पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी अपनी 3000 किमी की साइकिल यात्रा के तहत देवघर पहुँचे। आज शाम वे बाबा बैद्यनाथ मंदिर में करेंगे दर्शन। जानिए यात्रा से जुड़ी खास बातें।

कंचन क्रांति न्यूज, देवघर।

प्रख्यात पर्यावरणविद् और पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी आज शाम देवघर के प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ मंदिर में बाबा के दर्शन करेंगे। यह जानकारी देवघर में उनकी साइकिल यात्रा के स्वागतकर्ता और 'प्रवाह संस्था' के फाउंडर दिलीप कुमार दुबे ने दी।

 श्री दुबे ने बताया कि डॉ. जोशी आज मीडिया के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपनी बात रखेंगे और शाम करीब 6:00 बजे बाबा मंदिर पहुंचेंगे। उनका मानना है कि ईश्वर का आशीर्वाद तो जरूरी है ही, लेकिन ब्रह्मांड के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रकृति का संरक्षण उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर प्रकृति संरक्षण पर एक विशेष संगोष्ठी का भी आयोजन किया जा रहा है, जिसमें डॉ. जोशी मुख्य अतिथि होंगे।

नेपाल के जनकपुर धाम से शुरू हुई है यात्रा

पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के नेतृत्व में यह 3,000 किलोमीटर लंबी साइकिल यात्रा नेपाल के जनकपुर धाम से शुरू हुई है, जो झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश होते हुए उत्तराखंड के मेरठ में समाप्त होगी। शनिवार को जब यह यात्रा कटोरिया के रास्ते देवघर पहुँची, तो सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप कुमार दुबे ने उनका भव्य स्वागत किया। यात्रा में 17 साल के युवाओं से लेकर 70 साल तक के बुजुर्ग, लड़कियां और विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमि के कुल 20 लोग शामिल हैं।

प्रकृति ही प्रभु का वास्तविक स्वरूप है

मीडिया से बातचीत के दौरान डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि विकास और प्रगति के नाम पर मानव ने प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया है, जिसकी भारी कीमत आज पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। उन्होंने नेपाल, अमेरिका और यूरोप की हालिया प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र करते हुए चेतावनी दी कि अब समय आ गया है कि लोग गंभीर और संवेदनशील बनें। डॉ. जोशी ने कहा, प्रकृति को बचाने का अर्थ केवल पेड़-पौधों और नदियों को बचाना नहीं है, बल्कि अपने खुद के अस्तित्व को सुरक्षित रखना है। मनुष्य को अपनी बढ़ती आवश्यकताओं को सीमित करना होगा और जीवनशैली को प्रकृति के अनुकूल बनाना होगा। उन्होंने अंत में यह भी संदेश दिया कि लोगों को प्रकृति और प्रभु में अंतर नहीं समझना चाहिए, क्योंकि प्रकृति ही असल में प्रभु का स्वरूप है।

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