सोनम वांगचुक के 21 दिनों के अनशन और अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद उठ रहे हैं बड़े सवाल। जानिए लोकतंत्र में अहिंसक प्रतिरोध की ताकत, प्रशासनिक जवाबदेही और अनशन के इतिहास पर वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत ठाकुर का विश्लेषण।


भारतीय लोकतंत्र में आमरण अनशन केवल भूखे रहने का नाम नहीं रहा है। यह विरोध का वह अहिंसक और नैतिक हथियार रहा है, जिसके ज़रिए सत्ता के कठोर दरवाजों पर जन-चेतना की दस्तक दी जाती रही है।

आज़ादी से पहले महात्मा गांधी ने इसे हृदय परिवर्तन का माध्यम बनाया, तो स्वतंत्रता के बाद भी कई हस्तियों ने जनहित में इसी रास्ते को चुना। कई बार सत्ता झुकी और मांगें मानी गईं, तो कई बार अनशनकारियों ने अपनी मांगें पूरी होते देखने से पहले ही प्राण त्याग दिए।

आज सबसे बड़ा सवाल यह है: यदि व्यवस्था संवेदनहीन हो जाए, सत्ता विरोध की आवाज सुनने को तैयार ही न हो और अनशन को केवल पुलिस प्रशासन या मेडिकल इमरजेंसी का मामला मान लिया जाए—तो विरोध के इस गांधीवादी हथियार का अर्थ क्या रह जाता है?

गांधी से लेकर सानंद तक: जब अनशन ने देश को हिला दिया

आज़ादी के बाद जब देश सांप्रदायिक हिंसा से जूझ रहा था, तब महात्मा गांधी ने शांति बहाली के लिए अनिश्चितकालीन उपवास किया था। उनके गिरते स्वास्थ्य ने पूरे देश को बेचैन कर दिया और अंततः 18 जनवरी 1948 को शांति के ठोस आश्वासन के बाद उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया।

इसके बाद भी देश ने कई ऐतिहासिक और भावुक अनशन देखे:

पोट्टि श्रीरामुलु (1952): मद्रास प्रेसिडेंसी से अलग तेलुगुभाषी राज्य (आंध्र प्रदेश) की मांग को लेकर 58 दिनों तक अनशन किया। 58वें दिन उनका निधन हो गया, जिसके बाद भड़के जन-आंदोलन के आगे केंद्र सरकार को झुकना पड़ा।

दर्शन सिंह फेरुमान (1969): चंडीगढ़ को पंजाब में शामिल करने की मांग को लेकर 74 दिनों के अनशन के दौरान शहीद हो गए।

प्रो. जी.डी. अग्रवाल / स्वामी सानंद (2018): मां गंगा की अविरलता और संरक्षण के लिए 111 दिनों तक अनशन किया और अंततः अपने प्राण त्याग दिए।

इरोम चानू शर्मिला: मणिपुर से अफस्पा (AFSPA) हटाने की मांग को लेकर करीब 16 वर्षों तक भूख हड़ताल की—जो दुनिया का सबसे लंबा विरोध प्रदर्शन माना जाता है।

सोनम वांगचुक का आंदोलन: लद्दाख की मांग से लेकर नीट विवाद तक

अहिंसक प्रतिरोध की इसी कड़ी में नवीनतम नाम सोनम वांगचुक का है।

वांगचुक केवल एक आंदोलनकारी नहीं हैं—वह एक प्रसिद्ध इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। वर्ष 1988 में उन्होंने लद्दाख में 'सेकमोल' (SECMOL) संस्था की स्थापना की। इसके अलावा लद्दाख के शुष्क मरुस्थल में पानी के संकट से निपटने के लिए उन्होंने 'आइस स्तूप' तकनीक विकसित की। बॉलीवुड फिल्म '3 इडियट्स' का चर्चित किरदार फुंसुख वांगडू भी उनके ही जीवन से प्रेरित था।

लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग के बाद, वर्ष 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर उनका अनशन एक नए मोड़ पर आ गया। इस बार उनके आंदोलन में नीट (NEET) पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में कुप्रबंधन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जुड़ गई। वह युवाओं के संगठन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में भी आगे आए।


अनशन स्थल से अस्पताल तक: नागरिक अधिकारों पर सवाल

लगातार 21 दिनों तक अनशन करने के बाद 18 जुलाई को तबीयत बिगड़ने पर पुलिस ने उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। इसके बाद यह मामला पूरी तरह राजनीतिक और संवेदनशील हो गया।

डॉक्टरों और परिवार के गंभीर आरोप: वांगचुक के निजी चिकित्सक डॉ. नितिन दिघे ने आरोप लगाया कि उन्हें और वकील को मिलने नहीं दिया गया।

पत्नी की मांग: उनकी पत्नी गीतांजलि ने स्पष्ट मांग की कि परिवार और निजी डॉक्टरों की सहमति के बिना उन्हें जबरन कोई दवा या तरल पदार्थ न दिया जाए।

इन आरोपों ने इस मामले को सिर्फ मेडिकल या कानून-व्यवस्था का सवाल न बनाकर सीधे नागरिक अधिकारों और विरोध की आजादी से जोड़ दिया है।

राजनीति का अखाड़ा

वांगचुक को अनशन स्थल से हटाने पर सियासत गरमा गई:

·      विपक्ष का हमला: कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और इंडिया (INDIA) गठबंधन ने इसे तानाशाही करार दिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि छात्रों और युवाओं की आवाज दबाई जा रही है। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने सरकार से तुरंत वार्ता करने की अपील की।

·      भाजपा की सफाई: भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने पलटवार करते हुए कहा कि अदालत के निर्देशानुसार वांगचुक के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है और विपक्ष इस पर राजनीति कर रहा है।


असली सवाल: जिम्मेदारी नहीं तो फिर पद किसलिए?

इस पूरी राजनीतिक बयानबाजी के बीच मुख्य मुद्दा कहीं पीछे छूटता दिख रहा है।

सवाल केवल यह नहीं है कि किसी मंत्री के इस्तीफे से पेपर लीक रुकेगा या नहीं। असली सवाल प्रशासनिक और राजनीतिक जवाबदेही का है।

यदि लाखों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटकता है और हर विफलता के बाद यह कह दिया जाए कि "इस्तीफे से समस्या हल नहीं होगी", तो फिर जवाबदेही का सिद्धांत कहां लागू होगा?

लोकतंत्र में हर मांग मान लेना सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकता, लेकिन नागरिकों की बात सुनना, संवाद करना और गंभीर आरोपों पर तथ्यपरक जवाब देना सत्ता की नैतिक जिम्मेदारी है।


सवाल अभी भी जिंदा हैं

आज के दौर में अनशन की सबसे बड़ी विडंबना यही है। कभी अनशनकारी की बिगड़ती हालत सरकार को बातचीत की मेज पर ले आती थी, लेकिन आज इसे बैरिकेड्स, पुलिस बल और अस्पताल के कमरों में सीमित कर दिया जाता है।

सरकार की असली मजबूती विरोध दबाने में नहीं, बल्कि अपने सबसे कड़े आलोचक को धैर्यपूर्वक सुनने में होती है। अनशन तुड़वाया जा सकता है, धरनास्थल खाली कराया जा सकता है—लेकिन जिन सवालों ने इस आंदोलन को जन्म दिया, वे आज भी अनुत्तरित हैं।

क्योंकि भूख हड़ताल खत्म कराना आसान है, लेकिन भूख हड़ताल पैदा करने वाले सवालों को मिटाना नहीं।

                          (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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