दिन में 10 घंटे देश की सेवा और रात भर जागकर की BPSC की तैयारी! देवघर, जसीडीह के रतनपुर गांव के एक किसान के बेटे रमेश कुमार ने 70वीं BPSC में 285वीं रैंक लाकर रचा इतिहास। जानिए एक ग्रामीण युवा के संघर्ष और सफलता की बेहद भावुक कर देने वाली कहानी।

 

कंचनक्रांति ब्यूरो / देवघर।

कहते हैं कि जब इरादों में फौलाद और सपनों में सच्चाई हो, तो किस्मत को भी झुकना पड़ता है। देवघर के जसीडीह प्रखंड के एक छोटे से गांव रतनपुर की मिट्टी ने आज देश को एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास कराया है। यहां के रहने वाले रमेश कुमार ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक, 70वीं बीपीएससी (BPSC) में 285वीं रैंक हासिल कर सफलता का एक ऐसा परचम लहराया है, जिसने पूरे इलाके को गर्व से सराबोर कर दिया है।

यह कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं है। यह कहानी है उस संघर्ष की, जो दिन की धूप में फर्ज निभाता है और रात के अंधेरे में सुनहरे कल की इबारत लिखता है।


किसान का बेटा, जो परिस्थितियों से कभी नहीं हारा

रमेश कुमार वर्तमान में पटियाला आर्मी कैंट में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के पद पर देश की सेवा कर रहे हैं। उनके पिता बाबूलाल पंडित एक साधारण किसान हैं, जिन्होंने तंगहाली के बीच भी अपने बच्चों के सपनों को कभी मुरझाने नहीं दिया। मां रंभा देवी ने संस्कारों की जो खाद दी, उसी का परिणाम है कि आज रतनपुर गांव का एक बेटा अधिकारी बनने जा रहा है। रमेश ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा देवघर के संत अरविंदो स्कूल से पूरी की। ग्रामीण परिवेश की पाबंदियां और सीमित संसाधन भी रमेश की उड़ानों को बांध नहीं सके।


दिन में देश की सेवा, रात में सपनों की 'अथक' तैयारी

एक शादीशुदा पुरुष और सरकारी कर्मचारी के लिए पढ़ाई के लिए वक्त निकालना किसी चुनौती से कम नहीं होता। रमेश के कंधे पर दिन में 8 से 10 घंटे की नौकरी का तनाव था और मन में परिवार की जिम्मेदारियां। लेकिन जब दुनिया सोती थी, तब रमेश अपनी किताबों के साथ जागते थे। रात-रात भर जागकर की गई इस तपस्या में उनके आंसुओं, थकान और उम्मीदों की कहानी छिपी है।

रमेश अपनी सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने माता-पिता, गुरुजनों और विशेषकर अपनी पत्नी के अटूट सहयोग को देते हैं, जो हर मुश्किल घड़ी में उनकी ढाल बनकर खड़ी रहीं।

रमेश कुमार कहते हैं, परिस्थितियां कभी आपकी मंजिल तय नहीं करतीं, बल्कि आपका संघर्ष आपकी पहचान लिखता है। जिम्मेदारियां कभी भी सपनों का रास्ता नहीं रोक सकतीं, बशर्ते आप थककर रुकना न सीखें।



गांव में दिवाली जैसा जश्न, युवाओं के लिए बने रोल मॉडल

रमेश की इस ऐतिहासिक सफलता की खबर जैसे ही रतनपुर गांव पहुंची, पूरा इलाका झूम उठा। पिता की आंखों से बहते खुशी के आंसू और मां का गर्व से चौड़ा हुआ सीना यह बयां कर रहा था कि उनके बेटे ने कितनी बड़ी जंग जीती है। गांव में मिठाई बांटने और जश्न का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। रमेश कुमार की यह सफलता आज उन लाखों ग्रामीण युवाओं के लिए एक मशाल बन गई है, जो नौकरी और जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने सपनों को दबा देते हैं।

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