गोरखपुर। देश में खाद्य सुरक्षा, आवास और आयुष्मान भारत जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से करोड़ों लोगों तक सरकारी सहायता पहुंच रही है, लेकिन नवजात और शिशुओं के पोषण को लेकर अभी भी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। यह बात मिशन सेव इन इंडिया के डॉ. आर.एन. सिंह ने कही।
डॉ. सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध करा रही है, जरूरतमंदों और 70 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा भी दिया जा रहा है। इसके बावजूद नवजात शिशुओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषण—मां का दूध—समय पर उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण हर वर्ष लाखों बच्चों की जान खतरे में पड़ जाती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि इन कमजोर मानकों का सीधा असर नवजात और शिशु मृत्यु दर पर पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि भारत में शिशु मृत्यु दर अभी भी लगभग 24 प्रति हजार है, जबकि जापान जैसे देशों में यह केवल 2 प्रति हजार है। उत्तर प्रदेश की स्थिति और अधिक चिंताजनक है, जहां शिशु मृत्यु दर 35 प्रति हजार से अधिक बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जनजागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवहारगत सुधार है। अधिकांश माताओं के पास पर्याप्त स्तनदूध उपलब्ध होता है, जरूरत केवल जन्म के तुरंत बाद स्तनपान की सदियों पुरानी प्राकृतिक परंपरा को फिर से मजबूत करने की है।
डॉ. आर.एन. सिंह ने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश को 'बेबी फ्रेंडली स्टेट' बनाने की दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ द्वारा निर्धारित 'बेबी फ्रेंडली हॉस्पिटल इनिशिएटिव' के दस मानकों को लागू करना होगा। इन मानकों पर खरा उतरने के बाद प्रदेश को 'बेबी फ्रेंडली स्टेट' का प्रमाणपत्र मिल सकता है।
उन्होंने दावा किया कि यदि यह पहल प्रभावी ढंग से लागू की जाती है तो नवजात शिशु मृत्यु दर और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। उन्होंने सरकार, स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सकों और समाज से इस दिशा में संयुक्त प्रयास करने का आह्वान किया, ताकि प्रत्येक नवजात को जीवन की शुरुआत से ही सुरक्षित और पर्याप्त पोषण मिल सके।
