दिल्ली उच्च न्यायालय ने कम पढ़े-लिखे बुजुर्ग पिता के साथ धोखाधड़ी कर संपत्ति अपने नाम करवाने वाली बेटी के खिलाफ फैसला सुनाया। पिता की मृत्यु के बाद अदालत ने फर्जी सेल डीड रद्द कर अन्य 4 बेटियों को हक देने का आदेश दिया
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय में एक अत्यंत भावुक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 90 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग पिता अपनी ही बेटी की धोखाधड़ी का शिकार बन गए। अपनी ही औलाद के खिलाफ वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले इस पिता का हक में फैसला तो आया, लेकिन अफसोस कि इसे सुनने के लिए वह खुद जीवित नहीं रहे।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने दीवानी अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि तमाम तथ्यों से स्पष्ट है कि बेटी ने पिता के साथ छल किया। अदालत ने निर्देश दिया है कि आरोपी बेटी तुरंत पिता के मकान को खाली करे और संपत्ति का कब्जा अन्य चार बेटियों को सौंपा जाए।
83 वर्ष की उम्र में 5 बेटियों के पिता ने अपनी संपत्ति पांचों बेटियों में बराबर बांटने के लिए वसीयत बनवाने का फैसला किया। एक बेटी पर भरोसा कर वह सब-रजिस्ट्रार कार्यालय गए। बेटी ने पिता के अंग्रेजी न जानने और कम पढ़े-लिखे होने का फायदा उठाकर वसीयत की जगह अपने नाम सेल डीड बनवा ली।
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार देखभाल के बहाने बेटी अपने परिवार के साथ पिता के चार मंजिला मकान में रहने आ गई और वसीयत के कागजात मांगने पर टालमटोल करती रही।
2013 में सब-रजिस्ट्रार कार्यालय से सर्टिफाइड कॉपी निकलवाने पर धोखाधड़ी का खुलासा हुआ। पिता ने सितंबर 2013 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, अक्टूबर 2013 में नई वसीयत बनाकर आरोपी बेटी को बेदखल कर दिया और सेल डीड रद्द कराने के लिए कोर्ट में केस कर दिया।
कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते 2016 में 93 वर्ष की आयु में बुजुर्ग का निधन हो गया। इसके बाद उनकी बाकी चार बेटियों ने इस कानूनी जंग को जारी रखा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दीवानी अदालत के फैसले को सही ठहराया। बुजुर्ग एक कारखाना चलाते थे। उनके कर्मचारियों के हाजिरी रजिस्टर से साफ था कि उन्हें सिर्फ टूटी-फूटी हिंदी लिखनी आती थी, अंग्रेजी का ज्ञान बिल्कुल नहीं था।
मेडिकल रिकॉर्ड्स से साबित हुआ कि बुजुर्ग की आंखों की रोशनी बहुत कम थी और अधिक उम्र के कारण वे बिना सहायक के चलने में असमर्थ थे।
2006 में जिस मकान का बाजार मूल्य ₹60 लाख था, बेटी ने दावा किया कि उसने वह मकान पिता से महज ₹1 लाख में खरीदा है, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है।
बेटी 1 लाख रुपये देने का कोई सबूत पेश नहीं कर सकी। बैंक रिकॉर्ड के अनुसार सेल डीड वाले महीने में उसके खाते में महज 10 हजार रुपये थे।
बुजुर्ग द्वारा 2013 में बेटी के खिलाफ दी गई धोखाधड़ी की पुलिस शिकायत को भी अदालत ने मजबूत सबूत माना।
अदालत ने माना कि बेटी ने अपनी बहनों का हक मारते हुए फर्जी तरीके से पूरी संपत्ति अपने नाम करवाई थी। अब आरोपी बेटी को मकान खाली करना होगा और अन्य चार बेटियों को इस संपत्ति पर बराबर का मालिकाना हक मिलेगा।
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