महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के दूर-दराज़ घोडांकप्पी गांव में पक्की सड़क न होने से एक आदिवासी महिला की जान चली गई। पत्नी की मौत से दुखी तुलसीराम गेडम ने हार नहीं मानी और ग्रामीणों के साथ मिलकर खुद 1.5 किमी सड़क बनाने का बीड़ा उठाया। पढ़िए यह प्रेरणादायक रिपोर्ट।


चंद्रपुर। बिहार के 'माउंटेन मैन' दशरथ मांझी की कहानी तो आपने ज़रूर सुनी होगी, जिन्होंने अपनी पत्नी को खोने के दुख को अपनी ताकत बनाकर पहाड़ का सीना चीर दिया था। ठीक वैसी ही दर्दनाक और प्रेरणादायक कहानी अब महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से सामने आई है।

तेलंगाना सीमा के पास जिवती तालुका में बसे दूर-दराज़ गांव घोडांकप्पी के निवासी तुलसीराम गेडम अब 'महाराष्ट्र के माउंटेन मैन' कहला रहे हैं। पक्की सड़क न होने के कारण सही समय पर एम्बुलेंस न पहुंच सकी और तुलसीराम की पत्नी की मौत हो गई। इस त्रासदी के दो महीने बाद, प्रशासनिक उपेक्षा से तंग आकर तुलसीराम और उनके ग्रामीणों ने खुद ही रास्ता बनाने का बीड़ा उठा लिया है।


घटना 14 जून की है, जब तुलसीराम की पत्नी संगीता ने एक बच्ची को जन्म दिया। जन्म देने के तुरंत बाद संगीता की तबीयत बिगड़ने लगी। परिजनों ने आपातकालीन मदद के लिए एम्बुलेंस को कॉल किया, लेकिन पथरीले, पहाड़ी और बेहद दुर्गम रास्ते की वजह से एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी।


समय पर डॉक्टरी इलाज न मिल पाने के कारण संगीता ने दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक घटना ने न केवल तुलसीराम को झकझोर कर रख दिया, बल्कि पूरे गांव को हिला दिया। अब संगीता की नवजात बेटी की देखभाल उसकी दादी कर रही हैं, जबकि तुलसीराम अपनी पत्नी की यादों और तीन साल के मासूम बेटे को संभालते हुए गांव के भविष्य को बदलने की जंग लड़ रहे हैं।


पत्नी को खोने के बाद तुलसीराम गेडम ने ठान लिया कि जो त्रासदी उनके साथ हुई, वह गांव के किसी अन्य परिवार के साथ नहीं होनी चाहिए। 'विश्व आदिवासी दिवस' के अवसर पर घोडांकप्पी के आदिवासी निवासी एकजुट हुए और गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाले लगभग 1.5 किलोमीटर लंबे कच्चे व पथरीले रास्ते को दुरुस्त करने का काम शुरू किया।


"हमने सड़क निर्माण के लिए प्रशासन के दरवाजे कई बार खटखटाए, आवेदन दिए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अपनी पत्नी को खोने के बाद मुझे अहसास हुआ कि हम अब और इंतजार नहीं कर सकते। आपातकालीन स्थिति में हर एक मिनट कीमती होता है। मैं नहीं चाहता कि सड़क न होने की वजह से कोई और अपने प्रियजन को खोए।"


वर्तमान में ग्रामीणों की सामूहिक मेहनत से लगभग आधा रास्ता समतल और चलने योग्य बनाया जा चुका है।


पहाड़ियों के बीच बसा घोडांकप्पी गांव लगभग 20 परिवारों का आशियाना है, जहाँ लोग पिछले तीन दशकों से रह रहे हैं। गांव में कहने को तो सीमेंट की एक छोटी सड़क और आंगनवाड़ी केंद्र है, लेकिन गांव को बाहरी दुनिया या मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली कोई पक्की सड़क नहीं है।


पहुंच मार्ग की बदहाली: बारिश के मौसम में यह 1.5 किलोमीटर का पथरीला रास्ता दलदल में बदल जाता है। यहाँ तक कि मोटरसाइकिल चलाना भी जान जोखिम में डालने जैसा होता है।


बच्चों की पढ़ाई पर असर: गांव के बाहर जिला परिषद का स्कूल है। नन्हें बच्चों को रोजाना इसी जोखिमभरे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होकर स्कूल जाना पड़ता है।


स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 2021 में 'मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना' के तहत घोडांकप्पी से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर तक सड़क का निर्माण कराया गया था। लेकिन योजना का काम पहाड़ी के नीचे बसे इस गांव से ठीक पहले रोक दिया गया। आखिरी 1.5 किमी का हिस्सा कभी बनाया ही नहीं गया, जिसके कारण पूरा गांव अलग-थलग पड़ा रहा।



जहां दशरथ मांझी ने अकेले दम पर छेनी-हथौड़ी से पहाड़ काटा था, वहीं तुलसीराम को अपने पूरे गांव का सहयोग मिल रहा है। पूरे गांव का एक ही संकल्प है "प्रशासन भले ही सोता रहे, हम अपनी राह खुद बनाएंगे।"


प्रशासनिक उपेक्षा के बीच ग्रामीणों का यह कदम व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा तो है ही, साथ ही यह एकता और आत्म-निर्भरता की एक अद्भुत मिसाल भी पेश करता है।