जसीडीह पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल संजीव कुमार तिवारी से खास बातचीत। जानिए आधुनिक शिक्षा, बच्चों के सर्वांगीण विकास, अनुशासन और बदलते दौर में अध्यापन की चुनौतियों पर उनके क्या विचार हैं। पूरा इंटरव्यू पढ़ें...
शिक्षा केवल अक्षरों और अंकों का ज्ञान भर नहीं है, बल्कि यह व्यक्तित्व का निर्माण और समाज की भावी दिशा तय करने का एक सशक्त माध्यम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के लागू होने के बाद भारतीय स्कूली शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इन नए बदलावों, बच्चों के सर्वांगीण विकास और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े जमीनी मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार तरुण कुमार कंचन ने देवघर स्थित जसीडीह पब्लिक स्कूल (रोहिणी रोड) के प्रिंसिपल संजीव कुमार तिवारी से एक विस्तृत और गंभीर बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस विशेष वार्ता के प्रमुख अंश:
पत्रकारिता और समाज के इस मंच पर आपका स्वागत है। कृपया हमारे पाठकों को अपना परिचय और अपने संस्थान के बारे में बताएं?
मेरा नाम संजीव कुमार तिवारी है। मैं जसीडीह पब्लिक स्कूल, रोहिणी रोड, जसीडीह (देवघर) में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हूँ। इसी साल 5 मई 2026 को मैंने विद्यालय में ज्वाइन किया और मैं गर्व से कह सकता हूँ कि नर्सरी से 12वीं तक की शिक्षा देने में हमारा जो विद्यालय है, वह देवघर जिले में अग्रणी रहा है। यहाँ के बहुत सारे विद्यार्थी न केवल डॉक्टर-इंजीनियर बने, बल्कि आईएएस अधिकारी बने, जेपीएससी क्लियर किया, कुछ दिन पहले बच्चों ने बीपीएससी क्लियर किया और बहुत सारे बच्चे गवर्नमेंट जॉब्स में हैं। इसके अलावा अलग-अलग जॉब्स में हैं। बहुत सारे बच्चे विदेश में भी पढ़ रहे हैं और बहुत सारे बच्चे विदेश में जॉब कर रहे हैं। तो नर्सरी से ट्वेल्थ तक की जो हमारी शिक्षा है, वह बच्चों में सेल्फ-कॉन्फिडेंस बढ़ाती है और उनका इतना पर्सनालिटी डेवलपमेंट भी कर देती है कि वे बच्चे कॉलेज में बहुत अच्छा करते हैं, जिसके चलते वे अपना करियर बहुत जल्दी बना पा रहे हैं।
बच्चों के करियर को गति (Boost-up) देने के लिए विद्यालय स्तर पर क्या विशेष प्रयास किए जाते हैं?

करियर बूस्ट-अप के लिए सबसे पहले हम लोग बच्चों की इंग्लिश स्पीकिंग पर ज़ोर देते हैं। क्लास नर्सरी से ही हम लोग बच्चे को ग्रूम करते हैं कि बच्चे छोटे-छोटे सेंटेंस बनाकर इंग्लिश में ही शिक्षक से बात करें। उनके इंग्लिश कम्युनिकेशन पर हम ध्यान देते हैं।
इसके बाद क्लास टू के बाद इंग्लिश कम्युनिकेशन के साथ बच्चों के पर्सनालिटी डेवलपमेंट के लिए हम लोग अलग से टीचर्स के द्वारा बच्चों को ट्रेंड करते हैं- हाउ टू सीट, हाउ टू स्टैंड, हाउ टू वॉक, हाउ टू टॉक... क्योंकि बाहर में बच्चे कैसे बात करते हैं, इसी से पता चलता है कि बच्चों को कैसी शिक्षा मिल रही है। जहाँ तक बात है, तो नर्सरी से 2 और 3 से 5 तक के बच्चों को पर्सनालिटी डेवलपमेंट और इंग्लिश कम्युनिकेशन पर प्रिपेयर करने के बाद, क्लास सिक्स ऑनवर्ड्स बच्चों में सब्जेक्ट कांसेप्ट और सब्जेक्ट के कांसेप्ट की डेप्थ हम लोग इनबिल्ड करते हैं। इससे बच्चों में सब्जेक्ट के प्रति रुझान आता है और बच्चे रेडी हो जाते हैं कि भाई, हम लोग अब इस सब्जेक्ट को बढ़िया से जान रहे हैं। चाहे वह साइंस की बात हो, चाहे ह्यूमैनिटीज की बात हो, चाहे मैथमेटिक्स की बात हो या किसी भी लैंग्वेज पेपर की बात हो।
बच्चे उस स्टेज में इस लायक हो जाते हैं कि वे 9 और 10 में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, जिससे बोर्ड का रिजल्ट और क्लास 12 का रिजल्ट दोनों अच्छा होता है। बीच-बीच में हम लोग बच्चों को करियर काउंसलिंग का कोर्स भी करवाते हैं। बाहर से ट्रेनर को बुलाते हैं। बहुत सारी करियर काउंसलिंग मैं खुद भी लेता हूँ, क्योंकि मैं सीबीएसई का एक मास्टर ट्रेनर हूँ। इसका सबसे ज्यादा लाभ मैं अपने स्कूल के बच्चों को देता हूँ।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) में शिक्षा को कई स्टेज में बाँट दिया गया है। पुरानी '10+2' व्यवस्था को बदलकर नए चरणों में विभाजित किया है। आप इस नई संरचना के साथ कैसे सामंजस्य बिठा रहे हैं?
न्यू एजुकेशन पॉलिसी के अकॉर्डिंग फाऊंडेशनल स्टेज में 5 क्लासेस को इनबिल्ड किया गया है। क्लास नर्सरी (जिसे हम लोग बाल वाटिका 1 बोलते हैं), एलकेजी (बाल वाटिका 2) और बाल वाटिका 3 हो गया आपका यूकेजी। उसके बाद क्लास एक और दो। ये पांच क्लासेस फाऊंडेशनल स्टेज में आते हैं।
फाऊंडेशनल स्टेज में सबसे पहले जैसे ही बच्चे का एडमिशन हम लोग नर्सरी में लेते हैं, तो सबसे पहले बच्चे को लेटर्स और नंबर्स आइडेंटिफाई करवाते हैं। उसके बाद लिखना सिखाते हैं। पहले आइडेंटिफिकेशन समझाते हैं कि दे शुड नो नंबर्स। क्या हैं नंबर्स, किसको बोलते हैं लेटर्स, क्या होता है, कैसे लिखते हैं लेटर्स को और इस लेटर से क्या शब्द बनता है। नर्सरी से क्लास टू तक के बच्चों को फाऊंडेशनल न्यूमरेसी और फाऊंडेशनल लिटरेसी कंप्लीट कराने के बाद, फिर बच्चों को हम लोग धीरे-धीरे बाकी सब्जेक्ट्स पर कमांड करवाते हैं।
नई शिक्षा नीति में मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक फिटनेस पर भी जोर दिया गया है। इसके लिए आपके स्कूल की क्या व्यवस्था है?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अकॉर्डिंग जो पहले से हमारा वेल-डिफाइंड कोर्स है - फिजिकल एजुकेशन एंड हेल्थ, उसे हम लोग बच्चों के सब्जेक्ट्स में ही ऑलरेडी ऐड ऑन कर दिए हैं। तो फिजिकल एजुकेशन एंड हेल्थ बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ टीचर बच्चों को स्पोर्ट्स में ले जाते हैं। वहाँ बच्चों को बताते हैं कि बेटा, इस पर्टिकुलर एक्सरसाइज का क्या बेनिफिट है।
नई पॉलिसी के तहत खेल और पाठ्येतर गतिविधियों (Co-Curricular Activities) के विकास के लिए विद्यालय की क्या योजना है?
इसके लिए हमारे विद्यालय का बहुत अच्छा प्लान है। हमारे सेक्रेटरी सर के निर्देशन पर हमने सैटरडे को 'फुल सैटरडे एक्टिविटी क्लास' बना दिया है। उसमें बच्चे डांस, म्यूजिक, स्पोर्ट्स, सिंगिंग - यह सब कुछ सीखते हैं। अलग-अलग स्पोर्ट्स जैसे हॉकी, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, क्रिकेट... जितने भी तर्ज के हैं, हम लोग कोशिश करते हैं कि सारे बच्चों को उनके इंटरेस्ट के अकॉर्डिंग अलग-अलग स्पोर्ट्स में पार्टिसिपेट कराएं। सैटरडे को हमारे स्कूल में फुल एक्टिविटी होती है और सभी बच्चे फुल एन्जॉय करते हैं।
वर्तमान में विद्यालय में कुल कितने विद्यार्थी हैं, और उनमें वंचित या गरीब तबके (BPL Category) के बच्चों की क्या सहभागिता है?
अभी हमारे पास ऑलमोस्ट 1100 प्लस बच्चे हैं। नियम के अनुकूल हमारे विद्यालय की हर क्लास में (नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी, क्लास वन और क्लास टू में) 4 से 5 बच्चे बीपीएल कैटेगरी के हैं।
15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) के पावन अवसर पर विद्यालय परिसर में क्या खास तैयारियाँ की जा रही हैं?
बहुत अच्छा क्वेश्चन है। जैसा कि हम जानते हैं, 15 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता दिवस है। इस दिन भारत की आजादी को हम लोग याद करते हैं। तो सबसे पहले हमने सेमिनार लेकर बच्चों को बताया कि बेटा, हम लोग कोई दिवस क्यों मनाते हैं? हम स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाते हैं? उस दिन हम सारे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करेंगे। साथ ही साथ हम यह समझेंगे कि कैसे अपनी आजादी को हमेशा बनाए रखें, ताकि फिर कोई आक्रमणकारी हमारे देश को गुलाम न बना पाए।
ये सब चीजें अगर बच्चों को स्कूल में बताई जाती हैं, तो बच्चे उसका इम्पोर्टेंस और महत्व समझ पाते हैं। इसीलिए हमने सबसे पहले क्या किया कि बच्चों को बोला - जो बच्चे भाषण में पार्टिसिपेट कर रहे हैं, जो सॉन्ग में पार्टिसिपेट कर रहे हैं, जो नाटक व नुक्कड़ नाटक में पार्टिसिपेट कर रहे हैं - उन्हें बताया कि 15 अगस्त का क्या महत्व है। उसी से रिलेटेड बच्चों ने बहुत अच्छे-अच्छे छोटे-छोटे भाषण और स्पीचेज लिखे हैं। कोई बच्चा इंग्लिश में, कोई हिंदी में, यहाँ तक कि कोई बच्चा संस्कृत में भी अपना भाषण तैयार किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि सारे बच्चे 15 अगस्त को बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे। वे असली में समझाएंगे कि 15 अगस्त का मतलब क्या होता है।
15 अगस्त का मतलब केवल आजादी और छुट्टी ही बच्चे नहीं समझेंगे, बल्कि बच्चे यह भी समझेंगे कि हम अपने देश के लिए इस दिन का कैसे उपयोग करें?
इसके लिए, जैसा कि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 'हर घर तिरंगा' का कैंपेन चलाया है, उसके तहत हमने बच्चों को पहले ही बोल दिया है कि बेटा, अपने घर के सामने आपको अपना एक तिरंगा जरूर फहराना है। हर जगह तिरंगा दिखेगा, तो बच्चों को उसका महत्व समझ में आएगा कि लाखों-करोड़ों लोग इसके लिए शहीद हो गए, हंसते-हंसते अपने प्राण दे दिए, तो तिरंगे का क्या महत्व है। 15 अगस्त हमें यह याद दिलाता है, लेकिन तिरंगे की रक्षा कैसे करनी है, यह हमें बच्चों को सिखाना चाहिए।
अक्सर निजी स्कूलों पर किताबों, कॉपियों और परिधानों (Dress) के व्यावसायिक विक्रय का आरोप लगता है। इस समस्या के समाधान के लिए आपकी क्या सोच है?
उसके लिए तो हमारा विद्यालय कभी भी किसी बच्चे या पेरेंट्स को प्रेशराइज नहीं करता कि आप यहीं से यह चीज़ लीजिए। आपको जहाँ जो मिलता है, लीजिए। एनसीईआरटी की बुक्स जहाँ उपलब्ध हैं, वहाँ से लीजिए। हमारे जो ड्रेसेस हैं, उसके लिए हमने कुछ शॉप्स को बोला है, बाकी आप किसी भी शॉप से सेम ड्रेस ले सकते हैं। इसके लिए हमारी तरफ से कोई बाध्यता नहीं है।
हाँ, इसको कम करने के लिए एक ही उपाय है कि सारे स्कूलों के ड्रेस में एक यूनिफॉर्मिटी (एकरूपता) हो जाए। एक ही टाइप का ड्रेस होगा तो वह हर जगह अवेलेबल होगा, जिससे न तो शॉपकीपर परेशान होंगे और न पेरेंट्स परेशान होंगे। इसके लिए सारे स्कूलों को आगे आना होगा। जैसे झारखंड सरकार के विद्यालयों का ड्रेस यूनिक है, वैसे ही अगर ड्रेस में एकरूपता हो, तो लगभग सारे बच्चों का ड्रेस कोड मार्केट में आसानी से उपलब्ध हो जाएगा और पेरेंट्स को परेशानी नहीं होगी। इस पर सारे विद्यालयों को आगे आकर सोचना होगा।
विद्यालय के संस्थापक/डायरेक्टर साहब ने इस स्कूल की नींव कब रखी थी? उनका मूल उद्देश्य क्या था और आज उनका वह सपना किस मुकाम तक पहुँचा है?

पूर्व छात्र विनायक राज को बीपीएससी में सफलता पर मिठाई खिलाते डायरेक्टर डॉ. भारतेंदु दुबे
जसीडीह पब्लिक स्कूल यानी हमारे स्कूल के जो डायरेक्टर सर हैं, वही 'बाल कल्याण ट्रस्ट' के सेक्रेटरी भी हैं। डायरेक्टर सर का एक ही उद्देश्य था कि आसपास के बच्चों के लिए एक ऐसा स्कूल नॉमिनल रेट पर अवेलेबल हो, जिससे हर कस्बे का इंसान अपने बच्चों को पढ़ा सके। इसीलिए सर ने इस स्कूल को 2001 में एस्टेब्लिश किया।
शुरुआती दौर में 150 बच्चों से शुरुआत हुई। हमारे डायरेक्टर डॉ. भारतेंदु दुबे सर, जो खुद एक बहुत नॉलेजेबल पर्सन हैं और अपने विषय में विख्यात हैं, उन्होंने एक बड़े सपने के साथ इस विद्यालय को शुरू किया था। 150 बच्चों से शुरू होकर आज इस विद्यालय में 1100 प्लस बच्चे हैं। न जाने कितने बच्चे यहाँ से पढ़कर आईएएस अधिकारी हैं, कितने जेपीएससी कैडर में हैं, कितने बीपीएससी कैडर में हैं, और कितने ही बच्चे इंजीनियर, डॉक्टर तथा विदेश में अच्छे जॉब के साथ एस्टेब्लिश हैं।
सर का जो सपना था कि हम हर तबके के बच्चे के लिए एक ऐसा स्कूल खोलें जिसमें गरीब से गरीब बच्चा भी पढ़ सके। हमारे यहाँ रिक्शा चालक के बच्चे भी पढ़ते हैं, टेम्पो चालक के बच्चे पढ़ते हैं, और अधिकारियों के बच्चे भी पढ़ते हैं। सभी बच्चों का अधिकार समान है। सारे बच्चों का हम लोग एक समान रूप से ध्यान रखते हैं और सबको समान ज्ञान प्रदान करते हैं।
डायरेक्टर डॉ. भारतेंदु दुबे सर का जो सपना था कि हमारा विद्यालय ऐसा बने जहाँ प्रतिभाएँ जन्म लें और उनमें से निखरकर एक नया व्यक्तित्व सामने आए, उनका वह सपना आज पूरी तरह फलीभूत हो रहा है।

.............................................................................................................................
Office - Kanchanwani Media Network, Gayatri Colony, Opp. - Shivay Guest House, Dabour Gram, Jasidih, Deoghar, Jharkhand - 814142
Email - info@kanchankranti.com
M.N. 8987259822
