मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा ने सीएम मोहन यादव को एक भावुक पत्र लिखकर जबलपुर एयरपोर्ट पर वीआईपी कल्चर के कारण आम यात्रियों को होने वाली प्रताड़ना का मुद्दा उठाया है। पढ़ें पूरी खबर कंचनक्रांति पर।
कंचनक्रांति ब्यूरो, भोपाल।
मध्यप्रदेश में वीआईपी कल्चर और नेताओं के दौरों के दौरान आम जनता को होने वाली परेशानी का एक बेहद भावुक और आंखें खोलने वाला मामला सामने आया है। सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखे एक खुले पत्र में प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा ने व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे मुख्यमंत्री के आगमन के नाम पर की गई प्रशासनिक घेराबंदी और 'शाही व्यवस्था' के कारण वह एयरपोर्ट पर अपनी पत्नी को विदा करते समय 'गुड बाय' तक नहीं कह पाए।
यह पत्र सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'जनता बनाम जनप्रतिनिधि' की बढ़ती दूरी पर एक नई बहस छेड़ चुका है।
एयरपोर्ट पर 'रियासत' जैसा नजारा, टिकट वाले बाहर और गुलदस्ते वाले अंदर
पत्रकार संजय सिन्हा ने अपने पत्र में लिखा कि बीते दिनों वह अपनी पत्नी को दिल्ली की फ्लाइट के लिए छोड़ने जबलपुर एयरपोर्ट गए थे। आम दिनों में वह अपनी पत्नी को गले लगाकर विदा करते थे, लेकिन उस दिन नजारा बदला हुआ था। मुख्यमंत्री मोहन यादव के आने की वजह से पूरे एयरपोर्ट को छावनी में बदल दिया गया था।
एयरपोर्ट के प्रस्थान द्वार के सामने कम से कम सौ सरकारी गाड़ियां खड़ी थीं। एसपी, कलेक्टर, एएसपी, सांसद, विधायक और नगर निगम के वाहनों का तांता लगा था। पुलिस बैरिकेड लगाकर आम यात्रियों को दूर ही रोक रही थी। कल मुझे पहली बार महसूस हुआ कि हमारे लोकतंत्र में जनता और जनप्रतिनिधि के बीच की दूरी कितनी बढ़ गई है। ऐसा लगा जैसे मैं किसी लोकतांत्रिक देश में नहीं, बल्कि किसी रियासत में खड़ा हूं, जहां राजा आने वाला हो और प्रजा को रास्ते से हटा दिया गया हो।
सिन्हा ने व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा कि एयरपोर्ट का नियम है कि जिसके पास टिकट हो वही भीतर जाए, लेकिन उस दिन टिकट वाले यात्री बाहर परेशान हो रहे थे और बिना टिकट वाले नेता-कार्यकर्ता फूलों के गुलदस्ते लेकर स्वागत के लिए भीतर मौजूद थे।
आप राजा नहीं, हम प्रजा नहीं- उठाए बड़े सवाल
वरिष्ठ पत्रकार ने मुख्यमंत्री के बार-बार होने वाले दौरों और उसमें पूरे प्रशासनिक अमले के शामिल होने पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा:
देश को आजाद हुए उनासी (79) वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अंग्रेजों का प्रोटोकॉल आज भी हमारे व्यवहार में क्यों है?
मुख्यमंत्री लगभग हर सप्ताह जबलपुर आते हैं, क्या अनेक बैठकें ऑनलाइन नहीं हो सकतीं?
जब कलेक्टर, एसपी और पूरा पुलिस बल एयरपोर्ट पर अगवानी में खड़ा रहेगा, तो शहर किसके भरोसे चलेगा?
उन्होंने आगे लिखा, मुख्यमंत्री जी, आप राजा नहीं हैं और हम भी प्रजा नहीं हैं। आप जनता के प्रतिनिधि हैं और हम इस लोकतंत्र के नागरिक। सत्ता का अर्थ सुविधा नहीं, जिम्मेदारी होता है। बदलाव का अर्थ केवल सरकार बदलना नहीं, शासन की संस्कृति बदलना भी होता है।
मुख्यमंत्री से की ये 4 बड़ी मांगें
पत्र के अंत में संजय सिन्हा ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से एक नागरिक और पत्रकार के नाते चार विनम्र प्रार्थनाएं की हैं:
1. अनावश्यक भीड़ पर रोक: मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान स्वागत के नाम पर होने वाली अनावश्यक भीड़ और सरकारी उपस्थिति को तुरंत सीमित किया जाए।
2. अधिकारियों को दफ्तर में रखने की सलाह: अधिकारियों की उपस्थिति केवल वहीं तक सीमित हो जहां वास्तव में उनकी आवश्यकता हो। उन्हें दफ्तरों में रहकर जनता का काम करने दिया जाए।
3. सीमित काफिला: काफिले और सुरक्षा व्यवस्था को केवल आवश्यक सीमा तक ही रखा जाए ताकि आम नागरिक परेशान न हों।
4. यात्रियों को प्राथमिकता: एयरपोर्ट जैसी सार्वजनिक जगहों पर आम यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
भावुक अंत: सिन्हा ने अपने पत्र का अंत बेहद भावुक शब्दों के साथ किया। उन्होंने लिखा, "मेरी पत्नी तो कुछ दिनों बाद वापस आ जाएगी, हम फिर मिल लेंगे। मेरी पत्नी का गुड बाय तो अगली उड़ान में मिल जाएगा, लेकिन अगर नागरिक और शासन के बीच का विश्वास खो गया, तो उसे वापस लाने में बहुत समय लगेगा।
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