बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक और शैक्षणिक विरासत का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी विरासत का एक अहम अध्याय है श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय, करनीबाद।
करीब नौ दशक पहले स्थापित इस संस्थान ने संस्कृत शिक्षा, वेद-वेदांग, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कभी यहां सैकड़ों विद्यार्थी अध्ययन करते थे और परिसर में वेदों के मंत्रों के साथ शास्त्रार्थ की परंपरा जीवंत थी। लेकिन समय के साथ इस संस्थान की तस्वीर बदलती चली गई। जिस परिसर में कभी शिक्षा और संस्कृत की साधना होती थी, वहां आज जर्जर भवन, उजड़ा छात्रावास, उगी हुई झाड़ियां और संसाधनों का अभाव दिखाई देता है। शिक्षकों के स्वीकृत पदों और कार्यरत शिक्षकों की संख्या के बीच बड़ा अंतर है। पुस्तकालय में मौजूद दुर्लभ ग्रंथ, पांडुलिपियां और ऐतिहासिक दस्तावेज भी ऐसे भवन में रखे हैं, जिसकी अपनी सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है।
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है कंचन क्रांति की यह विशेष रिपोर्ट श्रृंखला। इस पड़ताल में हम श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के गौरवशाली अतीत से लेकर वर्तमान बदहाली, शिक्षकों की कमी, प्रशासनिक व्यवस्था, दुर्लभ पुस्तक-पांडुलिपियों की स्थिति, संस्कृत विश्वविद्यालय के अधूरे सपने और विद्यार्थियों के पलायन तक की पूरी कहानी सामने रखने की कोशिश करेंगे।
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1 अगस्त 1936 को महर्षि बालानंद द्वारा स्थापित श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय, करनीबाद, देवघर ने करीब नौ दशकों तक संस्कृत शिक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाया है।
- स्वर्णिम अतीत: एक समय इस संस्थान में 600 से अधिक विद्यार्थी अध्ययन करते थे। वेद, व्याकरण, साहित्य और शास्त्रों की शिक्षा के साथ यहां संस्कृत के विद्वानों और आचार्यों की एक समृद्ध परंपरा रही।
- वर्तमान बदहाली: आज मुख्य भवन जर्जर होकर खंडहर में बदल चुका है। छात्रावास का अस्तित्व समाप्त हो चुका है और परिसर में जगह-जगह जंगली घास और झाड़ियां उग आई हैं।
- जमीनी हकीकत: विद्यार्थियों के बैठने और पढ़ने तक के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। कभी जिस संस्थान में सैकड़ों छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे, वह आज सीमित संसाधनों के सहारे अपनी पहचान बचाने की कोशिश कर रहा है।
देवघर की पहचान बाबा बैद्यनाथ धाम के रूप में पूरे देश में है। लेकिन इस शहर की पहचान केवल धार्मिक
आस्था तक सीमित नहीं रही। यहां संस्कृत, साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कई संस्थाएं भी रही हैं। इन्हीं में श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय, करनीबाद का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
महर्षि बालानंद ने 1 अगस्त 1936 को इस संस्थान की स्थापना की थी। उस दौर में संस्कृत केवल एक विषय नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा और ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण आधार थी। वेदों, उपनिषदों, व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष और कर्मकांड जैसे विषयों के अध्ययन के लिए दूर-दराज से विद्यार्थी यहां पहुंचते थे। संस्थान ने लंबे समय तक संस्कृत शिक्षा की उस परंपरा को जीवित रखा, जिसमें विद्यार्थी अपने आचार्यों के सान्निध्य में रहकर अध्ययन करते थे।
कभी इस परिसर में विद्यार्थियों की बड़ी संख्या दिखाई देती थी। छह सौ से अधिक छात्र यहां नियमित रूप से अध्ययन करते थे। कक्षाओं में अध्यापन होता था, परिसर में शास्त्रों की चर्चा होती थी और संस्कृत के मंत्रों की गूंज सुनाई देती थी। छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के कारण पूरा परिसर एक जीवंत शैक्षणिक वातावरण का हिस्सा हुआ करता था।
लेकिन आज उसी संस्थान की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
महाविद्यालय का मुख्य भवन लंबे समय से जर्जर अवस्था में है। दीवारों और छत की हालत ऐसी है कि भवन का इस्तेमाल करना अपने आप में जोखिम भरा नजर आता है। जिस छात्रावास में कभी विद्यार्थी रहते थे, वह अब लगभग पूरी तरह जमींदोज हो चुका है। परिसर के कई हिस्सों में झाड़ियां और जंगली घास उग आई हैं। ऐसा लगता है मानो वर्षों से इस जगह की नियमित देखभाल नहीं हुई हो।
सबसे चिंताजनक स्थिति विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध शैक्षणिक और भौतिक सुविधाओं की है। पढ़ाई के लिए पर्याप्त कमरे नहीं हैं और बैठने की समुचित व्यवस्था भी नहीं बची है। ऐसे में सवाल केवल भवन की मरम्मत का नहीं है। सवाल यह है कि जिस संस्थान ने दशकों तक संस्कृत शिक्षा की परंपरा को संभाला, उसके लिए आज बुनियादी शैक्षणिक सुविधाएं भी क्यों उपलब्ध नहीं हैं?
इस पूरे परिदृश्य को देखने पर अतीत और वर्तमान के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। एक ओर वह समय था जब सैकड़ों विद्यार्थी यहां अध्ययन करते थे, वहीं दूसरी ओर आज संस्थान सीमित संसाधनों के साथ अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
महाविद्यालय की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए केवल जर्जर भवन को देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे शिक्षकों की कमी, प्रशासनिक व्यवस्था, विश्वविद्यालय से संबद्धता, संसाधनों का अभाव और संस्कृत शिक्षा के प्रति सरकारी नीतियों जैसे कई सवाल जुड़े हुए हैं।
इन्हीं सवालों को समझने के लिए हमने श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. गोपालचंद्र झा से बातचीत की। उन्होंने महाविद्यालय के वर्तमान हालात से लेकर शिक्षकों की कमी, विश्वविद्यालय से संबद्धता और संस्कृत शिक्षा के भविष्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी।
आइए, बातचीत के जरिए समझते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि देवघर का यह ऐतिहासिक शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थान आज इस स्थिति तक पहुंच गया और इसके पुनरुद्धार की राह में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं।
आगे का हिस्सा पढ़ें.....अगले दिन