मिशन सेव इन इंडिया के डॉ. आर.एन. सिंह के अनुसार, शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव केवल सरकार नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है। जानिए UP, बिहार और झारखंड में प्रसव सुरक्षा के NFHS आंकड़े।

डॉ. आर.एन. सिंह

गोरखपुर। माँ और नवजात शिशु की सुरक्षा के लिए संस्थागत प्रसव को सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच बताते हुए मिशन सेव इन इंडिया, गोरखपुर के डॉ. आर.एन. सिंह ने कहा है कि शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ परिवारों में जागरूकता और सुरक्षित प्रसव को लेकर सामाजिक सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।

डॉ. सिंह के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारत में संस्थागत प्रसव की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि देश में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत NFHS-2 (1998-99) में 33.6 प्रतिशत था, जो NFHS-4 (2015-16) में बढ़कर 78.9 प्रतिशत और NFHS-5 (2019-21) में 88.6 प्रतिशत हो गया।

उन्होंने कहा कि अब चुनौती औसत सुधार से आगे बढ़कर हर प्रसव को सुरक्षित संस्थागत प्रसव में बदलने की है। उनके शब्दों में, “90 से 100 प्रतिशत तक पहुंचने की अंतिम दूरी सबसे कठिन है, लेकिन यही दूरी तय करेगी कि हम मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में कितनी बड़ी सफलता हासिल कर पाते हैं।”

उत्तर प्रदेश की स्थिति

उत्तर प्रदेश ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। NFHS-3 (2005-06) में राज्य में संस्थागत प्रसव का प्रतिशत केवल 20.6 प्रतिशत था। NFHS-4 (2015-16) में यह बढ़कर 67.8 प्रतिशत और NFHS-5 (2019-21) में 83.4 प्रतिशत हो गया। यानी लगभग डेढ़ दशक में इसमें करीब 63 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई।

डॉ. सिंह का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में अंतिम चरण की चुनौती केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने से पूरी नहीं होगी। प्रसव पूर्व जांच, समय पर रेफरल, एंबुलेंस की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक आसान पहुंच को एक साथ मजबूत करना होगा।

बिहार और झारखंड से तुलना

बिहार और झारखंड की स्थिति भी इसी चुनौती को सामने रखती है। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार बिहार में 76.2 प्रतिशत और झारखंड में 75.8 प्रतिशत प्रसव संस्थागत स्वास्थ्य सुविधाओं में हुए। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश का आंकड़ा 83.4 प्रतिशत था। राष्ट्रीय औसत 88.6 प्रतिशत रहा।

बिहार में संस्थागत प्रसव NFHS-3 के 19.9 प्रतिशत से बढ़कर NFHS-4 में 63.8 प्रतिशत और NFHS-5 में 76.2 प्रतिशत हुआ। वहीं झारखंड में यह NFHS-3 के 18.3 प्रतिशत से बढ़कर NFHS-4 में 61.9 प्रतिशत और NFHS-5 में 75.8 प्रतिशत हुआ।

इस तुलना से स्पष्ट है कि तीनों राज्यों ने लंबी दूरी तय की है, लेकिन शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव का लक्ष्य अभी भी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है।

डॉ. आर.एन. सिंह ने कहा कि संस्थागत प्रसव को केवल सरकारी योजना या स्वास्थ्य विभाग का कार्यक्रम मानना उचित नहीं होगा। परिवार, पंचायत, स्थानीय जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन, स्वयंसेवी संस्थाएं और स्वास्थ्यकर्मी—सभी को मिलकर ऐसी परिस्थितियां बनानी होंगी, जिनमें गर्भवती महिला के लिए घर पर असुरक्षित प्रसव के बजाय स्वास्थ्य संस्थान में प्रसव स्वाभाविक और अनिवार्य विकल्प बने।

उन्होंने कहा, “एक भी महिला यदि समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती, तो हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा होता है। इसलिए लक्ष्य केवल प्रतिशत बढ़ाना नहीं, बल्कि अंतिम महिला तक सुरक्षित प्रसव की सुविधा पहुंचाना होना चाहिए।”

डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव सरकार और समाज दोनों की साझी जिम्मेदारी है। सरकारी तंत्र को सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण सेवाएं सुनिश्चित करनी होंगी, जबकि समाज को जागरूकता, समय पर निर्णय और स्वास्थ्य संस्थानों के प्रति भरोसा बढ़ाने में अपनी भूमिका निभानी होगी।

उन्होंने कहा कि सुरक्षित मातृत्व और स्वस्थ नवजात केवल किसी एक परिवार की चिंता नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज और समृद्ध राष्ट्र की बुनियाद है। “यदि हमें सचमुच स्वस्थ उत्तर प्रदेश, स्वस्थ बिहार और स्वस्थ झारखंड का निर्माण करना है, तो शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव को अभियान नहीं, जनआंदोलन बनाना होगा।”