शिवानंद तिवारी ने मोदी के भाषण पर उठाए सवाल
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया भाषण के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से प्रधानमंत्री के संबोधन पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे उनकी पुरानी राजनीतिक रणनीति करार दिया है। तिवारी का कहना है कि जब-जब प्रधानमंत्री राजनीतिक दबाव महसूस करते हैं, तब-तब वे स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने और विरोधियों को क्षमा करने जैसी भावनात्मक शैली अपनाते हैं।
शिवानंद तिवारी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक बार फिर यह कहा कि उन्हें और उनकी मां तक को गालियां दी गईं, लेकिन वह उन सभी को माफ कर देते हैं। तिवारी के अनुसार, यह संदेश एक साथ दो राजनीतिक उद्देश्यों को साधने की कोशिश है—पहला, खुद को उत्पीड़न का शिकार दिखाना और दूसरा, बड़े दिल वाले नेता की छवि प्रस्तुत करना।
उन्होंने दावा किया कि यह प्रधानमंत्री की कोई नई रणनीति नहीं है। तिवारी ने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए मणिशंकर अय्यर के "नीच" वाले बयान की याद दिलाई। उनके मुताबिक, उस समय भी प्रधानमंत्री ने उस टिप्पणी को अपने सामाजिक और पिछड़े वर्ग की पृष्ठभूमि से जोड़कर व्यापक सहानुभूति हासिल करने का प्रयास किया था।
तिवारी का कहना है कि प्रधानमंत्री समय-समय पर ऐसे राजनीतिक नैरेटिव गढ़ते रहे हैं, जिनसे उन्हें जनता का भावनात्मक समर्थन मिल सके।
हालांकि, शिवानंद तिवारी का मानना है कि अब देश का राजनीतिक माहौल पहले जैसा नहीं रहा। उन्होंने लिखा कि जनता अब यह सवाल भी पूछ रही है कि राजनीतिक विमर्श की मर्यादा आखिर किसने तोड़ी। उन्होंने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ अतीत में की गई विवादित टिप्पणियों, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर इस्तेमाल की गई तीखी भाषा और विपक्षी नेताओं के परिवारों तक को राजनीतिक निशाना बनाए जाने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि देश इन सबका गवाह रहा है।
तिवारी के अनुसार, ऐसे माहौल में केवल स्वयं को पीड़ित बताकर सहानुभूति हासिल करने की राजनीति पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रधानमंत्री शायद अपने राजनीतिक आधार में आई चुनौतियों को महसूस कर रहे हैं, इसलिए वह एक बार फिर उसी आजमाए हुए राजनीतिक रास्ते पर लौटते दिखाई दे रहे हैं।
अपने निष्कर्ष में शिवानंद तिवारी ने लिखा कि अब मतदाता पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुके हैं। उनके मुताबिक, जनता भावनात्मक अपील और राजनीतिक रणनीति के बीच अंतर समझने लगी है, इसलिए पीड़ित की छवि गढ़कर सहानुभूति जुटाने का यह दांव अब पहले जैसी सफलता नहीं दिला पाएगा।
