जानें गयाजी में पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध का पौराणिक महत्व। विष्णुपुराण और ब्रह्मवैवर्तपुराण के संदर्भ के साथ समझें पितृपक्ष के नियम, गया की प्रमुख वेदियां और पिंडदान से जुड़ी संपूर्ण जानकारी।

 लीला कान्त झा

हमारे पुराणों में पितृ ऋण को सबसे बड़ा ऋण माना गया है, जिसकी तृप्ति के बिना जीवन का चक्र अधूरा माना जाता है। विष्णुपुराण से लेकर ब्रह्मवैवर्तपुराण तक में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि पितृगण श्रद्धा और स्वधा के उच्चारण मात्र से तृप्त हो जाते हैं। पितृपक्ष के इन पवित्र दिनों में जब समस्त पितर लोक से गयाजी आते हैं, तब विधि-विधान से किया गया पिंडदान और तर्पण वंशजों को न केवल पितृ ऋण से मुक्त करता है, बल्कि उनके जीवन में सुख, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद भी भर देता है। आइए जानते हैं गयाजी के पिंडदान से जुड़े पौराणिक नियम, वेदियों का महत्व और इससे जुड़ी जरूरी बातें।

 अपि धन्यः कुले जायादस्माकं मतिमन्नरः। अकुर्वन्वित्तशाठ्यं यः पिंडान्नो निर्वपिष्यति।।

(विष्णुपुराण तृतीयअंश, अध्याय १४/२२)

अर्थात् पितर कहते हैं कि हमारे कुल में क्या कोई ऐसा मतिमान धन्य पुरुष उत्पन्न होगा, जो वित्तलोलुपता को छोड़कर हमें पिंडदान देगा? ऐसा गीत पितर गाते हैं। तात्पर्य यह है कि पितरों को तृप्त करने के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जरूर करना चाहिए।

सामान्यतः श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण का अर्थ श्राद्ध ही है। श्राद्ध वही है जो श्रद्धा से दिया जाता है। सत्य धारण करने की क्रिया को श्रद्धा कहते हैं। जो भी वस्तु पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धापूर्वक दी जाती है, वही श्राद्ध कहलाता है।

श्रद्धया दीयते इति श्राद्धः।

भगवती का एक नाम स्वाहा और एक नाम स्वधा भी है। स्वाहा बोलकर हवन किया जाता है जो अग्नि में जाने पर देवताओं को मिलता है, क्योंकि स्वाहा यज्ञ की पत्नी है। वहीं स्वधा बोलकर जो भी प्रदान किया जाता है, वह पितर को प्राप्त होता है क्योंकि स्वधा पितरों की पत्नी है। इसलिए ब्रह्मवैवर्त महापुराण में स्वधा स्तुति है, जिसमें उल्लेख है कि पितरों को जल देने के समय तीन बार स्वधा - स्वधा अवश्य बोलना चाहिए। कहते हैं - स्वधा कहने मात्र से पितर तृप्त हो जाते हैं। यह ब्रह्मवैवर्तपुराण का कथन है।

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्। श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च।

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।

प्रियां विनीतां स लभेत् साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्।।

अर्थात् स्वधा स्वधा स्वधा - तीनवार कह देने से भी श्राद्ध, काल और तर्पण का फल मिल जाता है। इसका त्रिकाल सन्ध्या पाठ करने से विनीत, पतिव्रता और प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुण सम्पन्न पुत्र का लाभ होता है।      

पितरों का उल्लेख और उनके प्रति श्रद्धा रखते हुए पिंडदान, तर्पण आदि का उल्लेख सभी पुराणों एवं शास्त्रों में किया गया है। विष्णु पुराण में ओर्व ऋषि द्वारा राजा सगर को बताया गया है कि पितर की यह कामना तो होती है कि मेरा पुत्र या वंशज ब्राह्मणों को रत्न, वस्त्र, यान और सम्पूर्ण भोग सामग्री दे। परन्तु पितर कहते हैं कि अन्न - वस्त्र के अभाव में ब्राह्मण को अन्न का भोजन ही करावें। असमर्थ होने पर कच्चा अन्न और थोड़ी दक्षिणा दे। इससे भी असमर्थ हो तो ब्राह्मण को प्रणाम कर एक मुठ्ठी तिल दे। यह भी असमर्थ हो तो पांच - सात तिल के साथ जलांजलि दे। इससे भी असमर्थ होने पर वन में जाकर अपना दोनों हाथ उठाकर कहे कि मैं पितरों को नमस्कार करता हूँ। इसतरह विष्णु पुराण के 14 वें अध्याय में 21 से 30 तक के श्लोकों में पितरों का गायन है। सबका तात्पर्य है कि हमें शक्ति भर उदारता पूर्वक पितृकर्म करना चाहिए।

चूंकि पितृपक्ष की अवधि में सभी पितरलोग गयाजी चले आते हैं, इसलिए पितृपक्ष में गया जाकर पिंडदान करना चाहिए। वैसे तो हर माह का कृष्ण पक्ष पितृपक्ष होता है क्योंकि कृष्ण पक्ष का पन्द्रह दिन पितरों का एक दिन होता है। परन्तु, आश्विन कृष्ण पक्ष का विशेष महत्त्व है।

गया जी में पितृपक्ष में विशाल मेला लगता है। जब मैं वहाँ रहता था, उस समय पितृपक्ष की व्यवस्था केवल वहाँ के पंडों पर निर्भर थी। उस समय शिवराम डालमिया जैसे कुछ समाजसेवियों की ओर से यात्रियों के लिए सुख सुविधा की व्यवस्था की जाती थी। फिर वहां के जिला प्रशासन की ओर व्यवस्था बढ़ायी गयी। अब तो इस मेला की व्यवस्था सरकार ने अपने हाथों ले लिया है। अब अन्य सरकारी मेलों की तरह यहां भी भारी व्यवस्था की जाती है।

गया में आने वाले तीर्थयात्रियों को पिंडदान के लिए मुंडन आवश्यक नहीं है। हेमाद्रि में उद्धृत महाभारत का वचन है कि गया श्राद्ध के निमित्त मुंडन नहीं करावें।

केशष्मश्रु नखादीनां वपनञ्च न शस्यते। अतो न कार्यं वपनं गया श्राद्धार्थिना सदा।

गया में पहुंच कर नख तथा दाढ़ी इत्यादि भी न वनावें और अपने वित्त के अनुसार उदारता पूर्वक दान करें।

प्रश्न है कि क्या एक बार गया श्राद्ध करने के बाद पिंडदान दुबारा भी किया जा सकता है? उत्तर है - हाँ, गया श्राद्ध बार बार करना चाहिए। यदि संभव हो तो प्रतिवर्ष पितृपक्ष में मृत्यु दिन की तिथि को गया आकर पिंडदान, तर्पण करना चाहिए। जिन्हें अपने पूर्वजों की तिथि की जानकारी नहीं हो, वे अमावस्या को पिंडदान करें।

पिंडदान के लिए बड़े बड़े आकार के पिंड आवश्यक नहीं है। अत्यंत छोटे मटर के दाने के बराबर आकार के भी पिंड दिये जा सकते हैं।

गया में जिस स्थान विशेष पर पिंडदान किया जाता है, उसे वेदी कहते हैं। प्राचीन काल में गया में 365 वेदियां थीं, जहाँ तीर्थयात्रीगण साल भर रहकर पिंडदान किया करते थे। परन्तु अब अधिकांश वेदियां लुप्त हो गई हैं। और अब लगभग 40-45 वेदियां ही रह गई हैं, जहाँ तीर्थ यात्री पिंडदान करते हैं। गया के कुछ प्रमुख वेदियों के नाम इस प्रकार हैं - फल्गु नदी, प्रेतशिला, रामशिला (इन वेदियों पर पांच पिण्ड देने का विधान है, जो ब्रह्मकुंड, रामकुंड, प्रेतशिला, रामशिला और काकबलि को दिया जाता है।), उत्तर मानस, दक्षिण मानस, उदीची-कनखल, जिह्वालोल, ब्रह्मसरोवर, धर्मारण्य, सीताकुंड, गयासिर, गयाकूप, भीमगया, गोप्रचार, गदालोल, विष्णुपद वेदी (जिसमें 18 देवताओं के पर चिह्न का स्मरण कर पिंडदान किया जाता है) आदिगदाधर, अक्षयवट आदि ।

वैसे तो हमारे देश में जितने तीर्थ हैं, सभी तीर्थोंमें पितरों को पिंड दिये जाते हैं। परंतु गया तीर्थ का स्थान सर्वोच्च है। गया को तीर्थों का प्राण कहा जाता है।     

                   लेखक बिहार के पूर्व राज्यपाल के पीए थे।

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