अमाऊं निवासी द्रोपदी देवी के निधन पर उनकी इकलौती शादीशुदा बेटी मृणाला कार्की ने बनबसा के शारदा घाट पर मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया और समाज के सामने एक नई मिसाल पेश की।


खटीमा। रूढ़िवादिता और पुरानी सामाजिक परंपराओं को दरकिनार करते हुए एक बेटी ने अपनी मां के अंतिम संस्कार की कमान संभाली और बेटे का फर्ज निभाते हुए उन्हें मुखाग्नि दी। शारदा नदी के तट पर घटित इस दृश्य ने वहां मौजूद हर शख्स को भावुक कर दिया।


अमाऊं स्थित गीतांजलि कॉलोनी की निवासी द्रोपदी देवी लंबे समय से बीमार चल रही थीं, जिसके बाद उनका निधन हो गया। उनके पति पदमनाथ का पहले ही देहांत हो चुका है। परिवार में केवल उनकी एक ही संतान—बेटी मृणाला कार्की हैं। मृणाला का विवाह हो चुका है और उनके पति कर्नल रोशन कार्की वर्तमान में असम राइफल्स में सेवारत हैं।


शुक्रवार को जब बनबसा स्थित शारदा घाट पर द्रोपदी देवी का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए लाया गया, तो घाट पर इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई कि मुखाग्नि कौन देगा। ऐसे समय में बेटी मृणाला ने आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया और हिंदू रीति-रिवाज के साथ मां की चिता को मुखाग्नि दी।


जिस समय शारदा घाट पर अन्य चिताएं जल रही थीं, उस समय मृणाला को एक बेटे की तरह अंतिम संस्कार करते देख घाट पर मौजूद लोग अपने आंसू न रोक सके। स्थानीय निवासियों का कहना था कि मृणाला ने समाज के सामने एक प्रेरणादायक मिसाल कायम की है और यह साबित किया है कि बेटियां किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं होतीं।


अंतिम संस्कार के दौरान मृणाला के पति कर्नल रोशन कार्की भी उनके साथ मौजूद रहे और इस निर्णय में उनका पूरा सहयोग किया।

इस भावुक क्षण के दौरान खटीमा विधायक भुवन चंद्र कापड़ी, भाजपा नेता नवीन बोरा, और डॉ. नवीन भट्ट समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। उन्होंने बेटी के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि अपनी मां के प्रति जिम्मेदारी निभाकर मृणाला ने समाज को एक नई दिशा दिखाई है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि बेटियां हर दायित्व को पूरी निष्ठा के साथ निभा सकती हैं।