉ. जोशी ने प्रवाह संस्था के साथ अपने पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह संस्था की कार्यशैली से प्रभावित हैं। उन्होंने बताया कि इसी भरोसे के आधार पर उन्होंने यात्रा में सहयोग के लिए संस्था से संपर्क किया था। उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण के इस विचार को आगे बढ़ाने में सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और स्थानीय समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
प्रकृति को बचाना ही नहीं, खुद को बचाना भी है जरूरी
साइकिल यात्रा के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि इसे केवल प्रकृति को बचाने का अभियान समझना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तव में यह मनुष्य के अस्तित्व और भविष्य को सुरक्षित रखने की कोशिश है। मनुष्य अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी, हवा, मिट्टी, जंगल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। यदि इन संसाधनों का लगातार दोहन होता रहा और उनके संरक्षण की चिंता नहीं की गई, तो इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि प्रकृति किसी धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव नहीं करती। पेड़, नदियां, मिट्टी और पानी सभी को समान रूप से जीवन का आधार प्रदान करते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण भी किसी एक वर्ग या समुदाय का विषय नहीं, बल्कि सभी लोगों की साझा जिम्मेदारी है। डॉ. जोशी ने चेतावनी दी कि प्रकृति के संसाधनों का इस्तेमाल करते समय मनुष्य को अपनी सीमाएं तय करनी होंगी। यदि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बिना किसी नियंत्रण और दूरदर्शिता के जारी रहा, तो भविष्य में संकट गहरा सकता है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाने का अंतिम परिणाम मनुष्य को ही भुगतना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि दुनिया को केवल अर्थव्यवस्था के पीछे नहीं भागना चाहिए। अर्थव्यवस्था से जीवन की सुविधाएं और समृद्धि हासिल की जा सकती है, लेकिन जीवन को सुरक्षित रखने के लिए पारिस्थितिकी की रक्षा जरूरी है। यही कारण है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।
पर्यावरण संरक्षण को राजनीतिक एजेंडे में शामिल करने की जरूरत
डॉ. जोशी के अनुसार, पर्यावरण संरक्षण के प्रयास तब अधिक प्रभावी होंगे, जब यह विषय आम लोगों की चिंता के साथ-साथ राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बनेगा। आज चुनावी और राजनीतिक चर्चाओं में अक्सर सड़क, भवन, उद्योग, रोजगार और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर जोर दिया जाता है। इनकी जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन हवा की गुणवत्ता, जलस्रोतों की स्थिति, जंगलों का विस्तार और मिट्टी की उर्वरता भी विकास के महत्वपूर्ण पैमाने बनने चाहिए। उन्होंने कहा कि जब गांव, शहर और समाज के विभिन्न वर्ग पर्यावरण को लेकर संगठित आवाज उठाएंगे, तब सरकारों के लिए भी इस दिशा में ठोस कदम उठाना जरूरी होगा। सरकारें समाज से ही बनती हैं और जनहित के मुद्दों को गंभीरता से लेने पर व्यापक बदलाव संभव है।
उनका मानना है कि यह यात्रा केवल आम लोगों के लिए नहीं है। इसके माध्यम से राजनीतिक वर्ग, उद्योगपतियों, सामाजिक संगठनों और नीति-निर्माताओं तक भी पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। यात्रा के दौरान सामने आने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर रिपोर्ट तैयार की जा रही है, जिसे संबंधित सरकारों के साथ साझा किया जाएगा। डॉ. जोशी ने कहा कि पर्यावरण की स्थिति में बदलाव को यदि आंकड़ों के साथ सामने रखा जाए, तो उस पर जवाबदही तय करना आसान होगा। जीईपी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
गांवों को मिले पारिस्थितिक संरक्षण का श्रेय
डॉ. जोशी ने पर्यावरण संरक्षण में गांवों की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जंगल, नदियां, तालाब, कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा है। गांव न केवल देश को अनाज, फल और अन्य कृषि उत्पाद उपलब्ध कराते हैं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिक संतुलन के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, दिल्ली, पटना या दूसरे बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक जंगल विकसित करना आसान नहीं है। जंगलों, जलस्रोतों और भूमि के संरक्षण की व्यापक संभावनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। इसलिए गांवों को केवल कृषि उत्पादन की इकाई के रूप में देखने के बजाय पारिस्थितिकी के केंद्र के रूप में भी पहचान दी जानी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई गांव अपने प्रयासों से जंगल बचाता है, पेड़ लगाता है, जलस्रोतों का संरक्षण करता है और प्राकृतिक संसाधनों को बेहतर स्थिति में बनाए रखता है, तो उसे इसका श्रेय क्यों नहीं मिलना चाहिए? जिस तरह कार्बन क्रेडिट की चर्चा होती है, उसी तरह पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने वाले गांवों के लिए पारिस्थितिक क्रेडिट की अवधारणा पर भी विचार किया जा सकता है। डॉ. जोशी ने बांका के जंगलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां के लोगों को अपने क्षेत्र में जंगल बचाए रखने पर गर्व है। उन्होंने इसे सकारात्मक उदाहरण बताया और कहा कि यदि ऐसे प्रयासों को व्यवस्थित रूप से दर्ज किया जाए तथा जीईपी जैसे आकलन से जोड़ा जाए, तो विभिन्न क्षेत्रों के बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विकसित हो सकती है। इससे जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए लोगों को प्रोत्साहन मिलेगा तथा उनके क्षेत्र की पहचान भी मजबूत होगी।
उनके अनुसार, गांवों को पारिस्थितिक संरक्षण में उनके योगदान का उचित श्रेय देना समय की जरूरत है। इससे ग्रामीण समुदायों को यह महसूस होगा कि प्रकृति की रक्षा करना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक महत्व का काम भी है।
बिहार और झारखंड में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता देखकर प्रभावित
डॉ. जोशी ने यात्रा के दौरान बिहार और झारखंड में लोगों के व्यवहार और पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करने के अनुभव के आधार पर उन्हें इन दोनों राज्यों में प्रकृति के प्रति लोगों की संवेदनशीलता देखने को मिली है। उन्होंने कोसी की बाढ़ और नदियों तथा जंगलों से जुड़े स्थानीय सवालों का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों की चिंता है। जरूरत इस बात की है कि यह चिंता संगठित होकर व्यापक जनभागीदारी और प्रभावी पहल का रूप ले।
डॉ. जोशी ने कहा कि यात्रा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना, पर्यावरण के महत्व को समझाना और प्रकृति से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक संवाद तैयार करना है। यदि स्थानीय समुदाय, सामाजिक संगठन और सरकारें मिलकर काम करें, तो पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिल सकती है।
बिहार के मुख्यमंत्री से मुलाकात की उम्मीद
डॉ. जोशी ने बताया कि यात्रा के अगले चरण में सिमुलतला, जमुई और लखीसराय होते हुए पटना पहुंचने की योजना है। पटना में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की कोशिश की जा रही है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री से मिलने के संबंध में सकारात्मक संकेत मिले हैं और परिस्थितियां अनुकूल रहने पर 18 अक्टूबर को मुलाकात संभव है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक कार्यक्रमों के कारण मुलाकात की अंतिम स्थिति अलग हो सकती है। डॉ. जोशी ने कहा कि वह मुख्यमंत्री के समक्ष जीईपी की अवधारणा और बिहार में इसके आकलन की संभावनाओं पर चर्चा करना चाहते हैं। इसके अलावा उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा से भी मिलने का प्रयास किया जाएगा। उनका उद्देश्य राज्य सरकारों को पर्यावरणीय उपलब्धियों और चुनौतियों के आकलन के प्रति जिम्मेदार बनाना है।
उन्होंने प्रवाह संस्था के संस्थापक दिलीप कुमार दुबे से झारखंड के मुख्यमंत्री को इस विषय पर पत्र लिखने का आग्रह भी किया, ताकि राज्य में जीईपी को लेकर नीतिगत चर्चा आगे बढ़ सके।
मेरठ में होगा यात्रा का समापन
डॉ. जोशी ने बताया कि मेरठ में यात्रा के समापन समारोह की तैयारियां स्थानीय स्तर पर की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि समापन कार्यक्रम का स्वरूप आयोजकों ने तय करना है। पिछली यात्रा के अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालयों, उद्योग जगत और विभिन्न लोगों ने अभियान में सहयोग दिया था। इस बार भी पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी नीतियों और प्रयासों से जुड़े लोगों को आमंत्रित करने की योजना है। उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में सामने आने वाले पर्यावरणीय मुद्दों और अनुभवों का संकलन किया जा रहा है। इनसे संबंधित रिपोर्ट सरकारों के साथ साझा की जाएगी, ताकि जमीनी स्तर पर सामने आई चुनौतियों और संभावनाओं को नीति निर्माण में जगह मिल सके।
डॉ. जोशी का संदेश स्पष्ट है कि विकास की जरूरतों से समझौता किए बिना प्रकृति के संरक्षण को भी उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी। जीडीपी आर्थिक समृद्धि की तस्वीर प्रस्तुत करती है, जबकि जीईपी पर्यावरण की स्थिति को समझने का आधार बन सकती है। यदि दोनों को साथ रखकर विकास का मूल्यांकन किया जाए, तो सरकारों और समाज को यह तय करने में मदद मिलेगी कि प्रगति की दिशा कितनी टिकाऊ है। नेपाल के जनकपुर से मेरठ तक निकली यह साइकिल यात्रा इसी सोच को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है। इसके केंद्र में केवल पेड़-पौधों और जंगलों को बचाने का सवाल नहीं, बल्कि मानव जीवन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने की चिंता भी है।