गोड्डा के मेहरमा प्रखंड स्थित बलबड्डा में 150 वर्षों से मां काली की पूजा की परंपरा कायम है। 8 से 10 नवंबर तक आयोजित महोत्सव में आदिवासी नृत्य, बच्चों की झांकी और महादंगल कुश्ती होंगे मुख्य आकर्षण।

  • 8 से 10 नवंबर तक तीन दिवसीय काली पूजा महोत्सव का आयोजन
  • बच्चों की झांकी, चम्मच रेस और आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता में मिलेंगे आकर्षक पुरस्कार

कंचन क्रांति न्यूज, मेहरमा (गोड्डा)।

गोड्डा जिले के मेहरमा प्रखंड अंतर्गत बलबड्डा में मां काली की आराधना की करीब डेढ़ सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ कायम है। यहां प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाला काली पूजा महोत्सव केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, लोककला और ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को मंच देने वाला एक ऐतिहासिक आयोजन भी है। इस वर्ष भी 8 से 10 नवंबर तक तीन दिवसीय काली पूजा महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाएगा। महोत्सव में मां काली की पूजा-अर्चना के साथ आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता, बच्चों की आकर्षक झांकी और दो दिवसीय महादंगल अखाड़ा कुश्ती मुख्य आकर्षण होंगे।

आयोजन को लेकर स्थानीय लोगों और पूजा समिति की ओर से तैयारियां की जा रही हैं। पूजा के अवसर पर बलबड्डा सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। वर्षों पुरानी इस धार्मिक परंपरा के कारण बलबड्डा का काली पूजा मेला क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है।

8 नवंबर को प्रतिमा स्थापना, मध्यरात्रि में होगी निशि पूजा

महोत्सव के कार्यक्रमों के अनुसार 8 नवंबर की संध्या छह बजे मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इसके बाद रात्रि 12 बजे के बाद निशि बलि का कार्यक्रम आयोजित होगा। 9 नवंबर को सुबह 10:45 बजे के बाद बलि का धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया जाएगा। इसी दिन बच्चों द्वारा मां काली की भव्य झांकी निकाली जाएगी। बच्चों के लिए चम्मच रेस प्रतियोगिता भी आयोजित होगी। इसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को क्रमशः 701, 501 और 301 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।

आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता में 15 हजार रुपये से अधिक का प्रथम पुरस्कार

काली पूजा महोत्सव में आदिवासी संस्कृति और पारंपरिक लोककला को विशेष महत्व दिया गया है। इसके तहत आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता आयोजित होगी, जिसमें विभिन्न प्रतिभागी और नृत्य दल अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार 15,001 रुपये, द्वितीय पुरस्कार 11,001 रुपये, तृतीय पुरस्कार 7,001 रुपये तथा सांत्वना पुरस्कार 2,001 रुपये निर्धारित किया गया है।

महादंगल कुश्ती में 9 नवंबर को सेमीफाइनल, 10 को फाइनल

महोत्सव का एक अन्य प्रमुख आकर्षण दो दिवसीय महादंगल अखाड़ा कुश्ती प्रतियोगिता होगी। इसमें स्थानीय एवं अन्य क्षेत्रों के पहलवान अपनी ताकत और कुश्ती कौशल का प्रदर्शन करेंगे। प्रतियोगिता का सेमीफाइनल मुकाबला 9 नवंबर को तथा फाइनल मुकाबला 10 नवंबर को आयोजित किया जाएगा। कुश्ती प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहलवान को 5,001 रुपये, द्वितीय को 3,101 रुपये, तृतीय को 2,101 रुपये तथा सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500 रुपये दिए जाएंगे। 10 नवंबर की संध्या मां काली की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। इसके साथ ही तीन दिवसीय महोत्सव का समापन होगा।

डेढ़ सौ साल पुरानी परंपरा में दिखती है आदिवासी संस्कृति की झलक

समाजसेवी एवं मेला समिति की सदस्य जुली कुमारी ने बताया कि बलबड्डा में करीब 150 वर्षों से काली पूजा मेले का आयोजन होता आ रहा है। इस आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। विशेष रूप से आदिवासी नृत्य के माध्यम से क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। उन्होंने इसे क्षेत्र का ऐतिहासिक और भव्य काली पूजा मेला बताया।

मेला समिति के संयोजक डॉ. पीएन कुलदीप ने कहा कि दुर्गा मंदिर परिसर में स्थित काली मंदिर की अपनी विशेष धार्मिक मान्यता है। यहां तीन दिनों तक विधि-विधान से मां काली की पूजा-अर्चना की जाती है। आदिवासी नृत्य और महादंगल कुश्ती अखाड़ा मेले के प्रमुख आकर्षण होते हैं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटते हैं।

वहीं, मेला समिति के संयोजक नितेश कुमार ने बताया कि 8 नवंबर को प्रतिमा स्थापना के साथ पूजा महोत्सव की शुरुआत होगी। इसके बाद निशि बलि और बलि के धार्मिक कार्यक्रम होंगे। 9 नवंबर को बच्चों की चम्मच रेस प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। 10 नवंबर को प्रतिमा विसर्जन से पहले आदिवासी नृत्य और अखाड़ा कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा।

मेला समिति के सदस्य दिनेश कुमार ने बताया कि आदिवासी नृत्य प्रतियोगिता के लिए आकर्षक पुरस्कार निर्धारित किए गए हैं। इसके अलावा दो दिवसीय महादंगल कुश्ती में भी विजेता पहलवानों को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा।

कुल मिलाकर बलबड्डा का यह काली पूजा महोत्सव धार्मिक आस्था के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, आदिवासी परंपरा और ग्रामीण खेल प्रतिभाओं के संगम का प्रतीक है। डेढ़ सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी काम कर रही है।

रिपोर्ट जितेंद्र कुमार दुबे

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