विशेष रिपोर्ट : गोड्डा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के 1959 खाद्य आंदोलन पर किए गए ट्वीट के बाद X (ट्विटर) पर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। जानिए 1959 के कोलकाता गोलीकांड के ऐतिहासिक तथ्य, राज्य प्रशासन की भूमिका और राजनीतिक दावों की हकीकत।
तरुण कुमार कंचन, देवघर।
सुबह की पहली किरण के साथ ही सोशल मीडिया पर राजनीतिक तापमान अचानक चढ़ गया। मौका था गोड्डा (झारखंड) से भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के एक सोशल मीडिया पोस्ट का, जिसने भारतीय राजनीति के इतिहास और वर्तमान को फिर से आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है। डॉ. दुबे ने अपने ट्विटर हैंडल (X) पर ‘कांग्रेस का काला अध्याय-164’ श्रृंखला के तहत 27 अगस्त 1959 को कोलकाता की सड़कों पर हुए ऐतिहासिक 'खाद्य आंदोलन' (Food Movement) का जिक्र करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस नेतृत्व पर तीखा हमला बोला।
सांसद डॉ. दुबे के आरोप: नेहरू सरकार और 'पिल्लू वाला चावल'
डॉ. दुबे ने आरोप लगाया कि वर्ष 1959 में भीषण भुखमरी, कालाबाजारी और खाद्यान्न संकट से जूझ रही बंगाल की जनता जब पेट की आग बुझाने के लिए रोटी मांगने सड़कों पर उतरी, तब नेहरू सरकार ने उन्हें गोलियों, लाठियों और जेल की सलाखों का जवाब दिया।
सांसद का दावा है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद्र राय और मंत्री पी.सी. सेन केंद्र से लगातार मदद मांगते रहे, लेकिन नेहरू का ध्यान केवल चीन पर केंद्रित था। भारी दबाव के बाद केंद्र से जो राशन भेजा भी गया, वह सड़ा हुआ और कीड़े (पिल्लू) लगा था। डॉ. दुबे के मुताबिक, इस पुलिसिया दमन में 50 लोग मारे गए, 500 घायल हुए, 100 लापता हो गए और 3,000 प्रदर्शनकारियों को जेल में ठूंस दिया गया—जो नेहरू-गांधी परिवार की कथित जनविरोधी सोच का स्पष्ट प्रमाण है।
X पर छिड़ा वाकयुद्ध
भाजपा सांसद के इस पोस्ट के आते ही सोशल मीडिया दो धड़ों में विभाजित हो गया और प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। जहां सत्तापक्ष के समर्थकों और 'मोदी का परिवार' जैसे हैंडल्स ने इसे "लोकतंत्र पर भाषण देने वाली कांग्रेस का असली चेहरा" करार दिया, वहीं दूसरी ओर आम यूजर्स और विपक्षी समर्थकों ने सांसद पर ही निशाना साधना शुरू कर दिया।
सोशल मीडिया यूजर शंकरदत्त त्रिपाठी ने तीखा पलटवार करते हुए लिखा, छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी। नए भारत में छात्रों पर लाठियां और पैलेट चलाए गए तथा 50 से अधिक पेपर लीक मामलों में आवाज उठाने वालों को आतंकवादी करार दे दिया गया।" वहीं धीरेंद्र नामक यूजर ने तंज कसा कि 12 साल से नेहरू की फोटो के पीछे छिपने के बजाय अपनी वर्तमान जिम्मेदारियों पर ध्यान देना चाहिए।
हालांकि, नेहरू के आलोचकों ने भी इस बहस में हिस्सा लिया और तर्क दिया कि नेहरू की नीतियों का खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है, जबकि भारत को सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व की जरूरत थी। इस पूरी बहस के बीच संजय शेखावत नामक यूजर ने तटस्थ रुख अपनाते हुए लिखा, कांग्रेस के कारनामे सभी जानते हैं, लेकिन वर्तमान सत्तापक्ष को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी
यदि इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे छिपे ऐतिहासिक और संवैधानिक तथ्यों का विश्लेषण करें, तो यह अकाट्य सच है कि अगस्त-सितंबर 1959 में पश्चिम बंगाल अकाल जैसी भयानक स्थिति से गुजर रहा था। वामपंथी दलों के संगठन 'पीआईएफआरसी' (PIFRC) के नेतृत्व में लाखों लोगों ने कोलकाता में विरोध प्रदर्शन किया था।
31 अगस्त 1959 को जब हजारों प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर 'राइटर्स बिल्डिंग' (राज्य सचिवालय) की ओर बढ़ रहे थे, तब पुलिस ने भीषण लाठीचार्ज, आंसू गैस और गोलीबारी की थी। इस बर्बर कार्रवाई में तत्कालीन सरकारी आंकड़ों के अनुसार 30 से 39, जबकि विपक्षी दलों के दावों के अनुसार 80 से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी। इस दौरान 1,000 से अधिक लोग घायल हुए और 3,000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारियां हुईं।
प्रशासनिक जवाबदेही: केंद्र बनाम राज्य का संवैधानिक सच
राजनीतिक बयानों में अक्सर ऐतिहासिक तथ्यों और राजनीतिक सहूलियत का घालमेल कर दिया जाता है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, कानून-व्यवस्था पूरी तरह से राज्य सरकार का विषय है। वर्ष 1959 की उस भयानक पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज का प्राथमिक आदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधान चंद्र राय के अधीन राज्य प्रशासन द्वारा दिया गया था, न कि सीधे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्देश पर।
ऐतिहासिक दस्तावेजी साक्ष्य बताते हैं कि डॉ. बी.सी. राय और जवाहरलाल नेहरू के बीच प्रगाढ़ संबंध थे और केंद्र सरकार द्वारा बंगाल को केंद्रीय पूल से खाद्यान्न आपूर्ति भी की गई थी। हालांकि, राज्य स्तर पर मुनाफाखोरी, कालाबाजारी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की विफलता के कारण स्थितियां अनियंत्रित हो गईं। केंद्र द्वारा जानबूझकर सड़ा हुआ चावल भेजने या प्रधानमंत्री का ध्यान पूरी तरह चीन पर केंद्रित होने जैसे दावे विशुद्ध राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा हैं, जिनका कोई सीधा ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इस कड़वे सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि 1959 का खाद्य आंदोलन स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक बेहद दुखद और काला अध्याय है, जहां अपने अधिकारों की मांग कर रही निहत्थी जनता पर राज्य की क्रूरता बरसी थी। हालांकि, छह दशक पुरानी इस दुखद त्रासदी का उपयोग आज के राजनीतिक नैरेटिव के अनुसार आधा-अधूर पेश करने के बजाय, इतिहास से सबक लेकर वर्तमान की प्रशासनिक और नीतिगत व्यवस्थाओं को अधिक पारदर्शी व जनहितैषी बनाने की सख्त आवश्यकता है।
…………………………………………………………………………………………………………………………
शिकायत, सुझाव और सूचना के लिए संपर्क करें।
Office - Kanchanwani Media Network, Gayatri Colony, Opp. - Shivay Guest House, Dabour Gram, Jasidih, Deoghar, Jharkhand - 814142
Email - info@kanchankranti.com
M.N. 8987259822