बाबा बैद्यनाथ धाम में स्पर्श पूजा परंपरा को अक्षुण्ण रखने और सुगम दर्शन व्यवस्था के लिए तीर्थ पुरोहित चंद्रशेखर खवाड़े ने सीएम को ज्ञापन सौंपा। पढ़ें 8 प्रमुख मांगें।

 

कंचन क्रांति न्यूज, देवघर।

 

विश्वप्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल और 51 शक्तिपीठों में से एक बाबा बैद्यनाथ धाम की सदियों पुरानी 'स्पर्श पूजा' परंपरा को अक्षुण्ण रखते हुए श्रद्धालुओं के लिए सुगम एवं सुरक्षित व्यवस्था बनाने की मांग उठी है। इस संबंध में देवघर के प्रसिद्ध तीर्थ पुरोहित एवं धार्मिक/सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर खवाड़े ने झारखंड के मुख्यमंत्री सह 'बाबा बैद्यनाथ-बासुकीनाथ धाम तीर्थ विकास प्राधिकार' के अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपा है।

 

स्मरण, दर्शन और स्पर्श का अपना धार्मिक महत्व

 

मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में चंद्रशेखर खवाड़े ने शास्त्रों और कांवड़ यात्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि सनातन धर्म में केवल गंगा जल चढ़ाना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि श्रद्धालु की तपस्या, श्रम और भावना जुड़ी होती है। ठीक उसी तरह बाबा बैद्यनाथ के सानिध्य में जाकर स्पर्श पूजा करना करोड़ों भक्तों की अटूट आस्था का प्रतीक है। भीड़ प्रबंधन या प्रशासनिक सुविधा के नाम पर सदियों पुरानी इस धार्मिक परंपरा को समाप्त करना या श्रद्धालुओं को वंचित करना उचित नहीं है।

 

ज्ञापन में रखी गईं 8 मुख्य मांगें व सुझाव:


सीधी व्यवस्था: कांवड़ियों को अलग-अलग रास्तों पर घुमाने के बजाय मानसरोवर क्यू कॉम्प्लेक्स से सीधे गर्भगृह तक ले जाकर जलाभिषेक कराया जाए।

1.    संस्कार मंडप का मूल उपयोग: संस्कार मंडप को भीड़ नियंत्रण का जरिया न बनाकर मुंडन, उपनयन, विवाह जैसे धार्मिक कार्यों के लिए ही आरक्षित रखा जाए।

2.    शीघ्र दर्शनम् के लिए प्रतीक्षालय: शीघ्र दर्शनम् के श्रद्धालुओं को सड़कों पर खड़ा रखने के बजाय पाठक धर्मशाला या उमा भवन के कमरों/प्रतीक्षालयों में बिजली, पंखा, पेयजल की सुविधा दी जाए।

3.    प्रोटोकॉल पूजा का समय सीमा तय हो: वीआईपी/प्रोटोकॉल दर्शन के लिए रोजाना 1 से 2 घंटे का समय निश्चित हो तथा नियमानुसार कूपन या शुल्क व्यवस्था लागू कर पारदर्शिता लाई जाए।

4.    प्रोटोकॉल के लिए अलग बल: वीआईपी पूजा के लिए अलग सुरक्षा बल तैनात हों और पूजा खत्म होते ही उन्हें आम श्रद्धालुओं की व्यवस्था से हटा लिया जाए।

5.    संयुक्त समन्वय समिति: निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए जिला प्रशासन, मंदिर प्रबंधन और पंडा धर्मरक्षिणी सभा की संयुक्त समन्वय समिति का पुनर्गठन हो।

6.    धार्मिक प्रतिनिधियों की सहभागिता: पूजा-पद्धति और परंपरा से जुड़े किसी भी फैसले से पहले पंडा समाज, विद्वान आचार्यों और तीर्थ पुरोहितों से सलाह ली जाए।

7.    तकनीक का उपयोग हो, हस्तक्षेप नहीं: डिजिटल रजिस्ट्रेशन, स्लॉट बुकिंग और सीसीटीवी जैसी तकनीक का स्वागत है, लेकिन इसका उपयोग सुविधा देने के लिए हो, सनातन पूजा-पद्धति में बदलाव के लिए नहीं।

 

श्रद्धा को व्यवस्था नहीं, व्यवस्था को श्रद्धा के अनुरूप ढालें

 

चंद्रशेखर खवाड़े ने स्पष्ट किया कि तीर्थ पुरोहित समाज सुरक्षा या भीड़ नियंत्रण का विरोधी नहीं है। उनका स्पष्ट मानना है कि किसी धाम की पहचान इमारतों से नहीं, उसकी जीवंत परंपराओं से होती है। इसलिए "परंपरा में परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार" ही समय की वास्तविक मांग है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मुख्यमंत्री इस विषय पर संवेदनशील और परंपरा-सम्मत निर्णय लेंगे।

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