— निशिकांत ठाकुर
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब सत्ता और समाज के बीच संवाद कमजोर हुआ है, तब-तब युवाओं ने परिवर्तन की मशाल उठाई है।
इतिहास के पन्ने पलटें तो 1974 का बिहार छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आता है। पटना विश्वविद्यालय से उठी छात्रों की आवाज धीरे-धीरे पूरे बिहार में गूंजी और बाद में राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले गई।
इसी आंदोलन ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सक्रिय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। उनके नेतृत्व में यह आंदोलन केवल छात्र असंतोष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की व्यापक मांग बन गया। आगे चलकर इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जेपी ने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार करते समय एक स्पष्ट शर्त रखी थी—आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा। यही उस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनी। अनुभव, संयम और नैतिक नेतृत्व ने युवा ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दी। इतिहास बताता है कि केवल आक्रोश से परिवर्तन नहीं आता, बल्कि अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण जनभागीदारी ही स्थायी बदलाव का आधार बनती है।
आज भी देश में युवाओं के बीच अनेक मुद्दों को लेकर असंतोष दिखाई देता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक, पारदर्शिता की कमी और रोजगार जैसे प्रश्नों ने नई पीढ़ी को आंदोलित किया है। हाल के महीनों में विभिन्न छात्र संगठनों और युवा समूहों ने इन मुद्दों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन किए। इन आंदोलनों में सक्रिय कुछ युवा संगठनों ने गांधीवादी तरीकों को अपनाते हुए सरकार पर जवाबदेही का दबाव बनाने का प्रयास किया।
किसी भी लोकतंत्र में युवाओं की आवाज को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना उचित नहीं है।
यदि बड़ी संख्या में छात्र और अभ्यर्थी किसी मुद्दे पर सड़क पर उतरते हैं, तो उसे केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था से संवाद की मांग के रूप में भी देखा जाना चाहिए। लोकतांत्रिक सरकारों की शक्ति केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि जनता की बात सुनने में भी निहित होती है।
इतिहास यह भी बताता है कि हर बड़े आंदोलन के बाद उसके नेतृत्व पर सवाल उठते हैं। कभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आरोप लगते हैं तो कभी बाहरी प्रभाव की चर्चा होती है। ऐसा 1974 के आंदोलन में भी हुआ था और आज भी देखने को मिलता है। लेकिन किसी आंदोलन का वास्तविक मूल्यांकन उसके नेताओं के बारे में फैली अफवाहों से नहीं, बल्कि उसके मूल मुद्दों और उसके परिणामों के आधार पर होना चाहिए।
युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह त्वरित परिवर्तन चाहती है। डिजिटल युग की यही पीढ़ी—जिसे अक्सर 'जेन-जी' कहा जाता है—सूचना, तकनीक और सोशल मीडिया के माध्यम से तेजी से संगठित होती है। यही कारण है कि आज के आंदोलनों का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक व्यापक और तेज दिखाई देता है। हालांकि, इस गति के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतांत्रिक आंदोलनों की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है, जब वे तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और अहिंसक तरीकों पर आधारित हों।
सरकारों के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। यदि परीक्षा प्रणाली में खामियां हैं, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी है या युवाओं के मन में अविश्वास पैदा हो रहा है, तो केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। व्यवस्था में सुधार, जवाबदेही और समयबद्ध निर्णय ही विश्वास बहाल कर सकते हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यहां संवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। इतिहास गवाह है कि जब युवा शक्ति और जिम्मेदार नेतृत्व साथ आते हैं, तब परिवर्तन अवश्य होता है। प्रश्न यह नहीं है कि आंदोलन होंगे या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या सत्ता और समाज समय रहते उन आंदोलनों के संदेश को समझ पाएंगे।
यदि नई पीढ़ी का आक्रोश रचनात्मक दिशा पाता है और सरकारें उसे विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया मानकर संवाद करती हैं, तो यही ऊर्जा देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। लेकिन यदि संवाद के स्थान पर अविश्वास बढ़ता गया, तो आंदोलनों की तीव्रता भी बढ़ेगी। इसलिए आज आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही की है। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
