सिविल कोर्ट ने 13 साल पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर बेटे और बहू का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। कोर्ट ने जोड़े को 90 दिन के भीतर घर खाली करने का आदेश दिया है।
अहमदाबाद। 13 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अहमदाबाद में बुजुर्ग पिता द्वारा 2013 में दायर किए गए मुकदमे पर सिविल कोर्ट ने अब फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1980 के दशक में खरीदी गई यह प्रॉपर्टी बुजुर्ग व्यक्ति की अपनी कमाई की है, जिस पर बेटे या बहू का कोई आर्थिक योगदान नहीं था। कोर्ट ने बेटे और बहू को अपने पिता का घर खाली करने के लिए 90 दिनों का समय दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह बेदखल का आदेश कपल की बालिग बेटी पर लागू नहीं होगा, क्योंकि दादा ने उसकी ओर से कोई राहत की मांग नहीं की थी।
अहमदाबाद के एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने बेटे और बहू के बीच लगातार चल रहे झगड़ों और कलह से तंग आकर साल 2013 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। बुजुर्ग व्यक्ति ने दावा किया था कि उन्होंने यह घर अपनी खुद की कमाई से 1980 के दशक में खरीदा था और वे इसके एकमात्र और वैध मालिक हैं।
घर की व्यवस्था के तहत बुजुर्ग व्यक्ति पहली मंजिल पर रहते थे, जबकि बेटा और बहू ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे। पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद के कारण वे अलग-अलग कमरों में रहने लगे थे और बेटे ने कोर्ट में तलाक की अर्जी भी दाखिल कर दी थी। बुजुर्ग पिता ने कई बार घर खाली करने को कहा, लेकिन बेटे और बहू ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया और प्रॉपर्टी पर अपना हक जताना शुरू कर दिया।
मुकदमे के दौरान बेटे ने इसका कोई विरोध नहीं किया, लेकिन बहू ने कोर्ट में आरोप लगाया कि यह पूरा मामला उसके पति की मिलीभगत से दायर किया गया है, ताकि चल रहे वैवाहिक विवाद में उस पर दबाव बनाया जा सके। बहू ने यह भी दावा किया कि उसका पति तलाक चाहता था क्योंकि उसका किसी अन्य महिला के साथ संबंध था।
बहू ने तर्क दिया कि चूंकि वह अपनी बेटी के साथ इस घर में रह रही है, इसलिए यह उसका 'साझा घर' (Shared Household) है। उसने घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि उसे इस घर से कानूनी रूप से बेदखल नहीं किया जा सकता।
सिटी सिविल जज वी.ए. धाधल ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेजी सबूत सुनने के बाद फैसला बुजुर्ग पिता के पक्ष में सुनाया। दस्तावेजों से साबित हुआ कि प्रॉपर्टी पूरी तरह बुजुर्ग व्यक्ति की स्वअर्जित है और इसे खरीदने में बेटे या बहू का कोई योगदान नहीं था।
फैसला सुनाते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि सास-ससुर की अपनी निजी और स्वअर्जित संपत्ति को बहू के लिए 'साझा घर' नहीं माना जा सकता है, और इसलिए घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनों के तहत उसे ऐसी प्रॉपर्टी में रहने का कोई अधिकार नहीं है।
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