चांदीपुरा वायरस को लेकर इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के डॉ. आरएन सिंह ने केंद्र से सतर्कता बढ़ाने की मांग की है। जानिए इसके लक्षण, बचाव और रोकथाम के उपाय।

गोरखपुर। राजस्थान और गुजरात में चांदीपुरा वायरल इंसेफेलाइटिस के बढ़ते मामलों को देखते हुए इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान ने केंद्र सरकार और स्वास्थ्य विभागों से देश भर में सतर्कता बढ़ाने की मांग की है। अभियान ने मांग की है कि इंसेफेलाइटिस की रोकथाम और नियंत्रण के लिए बनाए गए राष्ट्रीय कार्यक्रम को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।

 अभियान के मख्य समन्वयक (चीफ कैंपेनर) डॉ. आरएन सिंह ने कहा कि स्थिति को गंभीरता से लेते हुए बच्चों की निगरानी, समय पर पहचान और त्वरित उपचार की व्यवस्था को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।

 डॉ. सिंह के अनुसार, चांदीपुरा वायरस मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करने वाला एक गंभीर वायरल इंसेफेलाइटिस है। 'रैबडोविरिडी' परिवार से संबंधित यह वायरस सबसे पहले वर्ष 1965 में महाराष्ट्र के चांदीपुरा गांव में सामने आया था। उन्होंने बताया कि गंभीर मामलों में इसके लक्षण तेजी से विकसित होते हैं। इसलिए यदि किसी बच्चे को तेज बुखार के साथ बेहोशी, अचेत अवस्था, झटके (दौरे) या व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई दें, तो उसे बिना देर किए तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।

 उन्होंने बताया कि इस संक्रमण की रोकथाम में वेक्टर नियंत्रण (सैंडफ्लाई/मच्छर) और व्यक्तिगत सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए घरों के आसपास साफ-सफाई रखने, बच्चों को पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनाने और सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करने पर जोर दिया जाना चाहिए। ग्रामीण इलाकों में कच्चे मकानों की दीवारों और फर्श की दरारों सहित संभावित कीट प्रजनन स्थलों पर कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत है।

 डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि चांदीपुरा वायरल इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए फिलहाल कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा या टीका उपलब्ध नहीं है। ऐसे में बीमारी की शुरुआती पहचान, मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचाना और सहायक चिकित्सा (सपोर्टिव केयर) देना ही सबसे महत्वपूर्ण उपाय है।

 उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि राजस्थान और गुजरात में सामने आ रहे मामलों को देखते हुए अन्य संभावित प्रभावित राज्यों में भी सर्विलांस और स्वास्थ्य तंत्र को अलर्ट पर रखा जाए। उन्होंने याद दिलाया कि इंसेफेलाइटिस नियंत्रण के लिए वर्ष 2014 में तैयार राष्ट्रीय कार्यक्रम को फिर से पूरी सक्रियता के साथ लागू किया जाना चाहिए।

 डॉ. आरएन सिंह ने कहा कि उनका अभियान वर्ष 2005 से 2014 तक इंसेफेलाइटिस की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लगातार कार्य करता रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि बच्चों के स्वास्थ्य पर मंडराते इस खतरे को देखते हुए निगरानी, जन-जागरूकता और उपचार व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जाए।

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