एक था श्रीप्रकाश शुक्ला



नई दिल्ली। 22 सितंबर 1998... दोपहर के करीब दो बजे। उत्तर प्रदेश पुलिस का सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका गैंगस्टर श्री प्रकाश शुक्ला अपनी नीली डेवू सिएलो कार से दिल्ली की ओर बढ़ रहा था। उसे शायद अंदाजा नहीं था कि आगे कुछ किलोमीटर की दूरी पर मौत उसका इंतजार कर रही है।

यह वही श्री प्रकाश शुक्ला था, जिसके नाम से उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली तक के कारोबारी, ठेकेदार और नेता खौफ खाते थे। पुलिस का दावा था कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी तक ले ली थी। इसके बाद उसे पकड़ना उत्तर प्रदेश एसटीएफ का सबसे बड़ा मिशन बन गया था।

एक फोन कॉल ने बदल दी पूरी कहानी

टीवी शो 'इंडियाज मोस्ट वांटेड' के निर्माता और एंकर सुहैब इलियासी के अनुसार, 21 सितंबर 1998 को उन्हें एक गुमनाम फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि श्री प्रकाश शुक्ला अपने साथियों के साथ गाजियाबाद में एक नीली डेवू सिएलो कार में देखा गया है। कार का नंबर तक बताया गया। यह सूचना तत्काल उत्तर प्रदेश एसटीएफ और दिल्ली पुलिस को दे दी गई। इससे पहले भी 10 सितंबर को ऐसी ही सूचना मिली थी, लेकिन तब वह पुलिस के हाथ नहीं लगा था।

प्रेमिका से मुलाकात... फिर एयरपोर्ट जाने की तैयारी

पुलिस की जांच के अनुसार, श्री प्रकाश शुक्ला उस समय दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में छिपा हुआ था। 22 सितंबर को वह अपनी प्रेमिका से मिलने गाजियाबाद गया। वहां से लौटने के बाद उसकी योजना पालम एयरपोर्ट पहुंचने और फिर रांची निकलने की थी, जहां उसका सुरक्षित ठिकाना माना जाता था।

मोहन नगर फ्लाईओवर पर बिछ चुका था जाल

एसटीएफ ने उसके लौटने के रास्ते पर पहले से जाल बिछा दिया था। पांच पुलिस टीमें अलग-अलग गाड़ियों में मोहन नगर फ्लाईओवर के आसपास तैनात थीं। दोपहर करीब 1:50 बजे जैसे ही नीली सिएलो दिखाई दी, पुलिस सतर्क हो गई। कार स्वयं श्री प्रकाश शुक्ला चला रहा था। उसके साथ आगे की सीट पर अनुज प्रताप सिंह और पीछे सुधीर त्रिपाठी बैठा था।

बच निकलने की कोशिश... और फिर शुरू हुई गोलीबारी

पुलिस ने कार रोकने का संकेत दिया, लेकिन श्री प्रकाश शुक्ला ने ब्रेक लगाने के बजाय एक्सीलेटर दबा दिया। उसने दो पुलिस वाहनों को चकमा देने की कोशिश की और कार को दूसरी दिशा में मोड़ दिया। इसके बाद पुलिस ने उसे चारों ओर से घेर लिया। कुछ ही सेकंड में दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। मुठभेड़ ज्यादा देर नहीं चली। घायल अवस्था में श्री प्रकाश शुक्ला और उसके दोनों साथियों को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

पहली गोली किसने चलाई थी?

यह सवाल आज भी लोगों के मन में उठता है। हालांकि उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड और उस समय की मीडिया रिपोर्टों में यह कहीं दर्ज नहीं है कि पहली गोली किस पुलिस अधिकारी ने चलाई थी या किस हथियार से चलाई गई थी। एसटीएफ ने केवल इतना बताया था कि पुलिस और अपराधियों के बीच गोलीबारी हुई, जिसमें तीनों अपराधी मारे गए। इसलिए किसी एक अधिकारी के नाम का दावा करना उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।

उस दिन AK-47 भी नहीं थी

पुलिस के मुताबिक, श्री प्रकाश शुक्ला आमतौर पर AK-47 राइफल लेकर चलता था, लेकिन 22 सितंबर को उसके पास केवल दो .38 बोर की रिवॉल्वर थीं। मुठभेड़ के बाद इन्हीं हथियारों के साथ कुछ कारतूस और नकदी बरामद की गई।

एक मुठभेड़ जिसने बदल दिया अपराध का इतिहास

श्री प्रकाश शुक्ला की मौत केवल एक गैंगस्टर का अंत नहीं थी। इसे उत्तर प्रदेश एसटीएफ की शुरुआती सबसे बड़ी सफलताओं में गिना गया। इस ऑपरेशन के बाद एसटीएफ की कार्यशैली, खुफिया नेटवर्क और तकनीकी निगरानी की पूरे देश में चर्चा हुई। बाद के वर्षों में उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ चलाए गए अभियानों में इस ऑपरेशन को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया।