पर्यावरण विज्ञानी डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के साथ यात्रा के समन्वयक पंकज मालवीय
- 17 अक्टूबर को पटना पहुंचेगी जनकपुर से निकली यात्रा, बिहार में जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के प्रति जागरूकता पर जोर
कंचन क्रांति न्यूज, पटना।
प्रकृति संरक्षण और टिकाऊ विकास का संदेश लेकर पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नेतृत्व में निकली राष्ट्रीय साइकिल यात्रा 17 अक्टूबर को पटना पहुंचेगी। नेपाल में मां जानकी की जन्मस्थली जनकपुर से गांधी जयंती, 2 अक्टूबर को प्रारंभ हुई यह यात्रा झारखंड और बिहार के बड़े हिस्से से गुजरते हुए आगे बढ़ रही है। यात्रा के दौरान विभिन्न स्थानों पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने साइकिल यात्रियों का स्वागत किया तथा प्रकृति संरक्षण की इस पहल की सराहना की। यात्रा का प्रमुख उद्देश्य लोगों को जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता के संरक्षण के प्रति जागरूक करना तथा विकास की अवधारणा में पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करना है।
यात्रा के समन्वयक और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार कार्यरत पत्रकार पंकज मालवीय ने विशेष बातचीत में डॉ. जोशी के अभियान, उनके विचारों और यात्रा के उद्देश्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि डॉ. जोशी का दृष्टिकोण विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने पर आधारित है। इसी सोच के तहत सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के साथ सकल पर्यावरण उत्पाद यानी GEP को भी विकास के आकलन का महत्वपूर्ण आधार बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
GDP के साथ GEP को भी मिले महत्व
GDP किसी देश या क्षेत्र में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के आर्थिक मूल्य के आधार पर उसकी आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसके विपरीत, GEP की अवधारणा प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं के योगदान को समझने पर जोर देती है। इसमें जंगलों, नदियों, तालाबों, मिट्टी, जलस्रोतों और जैव-विविधता की भूमिका को महत्व दिया जाता है।
पंकज मालवीय के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां बढ़ें, उद्योगों का विस्तार हो और बुनियादी ढांचे का विकास हो, लेकिन दूसरी ओर जंगलों का क्षेत्र घटे, नदियां प्रदूषित हों, तालाब सूख जाएं और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचे, तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है। वास्तविक समृद्धि वही है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ प्राकृतिक पूंजी का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए।
GDP अर्थव्यवस्था की प्रगति का आकलन करने में मदद करता है, जबकि GEP प्रकृति और पर्यावरण से मिलने वाले लाभों को समझने का एक अतिरिक्त आधार प्रदान करता है। दोनों को साथ रखकर विकास की योजनाओं का आकलन करने से आर्थिक उपलब्धियों और पर्यावरणीय स्थिति के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद मिल सकती है। यही सोच टिकाऊ और समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इसी व्यापक विचार को जन-अभियान का स्वरूप देने के उद्देश्य से ‘जल, जीवन, जन-जागरण’ के संदेश के साथ राष्ट्रीय साइकिल यात्रा आयोजित की जा रही है। जनकपुर से शुरू हुई इस यात्रा में देवघर (झारखंड), पटना (बिहार), लखनऊ (उत्तर प्रदेश), दिल्ली और देहरादून (उत्तराखंड) सहित विभिन्न पड़ावों को शामिल किया गया है। यात्रा के माध्यम से लगभग 3,000 किलोमीटर की दूरी तय करने की परिकल्पना है।
जनभागीदारी से प्रकृति संरक्षण का प्रयास
इस राष्ट्रीय साइकिल यात्रा का महत्व केवल इसके भौगोलिक विस्तार तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ना और लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित करना है। साइकिल को माध्यम बनाकर अभियान जलस्रोतों एवं नदियों के संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन, स्वस्थ जीवनशैली, युवाओं की भागीदारी, ग्रामीण विकास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे विषयों को आम नागरिकों के बीच ले जाने का प्रयास कर रहा है।
यात्रा के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण केवल सरकार या संबंधित विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, युवाओं और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। जलस्रोतों को बचाने, पेड़-पौधों का संरक्षण करने, पानी का विवेकपूर्ण उपयोग करने और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने जैसे प्रयास सामूहिक भागीदारी से ही व्यापक रूप ले सकते हैं।
इसके साथ ही विकास की नीतियों और स्थानीय योजनाओं में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है। किसी क्षेत्र में विकास का आकलन करते समय केवल आर्थिक गतिविधियों और बुनियादी ढांचे के विस्तार को नहीं, बल्कि पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
बिहार के लिए विशेष महत्व रखती है यात्रा
बिहार के लिए इस राष्ट्रीय साइकिल यात्रा का विशेष महत्व है। राज्य की पहचान उसकी नदियों, जल-संस्कृति, कृषि, ग्रामीण जीवन, लोक परंपराओं और समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है। यहां की अर्थव्यवस्था और जनजीवन का बड़ा हिस्सा जल तथा प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। ऐसे में जल और पर्यावरण संरक्षण का संदेश बिहार के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।
दूसरी ओर, बिहार के अनेक क्षेत्रों को बाढ़, जलजमाव, भूजल प्रबंधन, जलस्रोतों के क्षरण और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए विकास योजनाओं में प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति को पर्याप्त महत्व देना जरूरी है। यदि सड़कों, भवनों, उत्पादन और आय में वृद्धि के साथ तालाबों के पुनर्जीवन, नदियों के संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, हरित क्षेत्र के विस्तार और जैव-विविधता की स्थिति का भी आकलन किया जाए, तो विकास को अधिक समावेशी और टिकाऊ बनाया जा सकता है।
पंचायतों और स्थानीय निकायों के स्तर पर पर्यावरणीय संकेतकों का नियमित आकलन भी इस दिशा में उपयोगी हो सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर जलस्रोतों, हरित क्षेत्रों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति को समझने तथा संरक्षण से जुड़ी योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
पंकज मालवीय के अनुसार, बिहार में जल और प्रकृति संरक्षण का संदेश गांवों, कस्बों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, युवाओं और सामाजिक संगठनों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। यह यात्रा लोगों को प्रकृति संरक्षण को सामूहिक सामाजिक दायित्व के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करती है। इसके माध्यम से विकास की ऐसी सोच को बढ़ावा देने का प्रयास है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी समान महत्व मिले।
प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में डॉ. अनिल प्रकाश जोशी का योगदान
पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी देश के प्रख्यात पर्यावरणविद् हैं। वह हिमालयन एनवायरनमेंट स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) के संस्थापक हैं। पर्यावरणीय संतुलन, हिमालय संरक्षण, जल प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के क्षेत्र में उनका दीर्घकालीन कार्य रहा है।
उनके विचारों का मूल संदेश है कि प्रकृति और स्थानीय संसाधनों को सुरक्षित रखे बिना विकास को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता केवल वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने वाले संसाधन नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़े हैं। इसलिए विकास की योजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को अनिवार्य महत्व दिया जाना चाहिए।
GDP के साथ GEP को भी विकास के आकलन में महत्व देने की अवधारणा इसी सोच को व्यापक सामाजिक और नीतिगत विमर्श से जोड़ती है। राष्ट्रीय साइकिल यात्रा के माध्यम से इस विचार को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है कि आर्थिक विकास की उपलब्धियों के साथ प्रकृति की सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। यात्रा का संदेश स्पष्ट है कि प्रकृति संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करना समय की मांग है। जलस्रोतों को बचाकर, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करके और पर्यावरण संरक्षण में जनभागीदारी बढ़ाकर ही एक स्वस्थ, समृद्ध और टिकाऊ भारत के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
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