बारिश के मौसम में राहत की बूंदों के साथ आंखों में इंफेक्शन का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। इन दिनों आई फ्लू, आंखों में लालिमा, जलन और खुजली की समस्याएं घर-घर देखने को मिल रही हैं। जरा सी लापरवाही और गलत दवाओं का इस्तेमाल आंखों की रोशनी तक को प्रभावित कर सकता है। आखिर इस मौसम में आंखों को कैसे सुरक्षित रखें, सही लक्षण क्या हैं और बिना डॉक्टरी सलाह के ली जाने वाली दवाएं कितनी खतरनाक हो सकती हैं? इन तमाम अहम सवालों पर kanchankranti.com के पत्रकार तरुण कुमार कंचन ने सदर अस्पताल देवघर के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. मृणाल सिंह से खास बातचीत की। प्रस्तुत है यह पूरा साक्षात्कार:


बारिश के मौसम में आंखों में समस्याएं बढ़ जाती हैं। आई फ्लू हो जाता है, आंखों में खुजली होने लगती है, लालिमा आ जाती है और आंखों से पानी आने लगता है। क्या इसे रोका जा सकता है या इसके बचाव के क्या उपाय हो सकते हैं?

 

 इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन इससे बचाव किया जा सकता है। हम लोग मेडिकल की भाषा में इसे कंजंक्टिवाइटिस (Conjunctivitis) कहते हैं। यह फंगल कंजंक्टिवाइटिस भी हो सकता है। यह एक कम्युनिकेबल डिजीज (फैलने वाली बीमारी) है। यदि किसी व्यक्ति को ऐसा हो गया है तो उसे आइसोलेट करना ही बेहतर होगा।

 

दूसरा प्रिकॉशन यह रखना है कि घर के मेंबर हैं तो उनको डार्क गॉगल्स दिया जाना चाहिए। प्रॉपर एंटीबायोटिक या एंटीवायरल ट्रीटमेंट लेना चाहिए। कंप्लायंस में रहिए, डॉक्टर से फॉलोअप में रहिए और तुरंत दिखाइए, क्योंकि कई बार आंख को रगड़ने से कॉर्निया में अल्सरेशन (Ulceration) हो जाता है। इसके चलते आंखों की रोशनी कम हो सकती है और परमानेंटली डैमेज भी हो सकता है। इससे विजन लॉस की भी आशंका बढ़ जाती है।

 

बरसात में आंखों में सबसे ज्यादा शिकायत खुजली होने की है?

 

आंखों में खुजली एलर्जी की वजह से हो सकती है। जैसे आपके घर में कोई पेट डॉग है तो इसकी एलर्जी से भी आपकी आंखों में खुजली हो सकती है। कोई फूड है तो उससे भी आपको एलर्जी हो सकती है, जैसे कुछ लोगों को अंडा खाने से एलर्जी होती है। किसी को डस्ट माइट (Dust Mites) या कारपेट के डस्ट से भी एलर्जी हो सकती है। पॉलेन (Pollen) से एलर्जी हो सकती है, जैसे किसी प्लांट का पॉलेन हो तो उससे भी एलर्जी हो सकती है। ऐसे एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस में हम लोग दो-चार तरह के आई ड्रॉप्स देते हैं। यह ज्यादा दिक्कत वाली चीज नहीं है, केवल ध्यान इतना रखना है कि आंखों को रगड़ना नहीं है।

 

क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

 

सावधानियां यह हैं कि अभी वायरल केराटाइटिस (Viral Keratitis) बहुत ज्यादा देखा जा रहा है। जब भी कुछ हो, तुरंत आप डॉक्टर से मिलें और आंख रगड़ें नहीं। डार्क गॉगल्स पहनना है और धूप में कम निकलना है। धूप से एक्सपोजर नहीं होना चाहिए, नहीं तो फोटोफोबिया (Photophobia - रोशनी से तकलीफ) होने के चांसेस ज्यादा बढ़ जाते हैं।

 

सबसे पहले आप अपने आप को आइसोलेट कर लें। मतलब सेल्फ आइसोलेशन ही सबसे उपयुक्त बचाव है। चार से पांच दिन तक, क्योंकि वह इनक्यूबेशन पीरियड (Incubation Period) होता है, वैसे में आपको पब्लिक इंटरेक्शन से बचना है और डॉक्टर को इमीडिएटली दिखाना है।

 

यदि ऐसी समस्या हो जाए तो शुरुआत में कौन-सी दवाई ली जा सकती है?

 

ऐसी स्थिति में डॉक्टर सबसे पहले एग्जामिनेशन करते हैं, फ्लोरेसिन स्टेन (Fluorescein Stain) करते हैं, क्योंकि सारे अल्सरेशन और कंजंक्टिवाइटिस का पैटर्न अलग-अलग होता है। उसको डायग्नोस करने के बाद एंटीवायरल, एंटीबायोटिक और एंटी-एलर्जिक ड्रॉप देते हैं। साथ में एक लुब्रिकेंट भी देते हैं। यदि अल्सरेशन ज्यादा है तो एट्रोपिन (Atropine) करके एक ड्रॉप आता है, उसे देते हैं। वह आपके पेन (दर्द) में भी रिलीज देता है और कंफर्ट रखता है, तो हम लोग उसे कई बार देते हैं।

 

तो क्या ऐसी स्थिति में हम लुब्रिकेंट और ड्रॉप का यूज कर सकते हैं?

 

हां, लुब्रिकेंट हम यूज कर सकते हैं, लेकिन अनइथिकल एंटीबायोटिक ड्रॉप का यूज नहीं करना है। लुब्रिकेंट का यूज कर सकते हैं, कभी भी कर सकते हैं और किसी भी एज ग्रुप के लोग लुब्रिकेंट का यूज कर सकते हैं। मतलब प्रोटेक्शन के नाम पर हम एंटीवायरल या एंटीबायोटिक ड्रॉप अपने मन से स्टार्ट नहीं करेंगे।

 

उसका साइड इफेक्ट यह होगा कि एंटीबायोटिक या एंटीवायरल रेजिस्टेंस हो जाएगा। यदि रेजिस्टेंस हो गया तो अगली बार फिर इंफेक्शन होने पर मेडिसिन काम नहीं करेगी, उसे ड्रग रेजिस्टेंस (Drug Resistance) बोलते हैं। आप आई ड्रॉप ले सकते हैं, लेकिन लुब्रिकेंट। लुब्रिकेंट आप लेंगे तो CMC (कार्बोक्सीमिथाइल सेल्यूलोज), उसे आर्टिफिशियल टियर (Artificial Tear) बोलते हैं।

 

यदि परिवार में किसी को हो जाए तो अपने आप बचाव कैसे करेंगे?

 

 सबसे पहले जिनको हुआ है उनको सेल्फ आइसोलेशन में रखना चाहिए। यदि आपको कोई लक्षण दिख रहा है, जैसे स्टिकिनेस (आंख चिपकना) दिख रहा है, डिस्चार्ज दिख रहा है, सुबह-सुबह आंख चिपक रही है, लगातार खुजली बनी हुई है या रेडनेस दिख रही है, तो जल्दी से किसी आई सर्जन या कंसलटेंट से दिखाइए और मरीज को अलग रखिए।

 

उनका पब्लिक इंटरेक्शन कम कीजिए। यह कम्युनिकेबल डिजीज है, तो आमने-सामने वाले लोगों पर भी प्रभाव पड़ता है और संक्रमण होने के चांसेस बढ़ जाते हैं। आंख को किसी भी हालत में रगड़ना नहीं है।

 

इस बीमारी के शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

 

 शुरुआती लक्षण जैसे रेडनेस हो गया यानी आंख में लालिमा होना, आंख में दर्द हो सकता है, डिस्चार्ज हो सकता है। वायरल में वॉटरी (पानी जैसा) डिस्चार्ज होता है। बैक्टीरियल इंफेक्शन में म्यूकोइड डिस्चार्ज (Mucoid Discharge) होता है, जो कि थिक (गाढ़ा) डिस्चार्ज होता है। कई बार रोशनी भी कम हो सकती है।

 

समाज में जो भ्रांतियां हैं कि किसी को कंजंक्टिवाइटिस हो गई है तो देखने से सामने वाले को भी हो जाएगी, इसमें कितनी सच्चाई है?

 

 निश्चित रूप से यह भ्रांति है, लेकिन इसे कंपलीटली रूल आउट नहीं कर सकते, यानी यह पूरी तरह भी भ्रांति नहीं है। यदि कोई सामने है और आप उनसे इंटरेक्शन कर रहे हैं, जैसा कि मैंने पहले ही बताया था कि इसमें इंटरेक्शन अवॉइड करना है यानी 6 फीट की दूरी मेंटेन रखनी है। अगर आप फेस टू फेस हैं तो जाहिर सी बात है कि कम्युनिकेबल डिजीज होने के कारण आपको भी वह हो सकता है।

 

सबसे पहले जो पेशेंट हैं, उन्हें खुद संपर्क से दूर होना चाहिए और सेल्फ आइसोलेट हो जाना चाहिए। यदि परिवार में छोटे बच्चे या बुजुर्ग हैं तो सबसे पहले कांटेक्ट में आने से बचना चाहिए। पेशेंट को भी रूल फॉलो करना है और अटेंडेंट को भी यह रूल फॉलो करना है, यानी कम से कम 6 फीट की दूरी अनिवार्य रूप से रखनी चाहिए और डार्क गॉगल्स पहनना चाहिए।

 

परिवार में बच्चों और बुजुर्गों को इससे कैसे बचा सकते हैं?

 

 बच्चों का प्रॉपर आई चेकअप कराएं। साथ ही बहुत सारे ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चों की प्रॉपर स्क्रीनिंग की जाती है, वहां ऐसी स्थिति में स्वयं पकड़ में आ जाएगा कि बच्चों को कंजंक्टिवाइटिस तो नहीं हुई है। यह भी पता चल जाएगा कि आंखों की रोशनी तो कम नहीं हो रही है।

 

मेरा यह सुझाव है कि सभी स्कूलों को एक समय पर बच्चों का आई चेकअप कराना चाहिए, वहीं से हम बच्चों को ऐसी बीमारियों से बचा सकते हैं। इसके साथ घर के लोगों को भी बता दें कि अगर किसी बच्चे में ऐसा लक्षण दिखे तो सबसे पहले अभिभावक को बताया जाए और तत्काल डॉक्टर से संपर्क करके बच्चे को दिखाया जाए।

 

ऐसी बीमारी में घरेलू नुस्खे कहां तक कामयाब रहते हैं?

 

 इसमें हम लोग घरेलू नुस्खे अवॉइड करने की सलाह देते हैं। यदि कोई कहे तो भी उसे घरेलू नुस्खे नहीं आजमाने चाहिए। लोग ऐसी स्थिति में गुलाबजल आंख में डाल देते हैं। गुलाब जल में कौन-सा ऐसा एंटीबायोटिक होता है, जो तत्काल प्रभाव डाले? गुलाब जल में कोई एंटीबायोटिक प्रॉपर्टी नहीं है जिससे कंजंक्टिवाइटिस ठीक हो सके। वह ड्राई आई (Dry Eye) में काम कर सकता है, लेकिन किसी इंफेक्शन या संक्रमण में काम नहीं करेगा।

 

जो लोग मेडिकल स्टोर से सीधे जाकर दवाई खरीदते हैं, उनके लिए आप क्या कहेंगे?

 

 वह अनइथिकल प्रैक्टिस है, वह नहीं करना चाहिए। उसे हम लोग अवॉइड करने को कहते हैं क्योंकि दुकानों में अधिकतर लोग फार्मासिस्ट होते हैं या कई जगह तो फार्मासिस्ट भी नहीं होते। कोई रैंडम मेडिसिन दे देता है। उनको मेडिसिन का सही नॉलेज नहीं होता और जानकारी न होने के कारण इंफेक्शन बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है। जहां हम स्टेरॉयड नहीं देते, वहां वे स्टेरॉयड कॉम्बिनेशन की दवा भी इंफेक्शन के केस में दे देते हैं। स्टेरॉयड जब किसी भी इंफेक्शन में देंगे तो वह बीमारी को बढ़ा देगा।

 

स्टेरॉयड की दवा तो अक्सर दवा दुकान वाले दे देते हैं?

 

 हां, अक्सर यह कॉमन दवा है, जैसे सिप्लॉक्स-डी (Ciplox-D)। 'डी' का मतलब होता है - डेक्सामेथासोन (Dexamethasone), जो कि एक स्टेरॉयड है। यदि किसी इंफेक्शन के केस में इसे दे दिया जाए तो वह बीमारी को घटाता नहीं, बल्कि बढ़ा देता है। सिप्लॉक्स-डी देना तो कॉमन प्रैक्टिस बन गई है, जो भी झोलाछाप (Quacks) हैं या दवा दुकानदार हैं, वे यह दवा दे देते हैं। यह सही नहीं है। लोगों को लगता है कि यह सस्ती दवा है और एंटीबायोटिक है, लेकिन वे इसके कॉम्बिनेशन को समझ नहीं पाते। इसलिए स्टेरॉयड को अवॉइड करना है।

 

अंत में हमारे पाठकों और दर्शकों से आप क्या कहना चाहेंगे?

 

यदि ऐसा कोई भी लक्षण दिखे, जैसे रेडनेस (लालिमा), आंखों में इचिंग (खुजली) या दर्द हो रहा हो, थिक डिस्चार्ज हो रहा हो या स्टिकिनेस हो (सुबह-सुबह आंख चिपक रही हो), तो आप इसे नजरअंदाज न करें। आज ही तीन-चार मरीज हमारे पास आए हैं जो बीमारी होने के तीन-चार दिन बाद पहुंचे हैं। ऐसे में दिक्कत यह होती है कि मरीज आंख को रगड़ देते हैं, जिससे कॉर्निया में इरोज़न (Corneal Erosion) उत्पन्न हो जाता है और अल्सरेशन बढ़ जाता है, जिससे आंखों की रोशनी कम होने लगती है। इसलिए इमीडिएटली आप डॉक्टर को दिखाएं, चाहे सरकारी संस्थान में दिखाएं या प्राइवेट में दिखाएं। ऐसी स्थिति में आपका पहला काम यह है कि खुद से कोई मेडिसिन स्टार्ट नहीं करनी है।

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