देवघर के बाबा बैद्यनाथ मेडिकल कॉलेज विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार की SLP खारिज कर हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया। जानिए जमीन, म्यूटेशन, Essentiality Certificate और सरकार-ट्रस्ट के पूरे विवाद की कहानी।
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
देवघर में प्रस्तावित बाबा बैद्यनाथ मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल को लेकर चल रहा जमीन, म्यूटेशन और आवश्यक अनुमति का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार की ओर से दाखिल विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को खारिज करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा गया है, जिसमें बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट की ओर से खरीदी गई संपत्ति के म्यूटेशन और मेडिकल कॉलेज के लिए जरूरी प्रक्रिया को लेकर राज्य सरकार को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ने के निर्देश दिए गए थे।
इस घटनाक्रम के बाद गोड्डा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसे न्याय की जीत बताया। सांसद ने आरोप लगाया कि बाबा बैद्यनाथ मेडिकल कॉलेज शुरू करने के रास्ते में राज्य सरकार की ओर से बाधाएं खड़ी की जा रही थीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को अपने पक्ष में बताते हुए अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर भी कड़ी टिप्पणी किए जाने का दावा किया है। हालांकि, सांसद के बयान और अदालत के औपचारिक आदेश में अंतर करना जरूरी है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2002 से 2026 तक देवघर में पदस्थ रहे सभी उपायुक्तों, रजिस्ट्रार और राजस्व अधिकारियों को बर्खास्त करने का कोई औपचारिक निर्देश नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट और परित्राण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल से जुड़ा यह विवाद मुख्य रूप से देवघर के मोहानपुर क्षेत्र की करीब 26.50 एकड़ जमीन से संबंधित है। झारखंड हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, यह संपत्ति पहले परित्राण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के पास थी। संस्था ने बैंकों के एक कंसोर्टियम से करीब 93 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। ऋण की अदायगी नहीं होने के बाद बैंक की ओर से वसूली की कार्यवाही शुरू हुई और संबंधित संपत्ति को नीलामी में रखा गया। बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट ने नीलामी में संपत्ति खरीदी। इसके बाद उसके नाम पर 23 जनवरी 2024 को सेल सर्टिफिकेट जारी हुआ और 24 जनवरी 2024 को संपत्ति का कब्जा भी सौंप दिया गया।
पूर्व संस्था की ओर से नीलामी को चुनौती दी गई, लेकिन झारखंड हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भी उस चुनौती को सफलता नहीं मिली। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि संबंधित अपील बाद में DRT के स्तर पर भी खारिज हुई।
विवाद म्यूटेशन पर कैसे पहुंचा?
नीलामी में संपत्ति हासिल करने के बाद बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट ने जमीन का म्यूटेशन अपने नाम कराने के लिए आवेदन किया। देवघर के अंचल अधिकारी ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। इसके बाद दोबारा आवेदन किया गया, लेकिन वह भी खारिज हुआ। ट्रस्ट ने इसके खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 3 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने अंचल अधिकारी के आदेशों को रद्द करते हुए म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी करने और ट्रस्ट के पक्ष में राजस्व रसीद जारी करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी। परित्राण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की ओर से भी अपील की गई। मामला अंततः हाईकोर्ट की खंडपीठ तक पहुंचा।
झारखंड सरकार ने क्या दलील दी?
मामले में झारखंड सरकार ने कई महत्वपूर्ण आपत्तियां उठाईं। सरकार की ओर से कहा गया कि संबंधित जमीन मूल राययती प्रकृति की है और संताल परगना टेनेंसी एक्ट के प्रावधानों के तहत इसके म्यूटेशन के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि नीलामी के जरिए संपत्ति हासिल होने मात्र से भूमि के संबंध में सभी वैधानिक बाधाएं समाप्त नहीं हो जातीं। सरकार का एक प्रमुख तर्क यह भी था कि जब तक जमीन के स्वामित्व और उससे जुड़े वैधानिक पहलुओं का सत्यापन पूरा नहीं होता, तब तक मेडिकल कॉलेज के लिए जरूरी Essentiality Certificate जारी करने का निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए।
राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि Essentiality Certificate जारी करना महज औपचारिक या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मेडिकल कॉलेज की व्यवहार्यता और आवश्यक सुविधाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र है।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलीलों पर क्या कहा?
15 जुलाई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने म्यूटेशन से संबंधित राज्य सरकार और परित्राण मेडिकल कॉलेज की अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पहले जिन आधारों पर म्यूटेशन आवेदन खारिज किए गए थे, वे बाद में अदालत के सामने नए कारणों से समर्थित नहीं किए जा सकते। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि म्यूटेशन का उद्देश्य मुख्य रूप से राजस्व रिकॉर्ड में यह निर्धारित करना है कि राजस्व किससे लिया जाना है। यह प्रक्रिया अपने आप में स्वामित्व का अंतिम न्यायिक निर्धारण नहीं करती।
हाईकोर्ट ने कहा था कि मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए Essentiality Certificate महत्वपूर्ण है। बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट ने दिसंबर 2024 में इसके लिए आवेदन किया था। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने नवंबर 2025 में पाया था कि आवेदन लंबे समय तक लंबित रहा। अदालत ने यह भी कहा था कि जमीन के सत्यापन के नाम पर प्रमाणपत्र की प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। हालांकि, 15 जुलाई 2026 के अपने आदेश में खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश में संशोधन किया।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि देवघर के उपायुक्त चार सप्ताह के भीतर जमीन का सत्यापन पूरा करें और उसके बाद सक्षम प्राधिकारी छह सप्ताह के भीतर Essentiality Certificate के आवेदन पर कानून के अनुसार और अपने गुण-दोष के आधार पर फैसला करे। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने प्रमाणपत्र को स्वतः जारी करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
झारखंड हाईकोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर The State of Jharkhand vs Baba Baidyanath Medical Trust, SLP(C) Nos. 34211-34212/2026 मामले की 1 अक्टूबर 2026 की कार्यवाही दर्ज है।
प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने राज्य सरकार की दोनों SLP पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया और याचिकाएं खारिज कर दीं। इस कारण 15 जुलाई 2026 का हाईकोर्ट आदेश प्रभावी बना हुआ है। इस आदेश का व्यावहारिक महत्व यह है कि अब जमीन के म्यूटेशन और Essentiality Certificate से जुड़ी प्रक्रिया को हाईकोर्ट द्वारा तय दिशा-निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ना होगा।
सांसद निशिकांत दुबे का पक्ष
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद गोड्डा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह न्याय की जीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार बाबा बैद्यनाथ मेडिकल कॉलेज खोलने में अड़ंगा डाल रही थी। सांसद ने अपने पोस्ट में यह दावा भी किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर कड़ी टिप्पणी की और यदि मेडिकल कॉलेज को गलत तरीके से परेशान किया गया तो 2002 से 2026 तक देवघर में तैनात रहे अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने जैसी कार्रवाई की बात कही गई।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह हिस्सा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे द्वारा सुनवाई के बाद दी गई प्रतिक्रिया है। उपलब्ध सुप्रीम कोर्ट की ऑनलाइन केस-लिस्टिंग और उपलब्ध हाईकोर्ट के फैसले में ऐसा कोई औपचारिक निर्देश नहीं मिलता कि 2002 से 2026 तक देवघर में तैनात रहे सभी उपायुक्तों या अन्य अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार की SLP खारिज किए जाने के बाद मामले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी अब प्रशासनिक प्रक्रिया है। हाईकोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश के अनुसार जमीन का सत्यापन निर्धारित समय में पूरा किया जाना है। इसके बाद सक्षम प्राधिकारी को बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट के Essentiality Certificate आवेदन पर कानून के अनुसार फैसला लेना है। साथ ही मेडिकल कॉलेज को वास्तविक रूप से शुरू करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) से जुड़ी आवश्यक नियामकीय प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश जमीन और प्रशासनिक अनुमति से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण पड़ाव जरूर है, लेकिन इसे यह मान लेना कि मेडिकल कॉलेज को सभी अंतिम नियामकीय मंजूरियां मिल चुकी हैं, सही नहीं होगा। मेडिकल कॉलेज शुरू करने के लिए संबंधित वैधानिक और चिकित्सा शिक्षा संबंधी मानकों की पूर्ति अभी भी आवश्यक रहेगी।
विवाद का मूल क्या है?
पूरे मामले को देखें तो विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में तीन प्रमुख सवाल रहे हैं - जमीन की कानूनी स्थिति, नीलामी के बाद म्यूटेशन और मेडिकल कॉलेज के लिए आवश्यक सरकारी प्रमाणपत्र।
बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट का पक्ष यह रहा है कि उसने बैंक की वैधानिक नीलामी में संपत्ति खरीदी, उसे सेल सर्टिफिकेट मिला और कब्जा भी सौंपा गया। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने जमीन की प्रकृति, वैधानिक अनुमति और प्रशासनिक सत्यापन से जुड़े सवाल उठाए हैं।
15 जुलाई के हाईकोर्ट के फैसले और 1 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा SLP खारिज किए जाने के बाद फिलहाल न्यायिक स्तर पर राज्य सरकार की चुनौती को राहत नहीं मिली है। अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन हाईकोर्ट के निर्देश के मुताबिक आगे की प्रक्रिया किस तरह और कितनी जल्दी पूरी करता है।
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