बघचपरा में अपनी मासूम बेटी के बेजान शरीर से लिपटकर कलेजा चीर देने वाला विलाप करते परिजन।
एक-दूसरे का हाथ थामे मौत के आगोश में सो गईं पांच बहनें, मां-बाप की चीत्कारों से कांप उठा मुंगेर
कंचनक्रांति ब्यूरो
मुंगेर। बुधवार की सुबह मुंगेर के लिए रोशनी नहीं, बल्कि ऐसा गहरा अंधकार लेकर आई जिसने पूरे इलाके को आंसुओं में डुबो दिया। जिस गंगा को हम जीवनदायिनी कहते हैं, उसी की उफनती और बेरहम धाराओं ने एक साथ छह मासूम जिंदगियों की सांसें हमेशा-हमेशा के लिए छीन लीं। मुफस्सिल थाना क्षेत्र के दो अलग-अलग घाटों पर कुदरत का ऐसा खौफनाक मंजर दिखा कि पत्थर दिल भी रो पड़े। गंगा किनारे गूंजती माताओं की चीत्कार और पिताओं के सूखे आंसू आज हर इंसान के दिल को झकझोर रहे हैं।
खिलखिलाते आंगनों में बचीं सिर्फ सिसकियां: बचाने की तड़प में समा गईं पांच बहनें
दिल को चीर देने वाली पहली घटना बघचपरा घाट की है। सुबह करीब आठ बजे जब सूरज की किरणें खिली थीं, तब क्रांति पासवान की चार मासूम बेटियां—संगीता, विनीता, सोनाली, संध्या और उनकी चचेरी बहन हिना कुमारी हंसती-खेलती गंगा स्नान के लिए निकली थीं। किसे पता था कि यह इन मासूमों का आखिरी सफर होगा।
नहाते समय अचानक एक बहन का पैर फिसला और वह गहरी, तेज धार में समाने लगी। अपनी बहन को डूबता देख बाकी बहनों से रहा नहीं गया। बिना अपनी जान की परवाह किए, एक-दूसरे का हाथ थामे पांचों बहनें पानी में उतरती चली गईं। लहरें निष्ठुर थीं और मासूमों के हौसले बेबस। देखते ही देखते पांचों बहनें एक-दूसरे को बचाने की तड़प में गंगा की अगाध गोद में विलीन हो गईं।
जिस घर में सुबह तक मासूम किलकारियां गूंज रही थीं, वहां शाम होते-होते सिर्फ और सिर्फ सन्नाटा और सिसकियां बची हैं। बदहवास मां-बाप पागलों की तरह गंगा की लहरों में अपने बच्चों का नाम पुकार रहे हैं, लेकिन खामोश गंगा अब कुछ नहीं लौटा रही।
आदर्श ग्राम का इकलौता चिराग भी बुझा, पीयूष को निगल गई गंगा
दुखों का पहाड़ यहीं नहीं थमा। दूसरी हृदयविदारक घटना आदर्श ग्राम टीकारामपुर में घटी। सुबोध सिंह का 16 वर्षीय बेटा पीयूष कुमार पटेल, जो अपने परिवार की उम्मीद और आंखों का तारा था, स्नान के दौरान गहरे पानी की चपेट में आ गया। बेटे को आंखों के सामने डूबता देख बेबस माता-पिता और परिजन उसे बचाने के लिए पानी में कूद पड़े। लेकिन गंगा के तेज बहाव के आगे इंसानी लाचारी हार गई। पीयूष को पानी निगल गया। इस हादसे के बाद मां बेसुध पड़ी है और पिता की पथराई आंखें बस अपने लाल की राह तक रही हैं।
अंधेरे के बीच अपनों की तलाश: एसडीआरएफ ने निकाले दो शव, चार अब भी लापता
हृदयविदारक हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस और राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) की टीम मौके पर पहुंची। स्थानीय गोताखोरों के साथ युद्धस्तर पर खोजबीन शुरू की गई। पूर्व विधायक प्रणव कुमार भी मौके पर पहुंचे और पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाते हुए राहत कार्य में जुटे। देर शाम तक गंगा की गहराइयों से दो मासूमों के शवों को बाहर निकाला जा सका, जबकि चार बच्चों की तलाश अब भी जारी है। रात के घने अंधेरे ने रेस्क्यू ऑपरेशन में बाधा खड़ी कर दी है, जिससे परिजनों का इंतजार और दर्द और भी भयानक हो गया है।
गांव-गांव में मातम, हर आंख नम: यह जख्म शायद सदियों तक न भरे
एक साथ छह मासूमों की मौत ने बघचपरा और टीकारामपुर गांवों को पूरी तरह सुन्न कर दिया है। जिन गलियों और आंगनों में कल तक इन बच्चों के कदमों की आहट और हंसी गूंजती थी, आज वहां सिर्फ मातम का सन्नाटा है। चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं और हर आंख से आंसू बह रहे हैं। मासूमों की ये अधूरी कहानियां और माता-पिता का ये विलाप इस इलाके को एक ऐसा गहरा जख्म दे गया है, जिसे भरने में शायद बरसों या सदियों का वक्त भी कम पड़ेगा।