शृंखला-3 और अंतिम

जहाँ की हवाओं में वेदों की ऋचाएं और घंटियों की गूँज घुलती थी, आज उसी बाबाधाम की पावन नगरी में संस्कृत का एक पूरा भविष्य दम तोड़ रहा है। कभी जिस प्रांगण में छह सौ से अधिक मेधावी छात्र ज्ञान की अलख जगाते थे, आज वहाँ 50 छात्रों के बैठने तक के लिए ढंग की जगह नहीं बची है। महर्षि बालानंद द्वारा दान की गई करोड़ों की इस ऐतिहासिक थाती और सांस्कृतिक विरासत को उपेक्षा का दीमक खा रहा है। क्या हम अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों के उखड़ने का तमाशा चुपचाप देखते रहेंगे? बालानंद संस्कृत महाविद्यालय की इस विशेष शृंखला के अंतिम और सबसे संवेदनशील हिस्से में आइए जानते हैं, देवघर में संस्कृत के इस अधूरे सपने और मेधावियों के पलायन की पूरी दास्तान।

तरुण कुमार कंचन, देवघर।

मुख्य बिंदु

  • छात्रों का पलायन: बुनियादी सुविधाओं, छात्रवृत्ति और छात्रावास के अभाव में झारखंड के मेधावी छात्र बनारस, अयोध्या और वृंदावन जाने को विवश हैं।
  • विश्वविद्यालय का अटका प्रस्ताव: वर्ष 2019 में बाबा बैद्यनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए गजट प्रकाशित हुआ था और जमीन अधिग्रहण की बात भी उठी थी, लेकिन 5 साल बाद भी धरातल पर कुछ नहीं दिखा।
  • पुराना पाठ्यक्रम: आज भी यहाँ वार्षिक परीक्षा प्रणाली और दशकों पुराना सिलेबस चल रहा है, सेमेस्टर सिस्टम तक लागू नहीं हुआ है।
  • संरक्षण की पुकार: करोड़ों की इस ऐतिहासिक संपत्ति और संस्कृति की थाती को बचाने के लिए विशेष प्रशासनिक कमेटी और भवन निर्माण की सख्त जरूरत है।

 

महाविद्यालय में छात्रों की स्थिति के बारे में पूछने पर डॉ. गोपालचंद्र झा ने बताया कि वर्तमान में लगभग 150 छात्रों के नाम नामांकित हैं, लेकिन विडंबना यह है कि यदि एक साथ 50 छात्र भी आ जाएं, तो उन्हें बैठाने के लिए ढंग की जगह तक नहीं है।

देवघर में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की चर्चा पर उन्होंने बताया, वर्ष 2019 में देवघर में 'बाबा बैद्यनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय' की स्थापना के लिए पूरी तैयारी हो चुकी थी और इसका गजट भी प्रकाशित हो चुका था। यह भी सुनने में आया था कि सरकार बैद्यनाथ धाम में 20 एकड़ जमीन इस विश्वविद्यालय के लिए अधिग्रहित करने जा रही है और जिला प्रशासन ने जमीन उपलब्ध भी कराई है। महाविद्यालय के नए भवन के लिए डीपीआर (DPR) बनने और इंजीनियरों द्वारा माप-जोख की बातें भी हुईं, लेकिन लगभग पाँच साल बीत जाने के बाद भी जमीन पर कुछ नजर नहीं आया।

 

उन्होंने याद दिलाया कि यह कॉलेज महर्षि बालानंद द्वारा स्थापित है, जिन्होंने 1 अगस्त 1936 को इसकी स्थापना कर शिक्षा और संस्कृत के विकास के लिए अपनी बेशकीमती भूमि और संपत्ति दान दी थी। आज के समय में यह करोड़ों की संपत्ति है, जिसकी उचित देखभाल और संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

लाइब्रेरी की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए डॉ. झा ने बताया कि भवन के ऊपरी हॉल में आज भी लगभग 4,000 बहुमूल्य पुस्तकें, वेद, कर्मकांड, ज्योतिष और बांग्ला लिपि में रचित संस्कृत ग्रंथ व पांडुलिपियां मौजूद हैं। कुछ समय पहले पुरातत्व विभाग की दिल्ली से आई टीम ने इन दुर्लभ ताम्रपत्रों, तालपत्रों और पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन तो किया, लेकिन मुख्य समस्या आज भी जर्जर और असुरक्षित भवन की है।

 अंत में, छात्रों के पलायन के दर्द को बयां करते हुए डॉ. झा कहते हैं, आज भी छात्रों की रुचि संस्कृत में कम नहीं हुई है, लेकिन हमारे पास न तो रहने के लिए छात्रावास बचा है और न ही आधुनिक संसाधन। गरीब परिवारों से आने वाले संस्कृत छात्र उचित सुविधाओं (जैसे छात्रवृत्ति और आवास) के अभाव में झारखंड से पलायन कर बनारस, अयोध्या और वृंदावन जाने को मजबूर हैं। एक समय था जब यहाँ 600 से अधिक छात्र पढ़ते थे, और आज हालत यह है कि हम 50 छात्रों को भी ठीक से नहीं बैठा सकते। यहाँ तक कि आज भी प्राचीन पाठ्यक्रम चल रहा है और सेमेस्टर सिस्टम तक लागू नहीं हुआ है।

बाबा बैद्यनाथ की पावन नगरी में स्थित इस प्राचीन संस्थान का सुसज्जित होना और एक स्वतंत्र संस्कृत विश्वविद्यालय का सपना साकार होना बेहद जरूरी है, ताकि झारखंड की यह सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।