गोड्डा के पोड़ैयाहाट स्थित भटौंदा में डीबीएल की प्रस्तावित माइनिंग के विरोध में सैकड़ों आदिवासी पारंपरिक हथियारों के साथ जुटे। ग्रामीणों ने पुश्तैनी जमीन बचाने की मांग की।
जितेंद्र कुमार दुबे, पोड़ैयाहाट (गोड्डा)।
गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट प्रखंड अंतर्गत भटौंदा के समीप प्रस्तावित माइनिंग को लेकर आदिवासी ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। सड़क निर्माण कार्य में लगी कंपनी दिलीप बिल्डकॉन (डीबीएल) की कार्यशैली से नाराज सैकड़ों आदिवासी महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग पारंपरिक हथियारों के साथ एकजुट हुए। ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे किसी भी कीमत पर अपनी पुश्तैनी और जमाबंदी जमीन माइनिंग के लिए नहीं देंगे। उनका कहना है कि जमीन ही उनकी आजीविका, पहचान और भविष्य का आधार है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी की ओर से पहले की गई बेतरतीब खुदाई के कारण उनकी जमीनों को भारी नुकसान पहुंचा है। कई जगहों पर गहरी खाइयां बन गई हैं, जिससे जमीन खेती योग्य नहीं रह गई है। ग्रामीणों ने पहले से हुई माइनिंग के बाद बने गहरे गड्ढों को दिखाते हुए पशुओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि यदि दोबारा माइनिंग की अनुमति दी गई तो खेती-किसानी, पर्यावरण और चरागाह पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इससे सैकड़ों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है।
ग्रामीणों ने बताया कि उनकी जमीन पर खेती होती है, मवेशियों के लिए चरागाह उपलब्ध है और इसी के सहारे परिवारों का भरण-पोषण होता है। ऐसे में जमीन का अधिग्रहण या खनन के कारण उसका बर्बाद होना उनके लिए केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व से जुड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल करना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होगा।
इस विरोध के बीच राज्य सरकार की खनन नीतियों पर भी सवाल उठने लगे हैं। जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा आदिवासी हितों के संरक्षण का दावा करने वाली सरकार से ग्रामीणों ने पूछा है कि आखिर उनकी पुश्तैनी जमीन और आजीविका की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? विकास की कीमत क्या किसानों और आदिवासियों को अपनी जमीन गंवाकर चुकानी पड़ेगी?
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि प्रस्तावित माइनिंग पट्टे की प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता बरती जाए। जमीन से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच हो और प्रभावित रैयतों के कानूनी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि जल, जंगल और जमीन ही आदिवासी समाज की पहचान है और इसकी रक्षा के लिए वे एकजुट होकर संघर्ष करेंगे।
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