गोरखपुर। मिशन सेव इन इंडिया के डॉ. आर.एन. सिंह ने नीट पेपर लीक मामले और उससे जुड़े छात्र आंदोलन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को समय रहते सुनना सरकार की जिम्मेदारी है। उनका कहना है कि किसी भी जनआंदोलन की अनदेखी और संवाद से दूरी सत्ता तथा समाज, दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि सत्ता की चुप्पी और हठधर्मिता कई बार बड़े संकटों को जन्म देती है। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि धृतराष्ट्र की मौन स्वीकृति, दुर्योधन का आचरण और भीष्म पितामह की तटस्थता आज भी शासन-व्यवस्था के लिए सीख हैं। उनके अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने सोनम वांगचुक और आंदोलनकारी पक्ष से पहले ही बातचीत की होती, तो संभव है कि यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का बड़ा आंदोलन न बनता। उनका दावा है कि अब यह आंदोलन देश के विभिन्न हिस्सों तक फैल चुका है और करोड़ों युवाओं की भावनाओं से जुड़ गया है।
डॉ. आर.एन. सिंह ने स्पष्ट किया कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से पेपर लीक जैसी समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नैतिक जवाबदेही का भी अपना महत्व है। उन्होंने पूर्व रेल मंत्रियों द्वारा रेल दुर्घटनाओं के बाद नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीति में जवाबदेही और नैतिकता लोकतंत्र की महत्वपूर्ण पहचान रही है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की शिकायतों और सुझावों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने रामराज और मुगल काल के 'जहांगीरी घंटा' का उदाहरण देते हुए कहा कि अतीत की व्यवस्थाओं में भी आम नागरिक की बात सुनने की व्यवस्था थी। ऐसे में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संवाद और संवेदनशीलता की अपेक्षा स्वाभाविक है।
डॉ. सिंह ने कहा कि किसी भी सरकार के लिए जनहित के मुद्दों पर समय-समय पर लचीलापन और व्यवहारिकता दिखाना आवश्यक है। उनके अनुसार, सत्ता का अहंकार और हठधर्मिता लोकतंत्र को भीतर से कमजोर करती है। उन्होंने कहा, "जनता ही सत्ता को जनती है, सत्ता जनता को नहीं जन सकती। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनता की आवाज को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।"
