झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पिता द्वारा नाबालिग बेटे को साथ ले जाने पर अपहरण (IPC 363) का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने धनबाद अदालत के समन आदेश को रद्द कर दिया।



रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पिता अपने नाबालिग बेटे को अपने साथ ले जाता है, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ अपहरण का मामला नहीं बनता, क्योंकि पिता बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक (Natural Guardian) होता है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि केवल सामान्य रूप से मारपीट का आरोप लगा देने से कोई आपराधिक मामला नहीं बनता। इन आधारों के साथ हाईकोर्ट ने धनबाद अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही और जारी समन आदेश को निरस्त कर दिया।

धनबाद कोर्ट के समन आदेश को दी गई थी चुनौती

यह आदेश जस्टिस अनिल चौधरी की एकल पीठ ने हजारीबाग निवासी खालिद इकबाल की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने धनबाद के न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा 12 जून 2024 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (मारपीट), 341 (गलत तरीके से रोकना) और 363 (अपहरण) के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया गया था।

पत्नी द्वारा दर्ज कराए गए थे आरोप

शिकायतकर्ता पत्नी का आरोप था कि पति ने उसे चार वर्षीय बेटे के साथ धनबाद रेलवे स्टेशन बुलाया और वहां से बच्चे को अपने साथ ले गया। इसके बाद जब वह पति के घर पहुंची, तो पति और उसके परिजनों ने उसके साथ मारपीट की। इन आरोपों के आधार पर धनबाद की अदालत ने प्राथमिक दृष्टया मामला मानते हुए समन जारी किया था।

हाईकोर्ट की टिप्पणी: मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग

मामले की सुनवाई के दौरान सभी साक्ष्यों और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने धनबाद कोर्ट की पूरी कार्यवाही और 12 जून 2024 के समन आदेश को निरस्त कर दिया।

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