विशेष रिपोर्ट
विशेष संवाददाता, गोरखपुर। पूर्वी उत्तर प्रदेश में दशकों तक इंसेफेलाइटिस (दिमागी बुखार) हर वर्ष सैकड़ों मासूम बच्चों की जान लेता रहा।
अस्पतालों में चीख-पुकार, गांवों में मातम और बेबस परिवार इस त्रासदी का हिस्सा बन चुके थे। लेकिन वर्ष 2010 में गोरखपुर के एक छोटे से गांव होलिया ने इस भयावह बीमारी के खिलाफ ऐसी जनक्रांति की शुरुआत की, जिसने न केवल सरकारों को नई दिशा दिखाई, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य नीति को भी प्रभावित किया।
इंसेफेलाइटिस उन्मूलन अभियान के मुख्य अभियानकर्ता डॉ. आर. एन. सिंह का कहना है कि NEEP (National Encephalitis Elimination Programme) ग्राम होलिया ने वर्ष 2010 में इंसेफेलाइटिस नियंत्रण और रोकथाम का ऐसा व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसने राज्य और केंद्र सरकार के नीति-निर्माताओं को इस बीमारी से लड़ने की नई सोच दी। उनके अनुसार, यही वह मोड़ था, जहां से इंसेफेलाइटिस के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष की शुरुआत हुई।
चालीस वर्षों की त्रासदी के खिलाफ जनआंदोलन
पूर्वांचल में लगभग चार दशकों तक इंसेफेलाइटिस हर वर्ष बच्चों की जान लेता रहा। स्वास्थ्य सेवाओं की सीमाएं, जागरूकता का अभाव, स्वच्छता की कमी और समन्वित रणनीति न होने के कारण बीमारी लगातार कहर बरपाती रही।
इसी चुनौती के बीच वर्ष 2010 में होलिया गांव में एक अनोखा अभियान शुरू हुआ। यह केवल चिकित्सा कार्यक्रम नहीं था, बल्कि गांव के लोगों की सक्रिय भागीदारी, स्वच्छता, स्वास्थ्य शिक्षा, पर्यावरण सुधार और सामाजिक जागरूकता पर आधारित एक व्यापक जनआंदोलन था।
डॉ. सिंह इस अभियान को "लोकतंत्र में जनता द्वारा सत्ता का सकारात्मक विरोध" और "पूर्वांचल का डांडी मार्च" बताते हैं। उनका कहना है कि इस आंदोलन ने सरकारों को यह संदेश दिया कि यदि आम नागरिक संगठित होकर वैज्ञानिक तरीके से काम करें, तो वर्षों पुरानी स्वास्थ्य समस्याओं पर भी प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
दस सूत्रीय मॉडल ने दिखाई नई राह
होलिया अभियान के दौरान तैयार किए गए दस सूत्रीय नियंत्रण एवं रोकथाम मॉडल को बाद के वर्षों में सरकारों ने भी अपनाया। अभियान का उद्देश्य केवल इलाज नहीं, बल्कि बीमारी को जन्म देने वाले कारणों पर रोक लगाना था।
इस मॉडल में स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, जलभराव रोकना, जनजागरूकता, समय पर पहचान, शीघ्र उपचार, सामुदायिक सहभागिता तथा विभिन्न विभागों के समन्वय जैसे बिंदुओं पर विशेष जोर दिया गया।
डॉ. सिंह का दावा है कि वर्ष 2012 के बाद सरकारों ने इन सिद्धांतों को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया और आज भी कई स्तरों पर उनका पालन किया जा रहा है।
आंदोलन के बाद हुए बड़े फैसले
अभियान के अनुसार, होलिया मॉडल के बाद वर्ष 2012 में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए—
- इंसेफेलाइटिस के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for Encephalitis) शुरू किया गया।
- लगभग 4,000 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई।
- बारहवीं पंचवर्षीय योजना में इंसेफेलाइटिस नियंत्रण को शामिल किया गया।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि इन निर्णयों ने बीमारी के खिलाफ संगठित राष्ट्रीय प्रयासों को नई गति दी।
"अगर होलिया रास्ता नहीं दिखाता..."
डॉ. आर. एन. सिंह का कहना है कि यदि वर्ष 2010 में होलिया गांव ने यह मॉडल विकसित नहीं किया होता, तो आज भी बड़ी संख्या में बच्चे इंसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ रहे होते।
उनके अनुसार, होलिया ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि समाज संगठित होकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए, तो बड़ी से बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती का सामना किया जा सकता है।
365 दिनों का निरंतर संघर्ष
होलिया अभियान किसी एक दिन या एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। अभियान के कार्यकर्ताओं ने पूरे 365 दिनों तक लगातार गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया, स्वच्छता अभियान चलाए, स्वास्थ्य शिक्षा दी और लोगों को बीमारी से बचाव के उपाय बताए।
अभियान का लक्ष्य स्पष्ट था—
"No Deaths, No Disability"
"न कोई मृत्यु, न कोई स्थायी दिव्यांगता।"
डॉ. सिंह ने अभियान से जुड़े सभी स्वयंसेवकों, चिकित्सकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके समर्पण और अथक परिश्रम ने इस आंदोलन को ऐतिहासिक सफलता दिलाई।
सरकारों के सामने खड़ा हुआ बड़ा सवाल
होलिया मॉडल ने देश के नीति-निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखा—
"जब सीमित संसाधनों वाला एक गांव अपने प्रयासों से इंसेफेलाइटिस पर नियंत्रण की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर सकता है, तो सरकार पूरे प्रदेश और देश में ऐसा क्यों नहीं कर सकती?"
इसी प्रश्न ने आगे चलकर नीति-निर्माण, जनस्वास्थ्य कार्यक्रमों और सामुदायिक भागीदारी को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज भी प्रेरणा है होलिया मॉडल
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि वर्ष 2011 के बाद होलिया देश में इंसेफेलाइटिस नियंत्रण का एक मॉडल गांव बन गया। आज भी यह उदाहरण इस बात की याद दिलाता है कि किसी भी बीमारी के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत केवल अस्पताल नहीं, बल्कि जागरूक समाज, जनभागीदारी और वैज्ञानिक सोच होती है।
डॉ. आर. एन. सिंह ने इस ऐतिहासिक अभियान की सफलता का श्रेय अभियान के सभी साथियों, ग्रामीणों और भगवान शिव की कृपा को देते हुए कहा कि इंसेफेलाइटिस मुक्त भारत का सपना सामूहिक प्रयासों से ही साकार हो सकता है।
