झारखंड का संथाल परगना क्षेत्र, जहाँ की भौगोलिक स्थिति और बंजर भूमि कभी विकास के मार्ग में रोड़ा बनी हुई थी, आज वहाँ जल संरक्षण, जैविक खेती और जनजातीय सशक्तिकरण की एक नई क्रांति देखने को मिल रही है। इस बदलाव की नींव रखी देवघर की प्रतिष्ठित संस्था 'प्रवाह' (PRAVAH - Society for National Integration and Rural Development) और इसके दूरदर्शी संस्थापक श्री दिलीप कुमार दुबे जी ने।
समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर जमीनी स्तर पर दशकों तक काम करने वाले दिलीप दुबे जी ने पारंपरिक जल स्रोतों (आहर-पइन, तालाब) को पुनर्जीवित कर हजारों हेक्टेयर भूमि को उपजाऊ बनाया है। 'कंचन क्रांति के लिए तरुण कुमार कंचन ने श्री दिलीप दुबे जी से उनके इस तीन दशकों के प्रेरणादायक सफर, हरित क्रांति के दुष्परिणामों, पहाड़िया जनजाति के विकास और भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों पर एक विस्तृत व गंभीर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष बातचीत के मुख्य अंश:
समता युवजन सभा से 'प्रवाह' तक की यात्रा
दिलीप जी, आपने सामाजिक कार्य की शुरुआत कैसे की और 'प्रवाह' की स्थापना का विचार कैसे आया?
'प्रवाह' शुरू करने से पहले हम गांधी, लोहिया और जयप्रकाश नारायण (JP) की विचारधारा पर आधारित समाजवादी संगठन 'समता युवजन सभा' से जुड़े थे। हमारा मानना था कि गाँवों में सघन क्षेत्र बनाकर लोगों की जनसमस्याओं से जुड़ना चाहिए। इसी क्रम में हमने देवघर के मोहनपुर प्रखंड के पचरुखी गाँव में अपना बेस बनाया।
वहाँ हमने देखा कि संथाल परगना की केवल 30% भूमि ही उपजाऊ थी, जबकि 70% बंजर/यूजलेस जमीन थी, जिसे स्थानीय भाषा में 'डंगाल पट्टी' कहा जाता है। झारखंड में सालाना 1200 से 1400 मिमी वर्षा होने के बावजूद दो-तिहाई पानी बहकर बंगाल की खाड़ी में चला जाता था। जल संरक्षण और मिट्टी में नमी (Moisture) बढ़ाए बिना खेती संभव नहीं थी। सरकारी स्तर पर प्रक्रिया काफी धीमी लगी, इसलिए हमने 1992 में 'प्रवाह' नामक संस्था का गठन किया ताकि बंजर भूमि और जल संकट पर सीधे काम किया जा सके।
जल संरक्षण तकनीक और पारंपरिक स्रोतों का पुनरुद्धार
आपने पारंपरिक जल संरक्षण, विशेषकर आहर-पइन और तालाबों पर बहुत काम किया है। अब बदलते मौसम चक्र के बीच आपकी क्या रणनीति है?
संथाल परगना की मूल समस्या यह है कि हम भूजल (Groundwater) का केवल दोहन कर रहे हैं- डीप बोरिंग, फैक्ट्रियां और अपार्टमेंट्स से पानी निकाला तो जा रहा है, लेकिन रीचार्ज नहीं हो रहा। हमारे पारंपरिक तालाब और जलस्रोत खत्म किए जा रहे हैं। जब तक जल का संरक्षण नहीं होगा, पानी की उपलब्धता संभव नहीं है।
इसके साथ ही, हम किसानों को 'उपलब्ध पानी के अनुसार बीज और फसल के चयन' की सलाह देते हैं। यदि पानी कम है और हम गन्ना या गेहूं जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलें लगाएंगे, तो संकट और गहराएगा।
उपलब्धि: प्रवाह ने अब तक अपने सफर में लगभग 2,500 तालाब (Ponds) बनवाए हैं। इसके अलावा 10,000 हेक्टेयर जमीन में वर्षा जल को रोकने के लिए हमने 'Trench Cum Bund' (ट्रेंच सह बंड) तकनीक विकसित और प्रयोग की है। हमने खूंटी, जरमुंडी, जामा, पाकुड़, गोड्डा और साहेबगंज में व्यापक जल संरक्षण कार्य किया है।
पलायन पर रोक और पहाड़िया जनजाति (PVTG) का सशक्तिकरण
जमीनी स्तर पर काम करते हुए आपने संथाल परगना में सबसे बड़ी समस्या क्या पाई?
यहाँ की सबसे बड़ी समस्या आजीविका (Livelihood) की है। आजीविका न होने के कारण लोग मिजोरम, नागालैंड, श्रीनगर, लद्दाख या दक्षिण भारत तक पलायन (Migrate) करते हैं। यह पलायन सुरक्षित नहीं है। कई बार मजदूरों की सिर्फ लाशें वापस आती हैं। यदि स्थानीय स्तर पर आजीविका सुनिश्चित कर दी जाए, तो पलायन रुक जाएगा।
इस पलायन को रोकने के लिए 'प्रवाह' ने क्या प्रयास किए हैं?
हमने पारम्परिक संस्कृतियों और स्थानीय संसाधनों को पुनर्जीवित करने का काम किया है। उदाहरण के लिए, पाकुड़ जिले में रहने वाले अत्यंत संवेदनशील और निर्धन पहाड़िया जनजाति (PVTG - Particularly Vulnerable Tribal Groups) के करीब 1,200 परिवारों (लिट्टीपाड़ा क्षेत्र) के साथ हम काम कर रहे हैं।
उनकी जीवनशैली को समझकर हमने पाया कि केवल जंगल के भरोसे जीवन नहीं चल सकता। इसलिए हमने उनके लिए लाइवस्टॉक (बकरी पालन, सूअर पालन, मुर्गी व बत्तख पालन) और लघु वन उपज (Minor Forest Produce) के संग्रहण व वैल्यू एडिशन (Value Addition) पर काम किया। इससे उनकी आय में अप्रत्याशित सुधार आया है।
हरित क्रांति पर सवाल और जैविक कृषि की ओर वापसी
आपने बातचीत में कहा कि हरित क्रांति से हमारी जमीन बंजर हुई है, जबकि देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ था। आप ऐसा क्यों मानते हैं?
1960 के दशक में एम. एस. स्वामीनाथन जी के नेतृत्व में आई हरित क्रांति का उद्देश्य बढ़ती आबादी को भोजन देना था, जो उस समय सही कदम लगा। लेकिन इसके रासायनिक मॉडल्स ने हमारी मिट्टी, पानी और हवा को जहरीला बना दिया। आप पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के हालात देख लीजिए।
स्वयं स्वामीनाथन जी ने बाद में स्वीकार किया था कि प्राकृतिक संतुलन को नजरअंदाज करना भूल थी और उन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में जैविक खेती का समर्थन किया। उनके फाउंडेशन से भी हमारा जुड़ाव रहा है।'प्रवाह' स्थापना के समय से ही जैविक कृषि की पक्षधर रही है। वर्तमान में हम सोनारायठाढ़ी प्रखंड के 42 गाँवों में जैविक खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System) पर काम कर रहे हैं। अत्यधिक केमिकल के प्रयोग से हमारे खेतों का प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो गया है, जहाँ कभी खेतों में मछलियाँ, केकड़े और प्राकृतिक केंचुए तैरते थे, आज वे गायब हैं। हम प्राकृतिक केंचुओं और जैविक विधियों से मिट्टी की उर्वरा शक्ति लौटाने में लगे हैं।
कुपोषण, अंधविश्वास और स्वास्थ्य सुधार

जनजातीय क्षेत्रों में अंधविश्वास और कुपोषण की गहरी समस्याएँ हैं। इस दिशा में प्रवाह का क्या दृष्टिकोण रहा है?
अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता : डायन-बिसाही या भूत-प्रेत जैसे भ्रमों के खिलाफ हम निरंतर जनजागृति अभियान चलाते हैं और उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण समझाते हैं। उन्हें बताते हैं कि यह सब भ्रम है। हमें भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।
कुपोषण और एनीमिया से लड़ाई : बच्चों में कुपोषण और महिलाओं में एनीमिया को दूर करने के लिए हमने 'किचन गार्डन' (पोषण वाटिका) की अवधारणा को लागू किया। आदिवासी समाज में सब्जी का मतलब केवल 'आलू' माना जाता था। हमने उनके व्यवहार में बदलाव (Behavioral Change) लाकर किचन गार्डन में 12-13 प्रकार की हरी सब्जियों, सहजन (मोरिंगा), अमरूद, पपीता और नींबू की खेती को बढ़ावा दिया। आज इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि बाल मृत्यु दर और बीमारियों में भारी कमी आई है।
भविष्य की योजनाएं और डिजिटल मीडिया की भूमिका
भविष्य के लिए 'प्रवाह' की क्या मुख्य रणनीति है?
आज देश और दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की है। तापमान 46°C के पार जा रहा है, आद्रा नक्षत्र बीत जाने पर भी समय पर बारिश और खेती शुरू नहीं हो पा रही है। संस्था के गवर्निंग बोर्ड ने यह तय किया है कि अगले 5 वर्षों तक हमारा मुख्य फोकस 'क्लाइमेट चेंज' और जल-जंगल-जमीन-जानवर तथा जैव विविधता के संरक्षण पर रहेगा।
एक अंतिम सवाल—आज के दौर में ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल मीडिया का क्या प्रभाव है?
गाँवों में प्रिंट मीडिया की तुलना में डिजिटल/मोबाइल मीडिया का प्रभाव बहुत अधिक है। जब हम 1,500-2,000 फीट ऊंचे पहाड़ों पर पहाड़िया युवाओं से मिलते हैं, तो वे भी यूट्यूब पर जानकारी देख रहे होते हैं। यदि इस डिजिटल मीडिया का सही, सकारात्मक और उपयोगी उपयोग किया जाए, तो यह सामाजिक परिवर्तन का बहुत बड़ा माध्यम बन सकता है।
श्री दिलीप दुबे जी, समाज और पर्यावरण के लिए आपके इस अतुलनीय योगदान और महत्वपूर्ण विचारों के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!
