तीन दशक तक ‘सीरियल किलर’ की तरह जान लेती रही बीमारी के खिलाफ 2005 में शुरू हुई थी निर्णायक लड़ाई
15 साल पहले तैयार NEEP की 10 सूत्री कार्ययोजना को अब सरकार और नीति-निर्माता अपना रहे
डॉ. सिंह बोले- उम्मीद की छोटी-सी लौ आज बन चुकी है उजाला, अभियान के साथियों को दिया जीत का श्रेय


गोरखपुर। पूर्वांचल में तीन दशकों से अधिक समय तक हर साल मासूमों की जिंदगी छीनने वाली इंसेफेलाइटिस के खिलाफ लंबी लड़ाई अब निर्णायक मुकाम पर पहुंचती दिखाई दे रही है। जापानी इंसेफेलाइटिस (JE) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) अब नियंत्रण में हैं। इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के मुख्य अभियानकर्ता डॉ. आर. एन. सिंह ने इसे ‘इंसेफेलाइटिस के अंत की शुरुआत’ करार दिया है।

डॉ. सिंह ने जुलाई 2026 में जारी अपने वक्तव्य में कहा कि वर्ष 2005 में हालात बेहद भयावह थे। इंसेफेलाइटिस तीन दशकों से भी अधिक समय से हर वर्ष ‘सीरियल किलर’ की तरह लोगों की जान ले रही थी। ऐसे दौर में इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान ने उम्मीद की एक छोटी-सी लौ जलाई और बीमारी के खिलाफ सुनियोजित एवं निर्णायक संघर्ष की शुरुआत की।

30 वर्षों के अंधेरे को दूर करने के लिए बना NEEP

डॉ. आर. एन. सिंह के मुताबिक, इंसेफेलाइटिस के कारण कायम लगभग 30 वर्षों के गहरे अंधेरे को खत्म करने के उद्देश्य से NEEP के नाम से 10 सूत्री कार्ययोजना तैयार की गई थी। इसके माध्यम से इंसेफेलाइटिस पर नियंत्रण के लिए विभिन्न स्तरों पर समन्वित और ठोस कार्रवाई की रूपरेखा बनाई गई।

उन्होंने कहा कि उस दौर में शुरू किया गया प्रयास आज अपने परिणाम दिखा रहा है। जेई और एईएस का नियंत्रण में आना वर्षों तक चले संघर्ष और लगातार किए गए प्रयासों की बड़ी उपलब्धि है।

‘छोटी-सी लौ अब बन चुकी है उजाला’

डॉ. सिंह ने कहा, “आज मुझे अत्यंत आत्मिक संतोष है। वर्ष 2005 में हमने उम्मीद की जो छोटी-सी लौ जलाई थी, वह आज एक उज्ज्वल प्रकाश बन चुकी है। जेई और एईएस आखिरकार नियंत्रण में हैं।”

उनके अनुसार, इस उपलब्धि से भी ज्यादा संतोष की बात यह है कि NEEP के तहत करीब 15 वर्ष पहले जिन 10 कदमों की योजना बनाई गई थी, उन्हें अब सरकार और नीति-निर्माता इंसेफेलाइटिस नियंत्रण के लिए अपना रहे हैं और क्षेत्र में उन पर अमल किया जा रहा है।

सरकार की नीतियों का हिस्सा बने अभियान के सुझाव

डॉ. आर. एन. सिंह ने कहा कि वर्षों पहले इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान ने बीमारी से मुकाबले के लिए जो रास्ता सुझाया था, उसके सभी 10 बिंदुओं को आज सरकारी स्तर पर स्वीकार कर व्यवहार में लाया जाना अभियान की बड़ी उपलब्धि है।

उन्होंने कहा कि इससे साबित होता है कि सही दिशा में निरंतर और प्रतिबद्ध प्रयास किए जाएं तो दशकों पुरानी गंभीर समस्या को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

‘यह जीत मेरे साथियों की है’

डॉ. सिंह ने इस सफलता का श्रेय इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान से जुड़े अपने सहयोगियों को दिया। उन्होंने कहा कि अभियान को आगे बढ़ाने के लिए अनेक लोगों ने वर्षों तक निःस्वार्थ भाव से अपना खून-पसीना बहाया।

उन्होंने कहा, “इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के उन सभी सह-अभियानकर्ताओं के प्रति मेरा गहरा आभार है, जिन्होंने इस लड़ाई में निःस्वार्थ भाव से अपना खून-पसीना बहाया। यह जीत आप सभी की है।”

डॉ. आर. एन. सिंह ने उम्मीद जताई कि इंसेफेलाइटिस के खिलाफ हासिल इस सफलता को आगे भी कायम रखा जाएगा। नियंत्रण की मौजूदा स्थिति को अंतिम मंजिल न मानते हुए बीमारी के पूर्ण उन्मूलन की दिशा में प्रयास जारी रखने होंगे। उनके मुताबिक, जिस बीमारी ने दशकों तक हजारों परिवारों को भय और पीड़ा में रखा, उसके खिलाफ अब उम्मीद की वह छोटी-सी लौ एक बड़े उजाले में बदल चुकी है।