दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-24 स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में पुरी धाम जैसी भव्यता और परंपरा देखने को मिलती है। जानिए कैसे एक भक्त की पुकार पर दिल्ली में स्थापित हुआ यह पावन धाम और क्या हैं इसके पारंपरिक रीति-रिवाज।



नीरज शर्मा, नई दिल्ली।

हैं भाव के भूखे भगवन्, ये वेद बताते हैं...जब भक्त पुकारे प्रेम से, प्रभु दौड़े आते हैं।

भगवान जगन्नाथ के इस सुप्रसिद्ध भजन की ये पंक्तियाँ दिल्ली के रोहिणी स्थित सेक्टर-24 के श्री जगन्नाथ मंदिर में शत-प्रतिशत सच साबित होती हैं। ओडिशा के सुप्रसिद्ध श्रीक्षेत्र पुरी धाम की तर्ज पर निर्मित यह भव्य मंदिर आज लाखों दिल्लीवासियों और आसपास के श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था और शांति का केंद्र बन चुका है। यह पवित्र स्थान उन श्रद्धालुओं को घर बैठे जगन्नाथ पुरी धाम जैसे प्रभु के अलौकिक दर्शन और भव्य रथ यात्रा का दिव्य अनुभव प्रदान करता है।

एक छोटे से विग्रह से भव्य धाम बनने की भावुक कथा

इस अलौकिक मंदिर की स्थापना के पीछे भक्तों की अनन्य निष्ठा और छटपटाहट की एक अद्भुत कहानी है। मंदिर के संस्थापक और मूल रूप से ओडिशा के निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पबन जैन बताते हैं कि जब वे पढ़ाई के सिलसिले में दिल्ली आए, तो प्रभु जगन्नाथ के दर्शन न हो पाने के कारण उनका मन तड़प उठता था।

वे उस समय रोहिणी के इसी स्थान पर भगवान जगन्नाथ की एक छोटी सी प्रतिमा रखकर नियमित रूप से पूजा-अर्चना किया करते थे। पुरी न जा पाने की कसक में प्रभु के आगे छलकती उनकी आँखों के भाव को आसपास रहने वाले अन्य भक्त छिपा न सके। धीरे-धीरे अशोक सोनकर, परशुराम त्रिपाठी और अनिल झा जैसे कई श्रद्धालु उनके साथ इस आराधना में जुड़ने लगे।

भक्तों का एक ही भाव था - हे नाथ! हम विवश होकर पुरी नहीं आ सकते, लेकिन आप तो भक्तों की पुकार सुनकर यहाँ आ सकते हैं।

भक्तों की इसी निश्छल पुकार का चमत्कार हुआ कि श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। वर्ष 2002 में भव्य मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ। आज एक छोटी सी प्रतिमा से शुरू हुआ यह पूजा स्थल एक विशाल मंदिर का रूप ले चुका है, जहाँ भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं।


बीमार होते हैं प्रभु: 108 घड़ों के स्नान और औषधीय उपचार की अनूठी परंपरा

मंदिर के मुख्य पुजारी अजय कुमार, बेनुधर दीक्षित और गोपाल झा मंदिर की महिमा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि भगवान अपने भक्तों के समस्त कष्टों को स्वयं पर ले लेते हैं।

स्नान यात्रा: ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ को 108 पवित्र कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद लीलाधारी प्रभु बीमार पड़ जाते हैं।

अनवसर काल: बीमारी के दौरान भगवान को नाना प्रकार की जड़ी-बूटियों और औषधियों का काढ़ा बनाकर भोग लगाया जाता है। इस उपचार अवधि (अणसर) के दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और श्रद्धालु प्रभु के दर्शन नहीं कर पाते हैं।

रूठीं माँ लक्ष्मी को मनाने में लगे हैं जगन्नाथ जी

पुजारियों के अनुसार, मान्यता है कि भगवान अपनी बहन सुभद्रा और भ्राता बलभद्र के साथ दिव्य रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) गए थे। वे धन की देवी माँ लक्ष्मी से केवल एक दिन में लौटने का वादा करके गए थे, परंतु वापस आने में पाँच दिनों का समय लग गया।

इस बात से क्रोधित होकर माँ लक्ष्मी ने मंदिर के मुख्य द्वार बंद कर दिए। वर्तमान में भगवान जगन्नाथ, रथ पर विराजमान होकर अपनी कुपित पत्नी माँ लक्ष्मी को मनाने के लिए अनुनय-विनय कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन माँ लक्ष्मी का क्रोध शांत होगा और वे मंदिर के द्वार खोलेंगी, जिसके बाद प्रभु का 'बहुड़ा गृहागमन' (मंदिर प्रवेश) संपन्न होगा। तब तक भगवान रथ पर ही भक्तों को दर्शन दे रहे हैं।

प्रभु के दरबार में सब एक समान

श्री जगन्नाथ जी के इस पावन दरबार में ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। रथ यात्रा और भव्य आयोजनों के दौरान यहाँ आस्था का जनसैलाब उमड़ता है। हाल ही में आयोजित रथ यात्रा महोत्सव में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने पहुँची थीं, लेकिन मंदिर प्रांगण में प्रवेश करते ही वे एक आम भक्त की तरह प्रभु के अलौकिक रूप को देखकर भाव-विभोर हो गईं और नतमस्तक होकर उनका आशीर्वाद लिया।

…………………………………………………………………………..

Jagannath Temple Rohini Sector 24, Delhi Jagannath Temple Story, Rohini Jagannath Rath Yatra, Paban Jain Jagannath Temple, Jagannath Snana Yatra Rohini, Ashadh Purnima Jagannath Temple, Delhi Religious News, Neeraj Sharma Delhi News.