- करीब 600 वर्ष पुराने मंदिर में सप्तमी पर झाड़ू, पावड़ा और दंड की अनूठी परंपरा; बिल्व निमंत्रण को लेकर भी विशेष तैयारी
जितेंद्र कुमार दुबे, गोड्डा।
शारदीय नवरात्र की महासप्तमी पर गोड्डा जिले के महागामा स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर में आस्था का अनूठा दृश्य देखने को मिला। सुबह-सुबह मंदिर परिसर में झाड़ू लगाने के लिए महिला और पुरुष श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। सैकड़ों की संख्या में भक्त अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। इस दौरान मंदिर परिसर माता के जयकारों और भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। यहां की सबसे खास बात यह है कि परंपरा के अनुसार श्रद्धालु अरहर की हरी डाली से झाड़ू लगाते हैं। सदियों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा में शामिल होने के लिए दूर-दराज के इलाकों से भी लोग महागामा पहुंचते हैं।
महागामा प्रखंड मुख्यालय स्थित यह प्राचीन दुर्गा मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा-पद्धति और लोक-आस्था के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है और इसे करीब 600 वर्ष पुराना शक्तिपीठ माना जाता है। राजशाही के दौर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार तत्कालीन राजा-महाराजा युद्ध पर जाने से पहले शक्ति की देवी की आराधना करते थे और माता का आशीर्वाद प्राप्त कर रणक्षेत्र के लिए प्रस्थान करते थे। जनश्रुतियों के मुताबिक, मंदिर का निर्माण तत्कालीन राजा ने कराया था। हालांकि, मंदिर में पूजा की शुरुआत किस राजा ने की थी, इसका कोई प्रमाणिक लिखित विवरण उपलब्ध नहीं है।
झाड़ू, पावड़ा और दंड की अनूठी परंपरा
महागामा के प्राचीन दुर्गा मंदिर में महासप्तमी के अवसर पर झाड़ू लगाने, पावड़ा यानी फावड़ा लेकर पहुंचने और दंडवत प्रणाम करने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। यह अनुष्ठान स्थानीय धार्मिक मान्यताओं, लोक-संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक है। श्रद्धालु माता के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने और मन्नतें पूरी होने पर आभार प्रकट करने के लिए इस परंपरा में हिस्सा लेते हैं।
इस अनुष्ठान में झाड़ू और पावड़ा को श्रम, स्वच्छता तथा सेवा-भाव से जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर और आसपास की व्यवस्था से संबंधित पारंपरिक सेवा में भाग लेते हैं। वहीं, दंडवत प्रणाम करने वाले भक्त अपनी मनोकामना और श्रद्धा के अनुरूप माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। अरहर की हरी डाली से झाड़ू लगाने की परंपरा इस मंदिर को विशिष्ट पहचान देती है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महासप्तमी पर होने वाला यह अनुष्ठान माता के बेल्व निमंत्रण और विशेष पूजा-विधि से भी जुड़ा है। मंदिर में तांत्रिक पूजा-पद्धति का विशेष महत्व बताया जाता है। यही वजह है कि नवरात्र के इस अवसर पर गोड्डा के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर की ख्याति दूर-दराज तक फैली हुई है।
बिल्व निमंत्रण के साथ बढ़ेगा दुर्गोत्सव का उत्साह

महासप्तमी के अवसर पर प्राचीन दुर्गा मंदिर से विधि-विधान के साथ बिल्व निमंत्रण निकालने की भी तैयारी की गई है। धार्मिक परंपरा के अनुसार होने वाले इस अनुष्ठान के लिए मंदिर परिसर में विशेष व्यवस्था की जा रही है। बिल्व निमंत्रण को दुर्गापूजा की महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया माना जाता है। इसके साथ ही क्षेत्र में दुर्गोत्सव का उल्लास और भक्तिमय वातावरण और गहरा होने की उम्मीद है।
मंदिर में पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठानों को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। महासप्तमी पर झाड़ू लगाने, पावड़ा लेकर पहुंचने और दंडवत प्रणाम करने की परंपरा यहां के धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। यह आयोजन महागामा की सांस्कृतिक विरासत और लोक-आस्था को आज भी जीवंत बनाए हुए है।
श्रद्धालुओं की भीड़ को लेकर सुरक्षा के इंतजाम
सप्तमी पूजा के अवसर पर संभावित भीड़ को देखते हुए प्रशासन और पूजा समिति की ओर से सुरक्षा, यातायात तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। इस वर्ष हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई गई है। भीड़ को नियंत्रित करने और आवागमन सुचारू बनाए रखने के लिए गोड्डा मुख्य मार्ग स्थित गंगासागर मोड़ तथा केचुआ चौक से पुरानी बाजार होते हुए मंदिर परिसर तक बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है। इसके लिए शुक्रवार की रात तक आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई थीं।
प्रशासन और पूजा समिति का जोर भीड़ प्रबंधन के साथ-साथ श्रद्धालुओं को सुरक्षित एवं सुगम दर्शन उपलब्ध कराने पर है। मंदिर परिसर और आसपास के रास्तों पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष सतर्कता बरतने की तैयारी की गई है, ताकि धार्मिक अनुष्ठान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें।
महागामा का प्राचीन दुर्गा मंदिर इस तरह न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां की सदियों पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। महासप्तमी पर उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात की गवाही देती है कि आधुनिक समय में भी लोक-परंपराओं के प्रति लोगों की आस्था कायम है।
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