पटना की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के प्रशांत किशोर ने भाजपा उम्मीदवार नीरज को 18,953 वोटों से हराया। जानिए इस हार-जीत का पूरा ब्योरा और राजनीतिक विश्लेषण।
कंचन क्रांति ब्यूरो, पटना।
बिहार की राजधानी पटना के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने सूबे की राजनीति में भूचाल ला दिया है। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी नीरज को 18,953 मतों के भारी अंतर से पराजित कर एक नया इतिहास रच दिया है।

कुल 31 दौर की लंबी मतगणना के बाद सामने आए आंकड़ों के अनुसार प्रशांत किशोर को कुल 63,203 वोट मिले, जो कुल पड़े मतों का 49 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा है। वहीं, कड़ी टक्कर दे रही भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज को 44,250 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। इस त्रिकोणीय मुकाबले में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता काफी पिछड़ गईं और उनकी झोली में मात्र 14,085 वोट ही आ सके। तीन दशकों से भाजपा का अभेद्य किला समझे जाने वाले बांकीपुर में मिली यह शिकस्त केवल एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ एनडीए के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका मानी जा रही है।
जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण भाजपा के किले का ढहना- राजद
बांकीपुर उपचुनाव के चौंकाने वाले नतीजों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने कहा कि इस चुनाव में जीत किसकी हुई है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में करारी हार का सामना करना पड़ा है।
राजद प्रवक्ता ने कहा कि बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र बिहार की 243 सीटों में भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता रहा है, जहां से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नवीन लगातार भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज करते रहे हैं। इस उपचुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पार्टी द्वारा अपने 40 स्टार प्रचारकों, केंद्रीय मंत्रियों, बिहार सरकार के सभी मंत्रियों, एनडीए के लगभग 100 सांसदों तथा विभिन्न राज्यों से बुलाए गए हजारों कार्यकर्ताओं को मैदान में उतार दिया गया था। इसके बावजूद मिली यह करारी हार यह साबित करती है कि केंद्र और राज्य की एनडीए सरकार के खिलाफ आम जनता में जबरदस्त आक्रोश व्याप्त है।
उन्होंने आगे जोड़ा कि हाल के दिनों में दिल्ली, पटना सहित देश के विभिन्न हिस्सों में छात्रों और नौजवानों का जो गुस्सा सड़कों पर दिखाई दिया था, बांकीपुर का यह जनादेश उसी जन-आक्रोश का सीधा प्रतिबिंब है। राजद को भले ही इस चुनाव में अपेक्षित वोट न मिले हों, लेकिन पार्टी और कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों पर जनता ने अपनी मुहर लगाकर भाजपा को उसकी वास्तविक हैसियत बता दी है।
बांकीपुर में भाजपा की हार के राजनीतिक निहितार्थ
बांकीपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट पर मिली पराजय के राजनीतिक मायने केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने वाले हैं, बल्कि इसके दूरगामी असर बिहार की भावी राजनीति पर पड़ेंगे:
टेकन फॉर ग्रांटेड मानने की राजनीति का अंत:
यह जनादेश इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि किसी भी राजनीतिक दल का परंपरागत या कैडर वोटर अब ‘बंधुआ मजदूर’ नहीं रह गया है। यदि सत्ताधारी दल मतदाता को विकल्पहीनता की स्थिति में धकेलने की कोशिश करेंगे, तो जागरूक मतदाता किसी तीसरे विकल्प को चुनकर या गोलबंद होकर सबक सिखाने की ताकत रखता है।
केवल शीर्ष नेतृत्व के भरोसे जीत संभव नहीं
बांकीपुर के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि चुनाव अब केवल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के चेहरे, बड़े-बड़े दावों या चुनाव चिह्न के सहारे नहीं जीते जा सकते। यदि धरातल पर उम्मीदवार जन-अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है, तो जनता पार्टी निष्ठा से ऊपर उठकर फैसला सुनाती है।
जमीन से कटे स्थानीय नेताओं के लिए कड़ा संदेश
यह हार उन तमाम स्थानीय नेताओं और क्षत्रपों के लिए खुली चेतावनी है जो जनता से जमीनी संवाद तोड़ चुके हैं और केवल सोशल मीडिया व हवा-हवाई दावों के दम पर राजनीति चला रहे हैं। प्रशांत किशोर की इस जीत ने बिहार में एक मजबूत 'तीसरे कोण' की उपस्थिति दर्ज करा दी है, वहीं भाजपा के लिए यह अपने पुराने गढ़ में हुई इस बड़ी दरार पर गहरे आत्ममंथन का समय है।
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