जमुई के लछुआड़ में चार सदियों से चली आ रही मां काली की तांत्रिक आराधना की अनूठी परंपरा। लछुआड़ में मां काली के दो विग्रह की पूजा होती है। जानिए शाक्त साधना, गिद्धौर राजवंश के इतिहास और भव्य काली मेले की विशेषताएं।

प्रवीण कुमार दुबे, सिकंदरा (जमुई)।

कार्तिक अमावस्या की काली रात जहां दीपों की रोशनी से जगमगा उठती है और घर-घर में मां लक्ष्मी की आराधना होती है, वहीं जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड अंतर्गत लछुआड़ में शक्ति उपासना की एक प्राचीन और विशिष्ट परंपरा जीवंत हो उठती है। यहां स्थित मां काली का मंदिर सदियों पुरानी शाक्त साधना, तांत्रिक विधान और आध्यात्मिक आस्था का ऐसा केंद्र है, जिसकी अपनी अलग धार्मिक पहचान है। यहां की काली पूजा केवल प्रतिमा स्थापना और सामान्य पूजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रत्येक चरण में शास्त्रीय विधान, कठोर शुचिता और पारंपरिक तांत्रिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक अमावस्या की तिथि शक्ति की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी अवसर पर लछुआड़ में मां महाकाली की विशेष तांत्रिक पूजा संपन्न होती है। मान्यता है कि इस तिथि को महाकाली अपनी 64 हजार योगिनियों के साथ प्रकट हुई थीं। यही कारण है कि यहां की आराधना में मां के उग्र और शक्तिस्वरूप की उपासना का विशेष विधान है। लगभग चार सौ वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और धार्मिक निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। यहां मां काली के दो विग्रहों की पूजा होती है। मान्यता है कि उनमें एक विग्रह मां तारा का है।

शाक्त परंपरा के शास्त्रीय विधान से आकार लेता है मां का स्वरूप

लछुआड़ की काली पूजा की सबसे बड़ी विशेषता प्रतिमा निर्माण से लेकर महानिशा पूजन और बलि विधान तक में बरती जाने वाली धार्मिक शुचिता है। यहां मां काली की प्रतिमा का निर्माण भी सामान्य प्रक्रिया से अलग, शाक्त परंपरा के निर्धारित स्वरूप और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप किया जाता है।

जानकारों के अनुसार, प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'शाक्त प्रमोद' में वर्णित श्लोक 'सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं...' में मां के जिस स्वरूप का वर्णन मिलता है, उसी के अनुरूप प्रतिमा को आकार देने की परंपरा है। मूर्तिकार भी प्रतिमा निर्माण के दौरान विशेष नियमों का पालन करते हैं। वे प्रतिदिन स्नान करने और सात्विक आहार ग्रहण करने के बाद ही प्रतिमा निर्माण के लिए मिट्टी को स्पर्श करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में शुद्धता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

अनुष्ठान संपन्न कराने वाले तांत्रिक साधक हरिद्वार से दीक्षित बताए जाते हैं। वहीं, पूजा के मुख्य यजमान भी गंगा स्नान के बाद ही अनुष्ठान में शामिल होते हैं। महानिशा की पूजा में निर्धारित तांत्रिक विधियों का पालन किया जाता है। यहां की परंपरा में बलि विधान भी शामिल है, जो स्थानीय शाक्त उपासना पद्धति का हिस्सा है।

गिद्धौर राजवंश से जुड़ा है चार सौ वर्षों का गौरवशाली इतिहास

लछुआड़ की मां काली की आराधना का इतिहास इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और गिद्धौर रियासत की परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्थानीय ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, कभी यह इलाका गिद्धौर राजवंश के अधीन था। कहा जाता है कि गिद्धौर के महाराजा पूरनमल सिंह और उनके वंशज महाराजा जयमंगल सिंह शिकार के सिलसिले में इस क्षेत्र में आए थे। इसी दौरान उन्होंने यहां मां काली के मंदिर और उसके समीप एक गढ़ यानी किले की स्थापना कराई थी।

उस दौर में स्थापित धार्मिक परंपरा धीरे-धीरे क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गई। मंदिर के निकट मौजूद पुराने गढ़ के अवशेष आज भी उस ऐतिहासिक विरासत की याद दिलाते हैं। करीब दो दशक पहले तक राजपरिवार स्वयं इस पूजा की व्यवस्था और देखरेख करता था। बाद में महाराजा द्वारा गठित स्थानीय पूजा समिति को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी गई। आज समिति के माध्यम से इस प्राचीन परंपरा का संचालन किया जा रहा है।

इस पूजा का एक और ऐतिहासिक पक्ष विसर्जन से जुड़ा है। मां की प्रतिमा के विसर्जन के दिन गिद्धौर राजवंश द्वारा निर्मित ऐतिहासिक रानी पोखर के तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत का यह संगम लछुआड़ की पूजा को विशिष्ट बनाता है।

देवघर के विद्वान आचार्यों द्वारा कुंडलिनी पद्धति से आराधना

लछुआड़ की पूजा में तंत्र साधना के साथ पुराण और शास्त्रीय परंपराओं का भी समन्वय दिखाई देता है। पूजा समिति के अध्यक्ष राकेश वर्णवाल के अनुसार, यहां मां काली की विशेष आराधना देवघर से आने वाले विद्वान आचार्यों द्वारा कुंडलिनी पद्धति से संपन्न कराई जाती है। इस पद्धति में साधना और शक्ति उपासना का विशेष महत्व है।

अनुष्ठान के दौरान मां भगवती को शुद्ध देसी घी से तैयार 56 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया जाता है। छप्पन भोग की यह परंपरा मां के प्रति भक्तों की श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। पूजा के दौरान दूर-दराज के गांवों और विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचकर मां के दर्शन करते हैं तथा परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

परंपरागत मल्लयुद्ध से आधुनिक झूलों तक

लछुआड़ की काली पूजा धार्मिक अनुष्ठानों के साथ अपने विशाल मेले के लिए भी जानी जाती है। कभी यह मेला ग्रामीण जीवन की पारंपरिक खेल और लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण मंच हुआ करता था। पूजा समिति के सचिव मधुकर सिंह के अनुसार, पुराने समय में यहां कुश्ती यानी मल्लयुद्ध, निशानेबाजी, तीरंदाजी और लोकनृत्य-संगीत की प्रतियोगिताएं मेले का प्रमुख आकर्षण होती थीं। इन आयोजनों में आसपास के गांवों के लोग उत्साहपूर्वक भाग लेते थे।

समय के साथ मेले का स्वरूप बदला है। पारंपरिक मनोरंजन के साथ अब आधुनिक आकर्षण भी जुड़ गए हैं। मौत का कुआं, सर्कस, जादू के खेल, ब्रेक डांस और बड़े-बड़े झूले मेले की रौनक बढ़ाते हैं। पूजा के अवसर पर उमड़ने वाली भीड़ में ग्रामीणों के साथ बड़ी संख्या में दूसरे क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु और दर्शक भी शामिल होते हैं।

आस्था, इतिहास और परंपरा को संजोने में जुटी पूजा समिति

चार सदियों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने में स्थानीय पूजा समिति की महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्यक्ष राकेश वर्णवाल और सचिव मधुकर सिंह के नेतृत्व में समिति के सदस्य आयोजन की तैयारियों में जुटे रहते हैं। कोषाध्यक्ष मनोज यादव के साथ विश्वनाथ रविदास, बंटी सिंह और समिति के अन्य सदस्य पूजा, अनुष्ठान तथा मेले की व्यवस्थाओं को सफल बनाने में योगदान देते हैं।

लछुआड़ की मां काली की आराधना इस बात का उदाहरण है कि किस तरह धार्मिक आस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखती है। यहां शाक्त साधना की प्राचीन परंपरा, गिद्धौर राजवंश की स्मृतियां, देवघर के आचार्यों की आध्यात्मिक सहभागिता और लोकजीवन की उत्सवधर्मिता एक साथ दिखाई देती है। यही विशिष्टता लछुआड़ की काली पूजा को केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जमुई की समृद्ध विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।

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