राधे मां ने पहली बार अपने ऊपर लगे आरोपों, चढ़ावे, भारी श्रृंगार और 3 साल के डिप्रेशन पर खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी खुद को संत नहीं कहा। पूरी खबर पढ़ें।
नई दिल्ली। लंबे समय से विवादों में घिरी रहने वाली आध्यात्मिक हस्ती राधे मां ने पहली बार अपने ऊपर लगे आरोपों और निजी जीवन को लेकर खुलकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने कभी खुद को संत या साधु नहीं बताया और न ही ऐसा कोई दावा किया। उनके अनुसार, लोग उन्हें अपनी आस्था से जोड़ते हैं और वही उनका सबसे बड़ा परिचय है।
एक बातचीत के दौरान राधे मां ने कहा कि लोग उन्हें अन्य धार्मिक गुरुओं से अलग मानते हैं, लेकिन उन्होंने कभी स्वयं को संत नहीं कहा। उन्होंने कहा, मैं राधे हूं, लोगों को राह दिखाने वाली। मेरे पास जो भी श्रद्धा लेकर आया, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटा।
श्रृंगार को लेकर होने वाली आलोचनाओं पर उन्होंने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि उनके भक्तों और परिवार की इच्छा है। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे चाहते हैं कि वह हमेशा सजी-संवरी रहें और भक्त भी प्रेमवश उनका श्रृंगार करते हैं।
चढ़ावे पर क्या बोलीं?
राधे मां ने उन आरोपों को भी खारिज किया जिनमें उन पर लोगों से पैसे लेने की बात कही जाती रही है। उनका कहना था कि उन्होंने कभी किसी से धन नहीं मांगा। उनके मुताबिक, यदि किसी की मनोकामना पूरी होने के बाद वह श्रद्धा से भेंट या चढ़ावा देता है, तो उसे रोकना भी उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि कई लोग दावा करते हैं कि वर्षों से संतान न होने या कारोबार में परेशानी जैसी समस्याओं से राहत मिलने के बाद वे अपनी खुशी से भेंट चढ़ाते हैं। ऐसे में इसे पैसे मांगना नहीं कहा जा सकता।
धर्म से बड़ा इंसानियत का रिश्ता
राधे मां ने कहा कि उनके पास हर धर्म और समुदाय के लोग आते हैं। उनके अनुसार, धर्म से अधिक महत्वपूर्ण इंसानियत है। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग आध्यात्मिकता से अधिक धन कमाने की दौड़ में लगे हैं, जबकि ईश्वर और भक्ति की ओर बढ़ने से जीवन में संतुलन और शांति मिल सकती है।
संगीत और भक्ति दोनों पसंद
उन्होंने खुद को "फन लविंग" बताते हुए कहा कि वह भगवान की आराधना केवल पारंपरिक तरीके से ही नहीं, बल्कि संगीत और भजन के माध्यम से भी करती हैं। उनका मानना है कि भक्ति का तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन भावना सबसे अहम होती है।
विवादों के बाद डिप्रेशन से गुजरीं
राधे मां ने यह भी स्वीकार किया कि लगातार विवादों और आलोचनाओं का उन पर गहरा मानसिक असर पड़ा था। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा आया जब वह करीब तीन वर्षों तक अवसाद (डिप्रेशन) से जूझती रहीं। बाद में इलाज और देखभाल के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ।
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