- ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ की मान्यता से विशिष्ट है देवघर की दुर्गापूजा, तांत्रिक परंपराओं से लेकर भव्य पूजा पंडालों तक दिखती है आस्था और संस्कृति की अनूठी छटा
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
शारदीय नवरात्र के आगमन के साथ ही शिव और शक्ति की आराधना के लिए विख्यात बाबानगरी देवघर में दुर्गोत्सव की रौनक बढ़ने लगी है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहर की सड़कों और पूजा पंडालों तक शारदीय उत्सव का उल्लास दिखाई देने लगा है। खेतों और खुले मैदानों में लहलहाते सफेद कास के फूल, महालया के पारंपरिक गीत और मां दुर्गा के आगमन की तैयारियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि प्रकृति से लेकर जनजीवन तक हर तरफ उत्सव का रंग चढ़ चुका है, लेकिन देवघर का दुर्गोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह आस्था, प्राचीन उपासना पद्धतियों, लोकमान्यताओं और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के मेल से बनी ऐसी विरासत है, जो इसे दूसरे शहरों से अलग पहचान देती है।
बाबा बैद्यनाथ की नगरी में शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व इसलिए भी है कि यहां शिव और शक्ति की उपासना एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। एक तरफ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ धाम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, तो दूसरी ओर माता सती के हृदय से जुड़ी शक्तिपीठ की मान्यता इस क्षेत्र को शक्ति साधना की दृष्टि से विशिष्ट बनाती है। यही धार्मिक पृष्ठभूमि देवघर के दुर्गोत्सव को एक अलग स्वरूप प्रदान करती है। यहां नवरात्र के दौरान देवी की आराधना केवल सार्वजनिक पूजा पंडालों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मंदिरों की परंपराओं, पारिवारिक अनुष्ठानों और लोकजीवन में भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
देवघर की दुर्गापूजा क्यों है विशिष्ट

देवघर की धार्मिक पहचान बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी है। शिवभक्तों के लिए यह नगरी जहां भगवान भोलेनाथ की आराधना का प्रमुख तीर्थ है, वहीं देवी उपासना की परंपराएं इसे शक्ति साधना का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं। शिव और शक्ति को एक-दूसरे का पूरक मानने वाली भारतीय धार्मिक परंपरा में देवघर का स्थान इसी कारण विशेष माना जाता है।
मंदिर के वरिष्ठ धर्माचार्य लम्बोदर परिहस्त और उदय शंकर के अनुसार, यहां द्वापर युग से तांत्रिक विधि-विधान के अनुरूप मां शक्ति की उपासना की परंपरा चली आ रही है। इस परंपरा का प्रभाव शारदीय नवरात्र के विशिष्ट अनुष्ठानों में भी देखने को मिलता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के अवसर पर मां काली, पार्वती और संध्या मंदिरों में विशेष धार्मिक प्रक्रियाएं संपन्न होने की परंपरा बताई जाती है। इन दिनों मंदिरों के कपाट बंद कर रातभर हवन कुंड में विशेष तांत्रिक अनुष्ठान किए जाने और विजयादशमी के दिन कपाट खोले जाने की परंपरा देवघर की पूजा-पद्धति को विशिष्ट बनाती है।
इन अनुष्ठानों का महत्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। इनके पीछे पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, साधना और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं की निरंतरता भी जुड़ी हुई है। यही कारण है कि देवघर में दुर्गापूजा को समझने के लिए केवल सजे हुए पंडालों और प्रतिमाओं को देखना पर्याप्त नहीं है। यहां के प्राचीन मंदिरों में निभाई जाने वाली परंपराएं भी इस उत्सव के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप को सामने लाती हैं।
दुर्गोत्सव के दौरान बाबानगरी में श्रद्धालुओं की आवाजाही भी बढ़ जाती है। सावन के महीने में जिस तरह कांवरिये बाबा बैद्यनाथ के जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं, उसी तरह शारदीय नवरात्र में भी दूर-दराज के क्षेत्रों से भक्त देवघर आते हैं। श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ और देवी मंदिरों में दर्शन-पूजन कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं। इससे शहर के धार्मिक वातावरण के साथ-साथ बाजारों, सड़कों और पूजा स्थलों पर भी विशेष चहल-पहल दिखाई देने लगती है।
मिथिला और बंगाल की संस्कृति का अनूठा संगम
देवघर के दुर्गोत्सव की एक बड़ी विशेषता यहां की सांस्कृतिक विविधता है। भौगोलिक निकटता, ऐतिहासिक संपर्क, धार्मिक संबंधों और लोगों के आपसी मेल-जोल ने इस नगरी के उत्सव को बहुरंगी स्वरूप दिया है। मिथिलांचल की लोकआस्था और बंगाल की दुर्गापूजा परंपरा, दोनों की छाप यहां के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में दिखाई देती है।
मिथिला की लोकआस्था और बाबानगरी का संबंध
देवघर और मिथिलांचल के बीच धार्मिक तथा सांस्कृतिक संबंध लंबे समय से रहे हैं। बिहार के सीतामढ़ी सहित मिथिलांचल के विभिन्न क्षेत्रों में माता सीता और माता पार्वती से जुड़ी लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। हालांकि माता पार्वती के मायके को लेकर अलग-अलग लोकपरंपराएं मिलती हैं, लेकिन मिथिला क्षेत्र और बाबानगरी के बीच श्रद्धा का संबंध स्थानीय धार्मिक विश्वासों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सहरसा और मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु विभिन्न अवसरों पर देवघर पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान भी इन क्षेत्रों से आने वाले भक्तों की उपस्थिति बाबानगरी के धार्मिक वातावरण को और जीवंत बनाती है। मैथिल परंपरा के गीत, पूजा-पद्धतियों से जुड़ी लोकस्मृतियां और पारिवारिक आस्था इस सांस्कृतिक रिश्ते को मजबूत करती हैं।
इस दृष्टि से देवघर का दुर्गोत्सव केवल स्थानीय लोगों का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की सहभागिता के कारण व्यापक सांस्कृतिक मिलन का अवसर बन जाता है। यहां आने वाले भक्त अपने साथ अपनी क्षेत्रीय परंपराएं और धार्मिक भावनाएं भी लेकर आते हैं, जिससे बाबानगरी की सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध होती है।
बंगाल की दुर्गापूजा शैली और भव्य सजावट
देवघर के दुर्गोत्सव पर बंगाल की सांस्कृतिक परंपरा का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। बंगाल में दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, शिल्प, संगीत, सामुदायिक भागीदारी और सार्वजनिक उत्सव का व्यापक रूप है। इसी परंपरा से प्रेरित होकर देवघर में भी आकर्षक पूजा पंडालों, कलात्मक प्रतिमाओं और भव्य विद्युत सज्जा का विशेष महत्व विकसित हुआ है।
पंडाल निर्माण में कारीगरों की कल्पनाशीलता, देवी प्रतिमाओं की बारीक कलाकारी और रोशनी की आकर्षक व्यवस्था श्रद्धालुओं के साथ-साथ आम लोगों को भी अपनी ओर खींचती है। चंदननगर की प्रसिद्ध विद्युत सज्जा से प्रेरित रंगीन रोशनी और सजावटी प्रकाश व्यवस्था रात के समय शहर के अनेक हिस्सों को उत्सवमय बना देती है।
इस सांस्कृतिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि धार्मिक आस्था के साथ कला और शिल्प को भी अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है। पंडालों की बनावट, प्रतिमाओं की सज्जा और प्रकाश व्यवस्था में स्थानीय आयोजकों के साथ विभिन्न क्षेत्रों के कारीगरों की भूमिका रहती है। इस तरह दुर्गोत्सव स्थानीय अर्थव्यवस्था, हस्तशिल्प और सामुदायिक सहभागिता को भी गति देता है।
मिथिला की लोकआस्था और बंगाल की कलात्मक दुर्गापूजा शैली का यह मेल देवघर को ऐसी सांस्कृतिक पहचान देता है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चलती हैं।
पूजा पंडालों में पौराणिक धरोहरों की झलक
शारदीय नवरात्र के दौरान देवघर के पूजा पंडालों में हर वर्ष कुछ नया देखने की उत्सुकता रहती है। समितियां धार्मिक आस्था को आकर्षक कलात्मक रूप देने के लिए अलग-अलग मंदिरों, ऐतिहासिक इमारतों और पौराणिक स्थापत्य शैलियों से प्रेरणा लेती हैं। इस बार भी कुछ पूजा स्थलों पर भव्य संरचनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को देश की प्रसिद्ध धार्मिक धरोहरों की झलक दिखाने का प्रयास किया गया है।
महालया से विजयादशमी तक: बाबानगरी में उत्सव का विस्तार
महालया को मां दुर्गा के आगमन की प्रतीकात्मक शुरुआत के रूप में देखा जाता है। पारंपरिक गीतों, देवी के आह्वान और शारदीय वातावरण के बीच श्रद्धालुओं की उत्सुकता धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। इसके बाद नवरात्र के विभिन्न दिनों में पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और सार्वजनिक आयोजनों का क्रम आगे बढ़ता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दौरान पूजा पंडालों में विशेष चहल-पहल रहती है, जबकि विजयादशमी के साथ दुर्गोत्सव अपने पारंपरिक समापन की ओर बढ़ता है।
देवघर में इस पूरे क्रम के भीतर दो स्वरूप समानांतर दिखाई देते हैं। एक ओर प्राचीन मंदिरों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी साधना है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक पूजा पंडालों में दिखाई देने वाली कलात्मक भव्यता और सामुदायिक उत्सवधर्मिता। इन दोनों के बीच मिथिला और बंगाल की सांस्कृतिक छाप बाबानगरी के दुर्गोत्सव को विशिष्ट बनाती है।
शारदीय नवरात्र का यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि किसी शहर की पहचान केवल उसके प्रमुख तीर्थ या ऐतिहासिक इमारतों से नहीं बनती, बल्कि वहां पीढ़ियों से जीवित धार्मिक परंपराओं, लोकविश्वासों, कला और सामाजिक सहभागिता से भी बनती है। बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर में दुर्गोत्सव इसी साझा विरासत का उत्सव है, जहां शिव और शक्ति की आराधना के साथ विविध संस्कृतियां एक-दूसरे से मिलती हैं और बाबानगरी को आस्था, परंपरा तथा सांस्कृतिक समन्वय की अनूठी पहचान प्रदान करती हैं।