अयातुल्ला खामेनेई की हत्या के बाद क्या मध्य-पूर्व (Middle East) तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रहा है? भारत पर इसके आर्थिक और रणनीतिक असर और अमेरिकी आक्रामकता पर वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत ठाकुर का विशेष विश्लेषण।
निशिकांत ठाकुर
आपको याद होगा कि 28 फरवरी 2026 को ईरान की राजधानी तेहरान में इज़राइल और अमेरिका के संयुक्त हमले में शिया समुदाय के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद 9 जुलाई को उन्हें मशहद स्थित शिया समुदाय के पवित्र इमाम रज़ा दरगाह में राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके अंतिम संस्कार के साथ ही पिछले एक सप्ताह से चल रहे शोक समारोह, जुलूस और श्रद्धांजलि कार्यक्रम भी समाप्त हो गए।
अमेरिका और इज़राइल का कहना था कि यह कार्रवाई ईरान द्वारा क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाने, आतंकवाद को बढ़ावा देने तथा अमेरिकी और इज़राइली हितों को नुकसान पहुँचाने के प्रयासों को रोकने के लिए की गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले की पुष्टि करते हुए अयातुल्ला खामेनेई को एक प्रमुख "आतंकवादी" और दुनिया के सबसे खतरनाक नेताओं में से एक बताया था।
अमेरिकी प्रशासन का यह भी कहना था कि यह हमला मध्य-पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों और सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा ईरान के शत्रुतापूर्ण नेटवर्क को ध्वस्त करने के उद्देश्य से किया गया आवश्यक रक्षात्मक कदम था। वहीं, इज़राइली रक्षा और खुफिया अधिकारियों ने इसे ईरान के शीर्ष नेतृत्व के विरुद्ध पूर्व-नियोजित, रणनीतिक और अत्यंत सटीक सैन्य अभियान बताया।
इज़राइल का आरोप था कि ईरान के सर्वोच्च नेता के नेतृत्व में ही इज़राइल को समाप्त करने और पूरे क्षेत्र में प्रॉक्सी युद्ध छेड़ने की साजिश रची जा रही थी। खामेनेई की मौत के बाद ईरान ने अमेरिका और इज़राइल को गंभीर परिणाम भुगतने तथा कड़ा प्रतिशोध लेने की चेतावनी दी थी।
ईरान की ओर से जारी आधिकारिक बयानों में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई नए सर्वोच्च नेता बने। अपने पहले सार्वजनिक संदेश में उन्होंने कहा, "बदला हमारे देश की मांग है और इसे हर हाल में पूरा किया जाएगा।" उन्होंने इस हमले को "कायरतापूर्ण हत्या" करार देते हुए कहा कि दुनिया के स्वतंत्र लोग शीघ्र ही इस "दिव्य मिशन" का हिस्सा बनेंगे।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के शीर्ष कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी ने भी अमेरिका और इज़राइल को चेतावनी देते हुए कहा कि अपराधियों, विशेषकर "बच्चों की हत्या करने वाली अमेरिकी सेना", को उचित जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि शहीदों का बदला लेना और दोषियों को दंडित करना ईरान की स्थायी और न्यायोचित प्रतिबद्धता है। ईरान सरकार ने आधिकारिक रूप से आरोप लगाया कि अमेरिका और इज़राइल ने एक "खतरनाक लाल रेखा" पार कर दी है, जिसके बाद उसके पास जवाबी कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इसके तुरंत बाद ईरान ने पूरे मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इज़राइल को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए।
अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने पूरे मध्य-पूर्व को अस्थिर कर दिया है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वर्ष 2024 के बाद यह संघर्ष प्रॉक्सी युद्ध से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में बदल गया। अप्रैल और अक्टूबर 2024 में ईरान ने सीधे इज़राइल पर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे। इराक, सीरिया और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी तथा इज़राइली सैन्य ठिकानों पर 200 से अधिक हमले हुए, जिनके जवाब में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान से जुड़े कई ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले किए।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने से गैस और कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयातक देशों पर महंगाई और आर्थिक दबाव के रूप में दिखाई दे रहा है। वर्तमान में इज़राइल, अमेरिका के समर्थन से ईरान पर व्यापक सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित है।
इस युद्ध का प्रभाव भारत पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारत के तेल आयात, रणनीतिक निवेश और पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर इसका सीधा असर पड़ा है। हाल ही में अमेरिकी हमलों में ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के शाहिद बहश्ती टर्मिनल को नुकसान पहुँचा। भारत इस बंदरगाह का 10 वर्ष के समझौते के तहत संचालन कर रहा है और इसे अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया के साथ व्यापार का महत्वपूर्ण प्रवेश-द्वार मानता है।
भारत के कुल मासिक तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत, यानी करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है, जिससे भारत का आयात बिल और व्यापार घाटा दोनों बढ़ने की आशंका है। दूसरी ओर, ईरान ने बहरीन, कतर और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी मिसाइलें दागी हैं। इन देशों में लाखों भारतीय कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा और रोजगार पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
ईरान परमाणु समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी थी, जिसके बदले उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाने थे। बाद में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया और ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इसके जवाब में ईरान ने भी समझौते की शर्तों का उल्लंघन करते हुए यूरेनियम संवर्धन का स्तर बढ़ा दिया, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा गया।
जून 2026 में दोनों देशों के बीच युद्धविराम और शांति समझौता हुआ, जिसके तहत ईरान को हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने तथा जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी, जबकि अमेरिका को नौसैनिक प्रतिबंधों में ढील देनी थी। लेकिन यह समझौता कुछ ही दिनों में टूट गया। अमेरिकी जहाजों पर हमलों का हवाला देते हुए अमेरिका ने जुलाई 2026 में ईरान के तटीय ठिकानों पर बमबारी की, जिसके जवाब में ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं।
कुल मिलाकर अमेरिका और ईरान के बीच हुए अधिकांश समझौते अस्थायी साबित हुए हैं। दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास और मध्य-पूर्व में रणनीतिक हितों का टकराव हर बार किसी न किसी सैन्य संघर्ष का कारण बनता रहा है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर अमेरिका, इज़राइल के साथ मिलकर विश्व को क्या संदेश देना चाहता है? लेखक की दृष्टि में इस बार ईरान ने अमेरिका के शक्ति प्रदर्शन को प्रभावी चुनौती दी है।
यह सभी जानते हैं कि अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह समय-समय पर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर पूरी दुनिया को भयभीत करता रहे। कई अवसरों पर ईरान के साथ समझौते होने के बावजूद अमेरिका ने उन्हें तोड़ा और आज भी दोनों देशों के बीच हमले और जवाबी हमले जारी हैं।
उधर रूस और यूक्रेन पिछले चार वर्षों से युद्ध लड़ रहे हैं, जबकि इधर अमेरिका और इज़राइल एशियाई क्षेत्र में सैन्य अभियान चला रहे हैं। युद्ध केवल जान-माल की हानि नहीं करता, बल्कि पूरी दुनिया को भय और असुरक्षा के वातावरण में धकेल देता है। आज भी विश्व में ऐसे अनेक नेता और संस्थाएँ हैं, जो प्रभावी मध्यस्थता के माध्यम से शांति स्थापित कर सकती हैं और भविष्य में किसी बड़े वैश्विक संकट को टाल सकती हैं।
1940 के दशक के अंत में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन से पूछा गया था कि तीसरा विश्वयुद्ध कैसा होगा। उन्होंने उत्तर दिया था, "मैं नहीं जानता कि तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा।"
आज की परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रश्न स्वतः उठता है—क्या कहीं आइंस्टाइन की यह आशंका सच साबित होने की दिशा में तो नहीं बढ़ रही है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)
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