श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय, देवघर का अग्रभाग
शृंखला-2 ..........
देवघर के ऐतिहासिक श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय की हालत आज एक खंडरनुमा भूतबंगले जैसी हो चुकी है। कभी देवभाषा की अलख जगाने वाले इस संस्थान में स्वीकृत 10 पदों के मुकाबले केवल 2 शिक्षक ही कार्यरत हैं, जो वेद, ज्योतिष और व्याकरण से लेकर अनिवार्य विषयों का बोझ उठाने को मजबूर हैं। विनोबा भावे विश्वविद्यालय से संबद्ध होने के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता और उपेक्षा का यह आलम इस बात का गवाह है कि झारखंड में संस्कृति के ये मंदिर किस तरह दम तोड़ रहे हैं।
मुख्य बिंदु
शिक्षकों का भारी अकाल: महाविद्यालय में शिक्षकों के 10 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 2 शिक्षक (प्रभारी प्राचार्य और एक अन्य शिक्षक) ही कार्यरत हैं।- विषयों का बोझ: वेद, ज्योतिष, कर्मकांड और संस्कृत व्याकरण के साथ-साथ हिंदी, इतिहास और अंग्रेजी जैसे अनिवार्य व वैकल्पिक विषय भी इन्हीं दो शिक्षकों को पढ़ाने पड़ते हैं।
- विवि की उदासीनता: विनोबा भावे विश्वविद्यालय (हजारीबाग) से टैग होने के बावजूद जनरल यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास संस्कृत के विकास के लिए कोई योजना या संसाधन नहीं हैं।
- दुर्लभ धरोहर: लाइब्रेरी में लगभग 4,000 बहुमूल्य पुस्तकें, वेद ग्रंथ, ताम्रपत्र, तालपत्र और पांडुलिपियां मौजूद हैं, जिनका कुछ समय पहले पुरातत्व विभाग द्वारा डिजिटलाइजेशन किया गया था।
तरुण कुमार कंचन, देवघऱ।
जब मैं श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय, देवघर के कार्यालय में पहुँचा, तो देखा कि एक संभ्रांत व्यक्ति कुर्सी पर बैठकर फोन पर कुछ आवश्यक बातें कर रहे हैं। इशारे से उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा। फोन पर बात समाप्त होने के बाद जब वे मेरी ओर मुखातिब हुए, तो मैंने अपना परिचय दिया और उनका परिचय पूछा। उन्होंने बताया कि वे श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय के प्रभारी प्रधानाचार्य हैं। उनका नाम डॉ. गोपालचंद्र झा है और वे पिछले 8 वर्षों से इस पद पर बने हुए हैं। मुझे यह जानकर भारी आश्चर्य हुआ कि इस महाविद्यालय में लगातार आठ वर्षों से प्राचार्य का पद 'प्रभारी' के ही जिम्मे है। और तब और अधिक दुःख हुआ जब यह पता चला कि पूरे कॉलेज में मात्र दो ही शिक्षक कार्यरत हैं।
आचार्य जी, आज मैं इस सड़क से गुजर रहा था। तभी मुझे श्री बालानंद संस्कृत महाविद्यालय का गेट पर नजर पड़ी। मैं ठिठक गया कि इस महाविद्यालय में गेट के अलावा और कुछ भी सही नहीं है। भवन खंड़हरनुमा भूतबंगला हो चुका है। कॉलेज परिसर में जंगल उग आए हैं। मुझे यह सूचना मिली थी कि बिहार के बंटवारे के बाद देवघर में संस्कृत विश्वविद्यलय खुलेगा। आप बता रहे हैं कि आठ वर्षों से आप यहां प्रभारी प्रधानाचार्य बने हैं। इसका क्या कारण है?
इस पर डॉ. गोपालचंद्र झा ने बताया, वर्तमान में झारखंड में व्यवस्था ऐसी ही है। इसके बारे में कुछ भी कहना कठिन है, क्योंकि झारखंड के गिने-चुने कॉलेजों को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी जगह प्रधानाचार्य प्रभारी ही हैं।
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वे प्रधानाचार्य बनने की योग्यता पूरी नहीं करते, तो उन्होंने स्पष्ट किया, किसी कॉलेज में नियमित प्रधानाचार्य बनने के लिए कम से कम 16 साल की सेवा पूरी होनी चाहिए। मैंने 2010 में यहाँ ज्वाइन किया था और शिक्षकों के भारी अभाव के कारण 2018 में मुझे प्रभारी प्रधानाचार्य बना दिया गया। मैं प्रशासनिक कार्य संभाल जरूर रहा हूँ, लेकिन तकनीकी रूप से नियमित प्रधानाचार्य नहीं हूँ।
अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए डॉ. झा ने बताया कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा देवघर के आर. मित्रा स्कूल से हुई। उन्होंने टी.एन.बी. कॉलेज, भागलपुर से संस्कृत ऑनर्स करने के बाद भागलपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (PG) किया। इसके बाद कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा से 'साहित्य आचार्य' और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से 'व्याकरण आचार्य' की डिग्री ली। तत्पश्चात, कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय से ही 2003 में पीएचडी (डॉक्टरेट) की उपाधि प्राप्त की।

महाविद्यालय की अंतरिक स्थिति
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जब मैंने कॉलेज के गेट और परिसर की बदहाली का जिक्र किया, तो डॉ. झा ने स्वीकार किया कि स्थिति सचमुच चिंताजनक है। बिहार विभाजन और झारखंड गठन के समय यह उम्मीद जताई गई थी कि इस परिसर में एक स्वतंत्र संस्कृत विश्वविद्यालय बनेगा, क्योंकि झारखंड में कोई समर्पित संस्कृत विश्वविद्यालय नहीं था। इसके बाद राज्य सरकार ने यह फैसला किया कि राज्य के सभी संस्कृत कॉलेजों को फिलहाल विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के साथ संबद्ध (Tag) कर दिया जाए, और जब पूर्ण संस्कृत विश्वविद्यालय खुलेगा तब सबको उसमें समाहित कर दिया जाएगा। वर्तमान में झारखंड में तीन अंगीभूत और तीन संबद्ध संस्कृत महाविद्यालय हैं, जिन्हें विनोबा भावे विश्वविद्यालय से जोड़ दिया गया है। वर्ष 2002 से परीक्षा, वेतन, प्रमोशन और प्रशासनिक कार्य उसी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित हो रहे हैं।
जब मैंने सवाल किया कि एक जनरल यूनिवर्सिटी संस्कृत के विशिष्ट कामकाज को कैसे संभाल रही है, तो डॉ. झा ने बेबाकी से कहा,विनोबा भावे विश्वविद्यालय सिर्फ इन कॉलेजों का प्रशासनिक संचालन कर रहा है; इसके विकास के लिए उनके पास कोई योजना नहीं है। जनरल यूनिवर्सिटी के अधिकारी संस्कृत शिक्षा के मर्म को समझ ही नहीं पा रहे हैं। संस्कृत की शिक्षा का स्वरूप अलग है। जब तक छात्र अपने आचार्य के सामने बैठकर उच्चारण, व्याकरण और शुद्धता को सीखेंगे नहीं, तब तक संस्कृत को आत्मसात नहीं किया जा सकता। झारखंड गठन के बाद से ही संस्कृत पूरी तरह उपेक्षित रही है। न तो नया सिलेबस आया है और न ही बुनियादी संसाधन। यहां अभी भी प्राचीन सिलेबस है और वार्षिक परीक्षा पद्धति।
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