देवघर में पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि पर्यावरणीय संकट से निपटने में गांवों की अहम भूमिका होगी। जानिए प्रकृति संरक्षण और गांधी के ग्राम स्वराज पर उनके विचार।
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
आने वाला समय गांव का है। गांव ही इस संसार को बचाएगा और आगे बढ़ाएगा, क्योंकि दुनिया जिस पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, उससे निपटने की ताकत गांवों में है। सोमवार को देवघर में प्रकृति संरक्षण पर आयोजित विचार गोष्ठी – बढ़ते पर्यावर्णीय संकट और हमारे भविष्य में प्रख्यात पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि विकास की मौजूदा अवधारणा में प्रकृति के संरक्षण के बजाय उसके दोहन पर अधिक जोर दिया गया है। इसका परिणाम आज जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है।
पश्चिमी विकास मॉडल की नकल में अपनी जड़ों से दूर हुआ समाज

डॉ. जोशी ने कहा कि पहले पश्चिमी देशों की जीवनशैली को विकास का मानक मान लिया गया। ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप की नकल करते हुए भारतीय समाज अपनी परंपराओं और ग्रामीण जीवन से दूर होता चला गया। अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी जीवनशैली को आधुनिकता का प्रतीक मानने की प्रवृत्ति ने विकास की सोच को भी प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि आज भी हम उसी विकास मॉडल पर आगे बढ़ रहे हैं, जिसमें सुख-सुविधाओं और आर्थिक प्रगति को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। विकास का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना है, न कि उन प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करना, जिन पर हमारा अस्तित्व निर्भर है। डॉ. जोशी ने अमेरिका, चीन और भारत में प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि विकास की दिशा पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। प्रकृति के अत्यधिक दोहन से पैदा हो रहे संकट का समाधान तभी संभव है, जब आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
पानी नहीं होगा तो क्या पिएंगे, हवा नहीं होगी तो कैसे लेंगे सांस?
मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए डॉ. जोशी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री, नौकरी और बेहतर पैकेज हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा व्यक्ति को संवेदनशील बनाने और जीवन की बुनियादी जरूरतों के प्रति जागरूक करने का माध्यम भी है। उन्होंने देहरादून के एक प्रतिष्ठित विद्यालय का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि वहां विद्यार्थियों से पूछा गया कि यदि पानी नहीं होगा, तो वे क्या पिएंगे? एक बच्चे ने जवाब दिया कि पानी नहीं होगा तो जूस पी लेंगे। डॉ. जोशी ने कहा कि यह जवाब आधुनिक शिक्षा में प्रकृति के प्रति समझ की कमी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा यदि मनुष्य को केवल पैसा कमाने की मशीन बना दे और उसमें प्रकृति तथा समाज के प्रति संवेदना विकसित न हो, तो उसके उद्देश्य पर विचार करना जरूरी है। मनुष्य को यह समझना होगा कि हवा, पानी और भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है।
महर्षि व्यास की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय चिंतन में भी प्रकृति, समाज और मानवीय मूल्यों के संकट की आशंकाएं व्यक्त की गई हैं। कोविड महामारी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के बावजूद मनुष्य प्राकृतिक परिस्थितियों के सामने असहाय हो सकता है।
गांधी के ग्राम स्वराज में छिपा है समाधान

डॉ. जोशी ने महात्मा गांधी को याद करते हुए कहा कि गांधीजी अंग्रेजी जानते थे, लेकिन उनकी सोच अंग्रेजियत से प्रभावित नहीं थी। उन्होंने गांवों और स्थानीय जरूरतों को केंद्र में रखकर विकास की कल्पना की थी। आज उनके विचारों को समझने और व्यवहार में उतारने की जरूरत पहले से अधिक है।उन्होंने कहा कि विकास की धारा गांवों से शहरों की ओर मुड़ गई। शहरों का विस्तार होता गया, जबकि गांवों की भूमिका लगातार सीमित होती गई। गांवों में सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं पहुंचना जरूरी है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर गांवों की प्रकृति और मूल पहचान को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
डॉ. जोशी ने कहा कि भारत की खाद्य व्यवस्था, खेती और प्राकृतिक संसाधनों का गांवों से गहरा संबंध है। हवा, मिट्टी, पानी और भोजन की जरूरतों को पूरा करने में ग्रामीण परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए गांवों को विकास की इकाई बनाना होगा। पर्यावरणीय संकट का समाधान खोजने के लिए गांवों को केंद्र में रखकर योजनाएं बनानी होंगी। उन्होंने काठमांडू में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी का उल्लेख करते हुए कहा कि बिगड़ते पारिस्थितिकी संतुलन को सुधारने के लिए गांवों को आपस में जोड़ने और स्थानीय स्तर पर प्रकृति संरक्षण की पहल करने की जरूरत है।
प्रकृति से जुड़ी भारतीय परंपराओं को समझना होगा
डॉ. जोशी ने कहा कि भारतीय ग्रामीण जीवन में प्रकृति के प्रति सम्मान की परंपरा रही है। पीपल की पूजा, नदियों को मां मानना और स्थानीय जलस्रोतों को महत्व देना इसी सोच का हिस्सा है। गांवों के लिए नदियां केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि पेयजल, खेती और जीवन का आधार भी हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मनुष्य ईश्वर के प्रति आस्था रखता है, तो प्रकृति के प्रति वैसी संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाता? उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था का वास्तविक अर्थ प्रकृति और जीवन के प्रति अपने दायित्वों को समझना भी होना चाहिए। केवल मंदिरों में पूजा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हवा, पानी, मिट्टी और जंगलों को बचाने के लिए व्यवहार में भी प्रयास करना होगा। उन्होंने वन्यजीवों की घटती आबादी और प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव का जिक्र करते हुए कहा कि मनुष्य की गतिविधियां पूरी पारिस्थितिकी को प्रभावित कर रही हैं। प्रकृति संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और उनके प्राकृतिक परिवेश की रक्षा करना भी है।
जलवायु परिवर्तन बदल रहा है मौसम का मिजाज

डॉ. जोशी ने बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर चिंता जताते हुए कहा कि धरती के साथ समुद्र के तापमान में होने वाले बदलावों का असर भी मौसम की प्रक्रियाओं पर पड़ता है। इससे बारिश के समय, स्थान और तीव्रता में बदलाव जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
उन्होंने देवघर का उदाहरण देते हुए कहा कि भविष्य में किसी क्षेत्र में कब और कितनी तेज बारिश होगी, इसका अनुमान लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए प्रकृति के बदलते संकेतों को गंभीरता से समझना जरूरी है। पर्यावरणीय संकट केवल वैज्ञानिकों या सरकारों का विषय नहीं, बल्कि आम लोगों के जीवन, खेती और जल उपलब्धता से भी जुड़ा है। डॉ. जोशी ने कोविड महामारी के दौरान शहरों से गांव लौटे लोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट के समय गांवों और सामुदायिक संबंधों की अहमियत फिर सामने आई। उन्होंने कहा कि गांवों में स्थानीय ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों और सामूहिक सहयोग की क्षमता मौजूद है। इसे पहचानकर विकास की योजनाएं बनाई जानी चाहिए।
प्रकृति संरक्षण के लिए सामूहिक पहल जरूरी

डॉ. जोशी ने कहा कि गांवों में शहरी सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए, लेकिन उनकी पहचान और प्रकृति के साथ संबंधों को बनाए रखना भी जरूरी है। शहरों को भी यह समझना होगा कि उनकी भोजन, पानी और दूसरी बुनियादी जरूरतों का आधार ग्रामीण क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधन हैं। उन्होंने लोगों से प्रकृति के प्रति अपने दायित्व को समझने और गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को आगे बढ़ाने की अपील की। उनके अनुसार, पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से नहीं होगा। इसके लिए समाज की भागीदारी, जीवनशैली में बदलाव और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की जरूरत है।
डॉ. जोशी का स्पष्ट संदेश था कि यदि दुनिया को पर्यावरणीय संकट से बचाना है, तो गांवों को विकास की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान देना होगा और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।

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