पटना। बिहार की राजनीति की सबसे चर्चित सीट बन चुकी बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि इसे भाजपा की साख और जन सुराज के भविष्य की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। इस चुनाव में पहली बार खुद चुनाव मैदान में उतरे जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है।


भाजपा, राजद और जन सुराज के बीच त्रिकोणीय संघर्ष ने पूरे राज्य का ध्यान इस सीट पर केंद्रित कर दिया है।


बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का अभेद्य किला माना जाता रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के राज्यसभा जाने से यह सीट खाली हुई। ऐसे में भाजपा के लिए इस सीट को बचाना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।


दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने इसी सीट से अपनी चुनावी शुरुआत कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी राजनीति केवल सलाह देने तक सीमित नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ने की भी है।


प्रशांत किशोर ने पूरे चुनाव अभियान में पारंपरिक जनसभाओं की बजाय घर-घर संपर्क, पदयात्रा और स्थानीय मुद्दों पर विशेष जोर दिया। उन्होंने भ्रष्टाचार, शहरी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जनता से कई ठोस वादे भी किए और दावा किया कि विधायक निधि के उपयोग में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है।


हालांकि, प्रशांत किशोर की राह आसान नहीं है। भाजपा ने भी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी ने नितिन नवीन के विकास कार्यों और संगठनात्मक मजबूती को चुनाव का प्रमुख आधार बनाया है। भाजपा का दावा है कि बांकीपुर के विकास का सिलसिला उसी के नेतृत्व में आगे बढ़ सकता है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा ने विकास और भावनात्मक जुड़ाव दोनों पर जोर देकर मतदाताओं को साधने की कोशिश की।


उधर, राष्ट्रीय जनता दल भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में जुटा रहा। युवाओं के मुद्दे, बेरोजगारी और शिक्षा जैसे विषय चुनावी बहस के केंद्र में रहे। हाल के छात्र आंदोलनों और नीट विवाद ने भी चुनावी माहौल को प्रभावित किया, जिसका असर शहरी युवा मतदाताओं पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर इस सीट पर जीत दर्ज करते हैं तो बिहार की राजनीति में जन सुराज को बड़ी वैधता मिलेगी और आगामी चुनावों में पार्टी का मनोबल बढ़ेगा।


वहीं यदि वे हारते भी हैं, लेकिन सम्मानजनक मत हासिल करते हैं, तब भी उन्हें राज्य में एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जाएगा। दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह सीट बचाना अपनी राजनीतिक पकड़ और संगठनात्मक ताकत साबित करने का सवाल बन चुका है।


कुल मिलाकर, बांकीपुर का उपचुनाव अब केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति की दिशा तय करने वाली लड़ाई बन गया है।


सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या चुनावी रणनीति के लिए देशभर में प्रसिद्ध प्रशांत किशोर अपने पहले ही चुनाव में भाजपा के गढ़ को भेद पाएंगे, या फिर भाजपा अपनी परंपरागत पकड़ कायम रखने में सफल होगी। परिणाम चाहे जो भी हो, यह चुनाव बिहार की राजनीति में दूरगामी असर छोड़ने वाला माना जा रहा है।