दिल्ली। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया के रहने वाले पद्मश्री सम्मानित इंजीनियर गिरिश भारद्वाज का मंगलवार तड़के एक निजी अस्पताल में संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। अपने अभिनव और कम लागत वाले सस्पेंशन पुलों के निर्माण के कारण उन्हें पूरे देश में 'ब्रिज मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता था।

मैकेनिकल इंजीनियर रहे गिरिश भारद्वाज ने अपने जीवन के तीन दशक से अधिक समय देश के दूरदराज और दुर्गम इलाकों में रहने वाले लोगों की जिंदगी आसान बनाने के लिए समर्पित कर दिए। उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित की, जिसके जरिए बेहद कम लागत में मजबूत और टिकाऊ सस्पेंशन फुटब्रिज बनाए जा सकते थे। इन पुलों ने उन हजारों गांवों को जोड़ने का काम किया, जहां बरसात के दिनों में नदी-नालों के कारण लोगों का आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाता था।

गिरिश भारद्वाज ने अपने जीवनकाल में देश के विभिन्न राज्यों में 140 से अधिक सस्पेंशन पुलों का निर्माण कराया। इनमें कर्नाटक के अलावा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, झारखंड, छत्तीसगढ़ और अन्य पर्वतीय एवं आदिवासी क्षेत्रों के कई गांव शामिल हैं। उनके बनाए पुलों से लाखों ग्रामीणों को स्कूल, अस्पताल, बाजार और अन्य आवश्यक सेवाओं तक सुरक्षित और आसान पहुंच मिली।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे पुल निर्माण में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करते थे। वे ग्रामीणों को प्रशिक्षण देकर निर्माण कार्य में शामिल करते थे, जिससे लागत कम होती थी और स्थानीय समुदाय में तकनीकी कौशल भी विकसित होता था। उनके मॉडल को ग्रामीण विकास और सामुदायिक भागीदारी का एक सफल उदाहरण माना जाता है।

गिरिश भारद्वाज का मानना था कि किसी गांव का विकास केवल सड़क बनने से नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित होने से संभव है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन उन क्षेत्रों को जोड़ने में लगा दिया, जहां सरकारी संसाधन सीमित थे या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बुनियादी ढांचा विकसित करना कठिन था।

ग्रामीण भारत में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2017 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था। उनके कार्यों की सराहना देश-विदेश में हुई और कई इंजीनियरिंग संस्थानों तथा सामाजिक संगठनों ने उनके मॉडल को सतत एवं कम लागत वाले बुनियादी ढांचे के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।

परिवार के अनुसार, गिरिश भारद्वाज पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और सुलिया के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। मंगलवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

गिरिश भारद्वाज भले ही इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके बनाए पुल आने वाली पीढ़ियों तक उनकी दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और नवाचार की मिसाल बने रहेंगे। उन्होंने केवल नदियों के दो किनारों को नहीं, बल्कि विकास और अवसरों से वंचित लाखों लोगों के जीवन को भी मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया।