पटना हाईकोर्ट ने जमुई के चर्चित गोविंद हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए आजीवन कारावास की सजा पाए तीनों आरोपियों को साक्ष्य के अभाव और बयान में विरोधाभास के कारण बरी कर दिया है


पटना। हाईकोर्ट ने जमुई जिले के सोनो थाना क्षेत्र से जुड़े एक चर्चित भूमि विवाद और हत्या के मामले (सोनो थाना कांड संख्या 42/2005) में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीनों सजायाफ्ता अभियुक्तों सत्यनारायण यादव, गोपाल यादव और झोटहा यादव को संदेह का लाभ देते हुए पूरी तरह बरी कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह और न्यायमूर्ति अंशुल की खंडपीठ द्वारा आपराधिक अपील की सुनवाई के बाद दिया गया।

मृतक गोविंद यादव के सगे भाई और इस मामले के सूचक (शिकायतकर्ता) प्रयाग यादव के बयान पर यह मामला दर्ज किया गया था। आरोप लगाया गया था कि घटना के दिन वे अपने छोटे भाई गोविंद यादव के साथ खेत में मवेशी चरा रहे थे। इसी दौरान पुराने भूमि विवाद को लेकर तीनों ग्रामीण वहां पहुंचे और तीखी बहस के बाद टांगी के बट से गोविंद पर हमला कर दिया। सूचक का यह भी दावा था कि जब उसने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो उस पर भी हमला किया गया, जिसके बाद वह अपनी जान बचाकर वहां से भाग गया। कुछ देर बाद जब वह वापस लौटा, तो उसने अपने भाई गोविंद को मृत पाया।

इस मामले की सुनवाई करते हुए जमुई के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (प्रथम) ने 24 दिसंबर 2007 को तीनों अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/34 के तहत दोषी ठहराया था। इसके बाद 2 जनवरी 2008 को उन्हें आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी और प्रत्येक पर दो-दो हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने पटना हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी।

पटना हाईकोर्ट ने मामले के साक्ष्यों का समग्र और बारीकी से मूल्यांकन किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष अदालत में बिना किसी संदेह के अपना मामला साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। फैसले के मुख्य आधार निम्नलिखित रहे:

सूचक प्रयाग यादव के शुरुआती पुलिस बयान और कोर्ट में दी गई गवाही में स्पष्ट विरोधाभास पाया गया।

अभियोजन पक्ष द्वारा बताए गए हमले के तरीके (टांगी के बट से हमला) और मृतक के शरीर पर पाई गई चोटों की प्रकृति (विशेषकर गर्दन की चोट) के बीच कोई तालमेल या मेडिकल समर्थन नहीं मिला।

घटना का समर्थन करने वाला कोई भी स्वतंत्र गवाह सामने नहीं आया। पूरा मामला केवल हितबद्ध (सगे भाई) गवाह के बयान पर टिका था, जिसकी पुष्टि अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से नहीं हो सकी।

पुलिस अनुसंधान और साक्ष्य संकलन प्रक्रिया में भी कई गंभीर खामियां पाई गईं। इन तमाम कानूनी पहलुओं और विसंगतियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया।


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