देवघर एम्स में आई बैंक और कॉर्निया ट्रांसप्लांट यूनिट की स्थापना के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा गया है। अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद और इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम शुरू। अब आंखों के इलाज के लिए नहीं जाना पड़ेगा दिल्ली-चेन्नई।
कंचनक्रांति डेस्क , देवघर : झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बेहद राहत भरी खबर है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (देवघर एम्स) में जल्द ही 'आई बैंक' (Eye Bank) और कॉर्निया ट्रांसप्लांट (नेत्र प्रत्यारोपण) की अत्याधुनिक सुविधा शुरू होने जा रही है। इस मील के पत्थर के बाद अब इस पूरे क्षेत्र के मरीजों को अपनी आंखों की रोशनी वापस पाने या किसी भी जटिल नेत्र ऑपरेशन के लिए दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई या हैदराबाद जैसे दूरदराज के महानगरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। उन्हें यह विश्वस्तरीय और विशेष चिकित्सा सुविधा अब देवघर में ही सुलभ हो सकेगी।
मंत्रालय को भेजा गया फाइनल प्रस्ताव
देवघर एम्स के निदेशक डॉ. नितिन गंगने ने आई बैंक और कॉर्निया ट्रांसप्लांट यूनिट की स्थापना से जुड़ा एक विस्तृत और व्यावहारिक प्रस्ताव तैयार कर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को मंजूरी के लिए भेज दिया है। एम्स प्रशासन इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है और संबंधित नियामक संस्थाओं (Regulatory Bodies) से आवश्यक लाइसेंस व अनुमति लेने की प्रक्रिया भी समानांतर रूप से शुरू कर दी गई है।
क्या होता है आई बैंक और कैसे काम करता है ट्रांसप्लांट?
आम जनता में नेत्र प्रत्यारोपण को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। इस पर स्पष्टता देते हुए निदेशक डॉ. नितिन गंगने ने बताया कि आई बैंक वह विशिष्ट केंद्र होता है, जहां नेत्रदान करने वाले मृत व्यक्ति की आंखों से निकाले गए 'कॉर्निया' को सुरक्षित रखा जाता है। लोगों को लगता है कि पूरी आंख का प्रत्यारोपण होता है, जबकि असलियत यह है कि आंख का केवल सामने वाला पारदर्शी हिस्सा, जिसे विज्ञान की भाषा में कॉर्निया कहते हैं, उसे ही बदला जाता है।
अक्सर गंभीर संक्रमण (Infection), किसी दुर्घटना या चोट लगने, जलने, गंभीर बीमारी या कई मामलों में जन्मजात विकृति के कारण मरीजों का कॉर्निया पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे उनकी आंखों की रोशनी चली जाती है। ऐसी स्थिति में दानदाता (Donor) के स्वस्थ कॉर्निया को माइक्रो-सर्जरी के जरिए मरीज की आंख में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इस सफल सर्जरी के बाद अंधकारमय जीवन जी रहे मरीजों की आंखों की दृष्टि पूरी तरह वापस लौट आती है और वे एक सामान्य व आत्मनिर्भर जीवन जी सकते हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर और अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद शुरू
देवघर एम्स में इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। आई बैंक के लिए एक समर्पित अलग विभाग, कॉर्निया संरक्षण कक्ष (Cornea Preservation Room), आधुनिक प्रयोगशाला (Laboratory) और टिशू प्रोसेसिंग एरिया तैयार किया जा रहा है।
इसके साथ ही, उच्च गुणवत्ता वाले कॉर्निया की सटीक जांच और सर्जरी के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक के उपकरणों की खरीद प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। इसके तहत:
· आधुनिक सर्जिकल माइक्रोस्कोप (Microscopes)
· स्लिट लैंप और बायो-माइक्रोस्कोप (Slit Lamp & Bio-microscope)
· मेडिकल रेफ्रिजरेटर (कॉर्निया को निर्धारित कम तापमान पर सुरक्षित रखने के लिए)
· शत-प्रतिशत संक्रमण मुक्त वातावरण सुनिश्चित करने के लिए 'लैमिनार एयर फ्लो सिस्टम' (Laminar Air Flow System)
· माइक्रो-सर्जरी से जुड़े अन्य एडवांस मेडिकल टूल्स शामिल हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों और रेस्क्यू टीम की होगी तैनाती
आई बैंक और ट्रांसप्लांट यूनिट के सुचारू संचालन के लिए एम्स में मानव संसाधन को मजबूत किया जा रहा है। इसके लिए विशेष रूप से कॉर्निया और नेत्र रोग विशेषज्ञ (Cornea Specialists), प्रशिक्षित लैब टेक्नीशियन, नर्सिंग स्टाफ और एक समर्पित क्विक-रिस्पॉन्स टीम की नियुक्ति की जाएगी। यह विशेष टीम नेत्रदान की सूचना मिलते ही तत्काल मौके पर पहुंचकर कॉर्निया निकालने (Cornea Retrieval) का कार्य पूरी संवेदनशीलता के साथ करेगी।
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