रायपुर। इथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल को लेकर देश में चल रही बहस के बीच छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक महत्वपूर्ण उपभोक्ता मामला सामने आया है। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक वाहन मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए वाहन निर्माता और डीलर को नई कार उपलब्ध कराने अथवा वाहन की पूरी कीमत लौटाने का निर्देश दिया है। आयोग ने मानसिक प्रताड़ना और मुकदमेबाजी के खर्च के लिए भी अलग से मुआवजा देने का आदेश दिया है।
मामले की शुरुआत वर्ष 2024 में हुई, जब रायपुर के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रेमराज डेब्टा ने एक हाइब्रिड एसयूवी खरीदी। कुछ महीनों तक वाहन सामान्य रूप से चलता रहा, लेकिन बाद में बार-बार इंजन और हाइब्रिड सिस्टम में खराबी आने लगी। हर बार अधिकृत सर्विस सेंटर में जांच कराने पर वाहन को "दूषित ईंधन" से प्रभावित बताया गया। फ्यूल टैंक की सफाई की गई, लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई और वाहन लगातार खराब होता रहा।
बाद में कंपनी की ओर से वाहन का इंजन बदलने की सलाह दी गई। इसके लिए करीब 5.30 लाख रुपये का अनुमानित खर्च बताया गया, जिसे वारंटी के दायरे से बाहर माना गया। वाहन मालिक ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा अधिकृत पेट्रोल पंपों से ही ईंधन भरवाया था और यदि बाजार में मुख्य रूप से E20 पेट्रोल उपलब्ध है तो उसकी जिम्मेदारी उपभोक्ता पर नहीं डाली जा सकती।
लगातार तकनीकी दिक्कतों और समाधान नहीं मिलने के बाद मामला जिला उपभोक्ता आयोग पहुंचा। सुनवाई के दौरान वाहन निर्माता और डीलर ने दावा किया कि संबंधित मॉडल E20 ईंधन के अनुकूल है तथा खराबी का कारण ईंधन नहीं, बल्कि अन्य तकनीकी कारण हो सकते हैं।
हालांकि आयोग ने उपलब्ध साक्ष्यों और मरम्मत के रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि वाहन में एक जैसी समस्या बार-बार सामने आई और अधिकृत सर्विस सेंटर भी उसका स्थायी समाधान नहीं कर सका। आयोग ने यह भी कहा कि जब अधिकांश पेट्रोल पंपों पर E20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है, तब उपभोक्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी अन्य प्रकार का ईंधन तलाशे।
इन्हीं आधारों पर आयोग ने वाहन निर्माता और डीलर को 45 दिनों के भीतर उपभोक्ता को उसी मॉडल की नई E20-अनुकूल कार उपलब्ध कराने या वाहन की पूरी कीमत, लगभग 20.50 लाख रुपये, लौटाने का निर्देश दिया। इसके अलावा मानसिक पीड़ा के लिए एक लाख रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 10 हजार रुपये देने का भी आदेश दिया गया है। निर्धारित अवधि में आदेश का पालन नहीं होने पर देय राशि पर ब्याज भी देना होगा।
उपभोक्ता मामलों के जानकार इस फैसले को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह निर्णय उन परिस्थितियों में उपभोक्ताओं के अधिकारों को मजबूती देता है, जहां सरकार की ईंधन नीति और वाहन निर्माताओं के दावों के बीच उत्पन्न विवाद का असर सीधे आम वाहन मालिकों पर पड़ता है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ भी बन सकता है।
