अमेरिकी टैरिफ, एच-1बी वीजा और रूस से तेल आयात को लेकर भारत पर बढ़ते दबाव के बीच रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बदलती वैश्विक राजनीति पर विश्लेषण।

 

निशिकांत ठाकुर


भारतीय पेशेवर युवाओं के लिए अमेरिकी सरकार ने एक बार फिर मुश्किलें बढ़ाने वाले प्रस्ताव पर विचार शुरू किया है। अमेरिका में नौकरी गंवाने वाले विदेशी पेशेवरों को नई नौकरी तलाशने के लिए मिलने वाली 60 दिन की मोहलत खत्म करने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। अमेरिका में भारतीय पेशेवर कामगारों की बड़ी संख्या है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन के किसी भी फैसले का भारतीय युवाओं पर व्यापक असर पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में योग्य और प्रशिक्षित पेशेवरों को दिए जाने वाले एच-1बी वीजा के लाभार्थियों में भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है।

इस प्रस्ताव का अर्थ यह होगा कि नौकरी का अनुबंध खत्म होने या किसी अन्य कारण से नौकरी जाने पर विदेशी कामगारों, खासकर भारतीय पेशेवरों, को कम समय में अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। यदि ट्रंप प्रशासन ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, तो इसका दूरगामी असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ सकता है। हालांकि, नई व्यवस्था में अमेरिका छोड़ने के लिए कितनी मोहलत दी जाएगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

दूसरी ओर, भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिकी सरकार रूस से कच्चे तेल का आयात कम करने, व्यापार नीतियों में बदलाव करने और अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को पुनर्निर्धारित करने के लिए लगातार दबाव डाल रही है। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद का हवाला देते हुए भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था। अमेरिकी सीनेट ने ‘सेंशनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ को भारी बहुमत से पारित किया है। इसमें रूस से ऊर्जा आयात जारी रखने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान है।

सरल शब्दों में समझें तो टैरिफ एक प्रकार का कर या आयात शुल्क है, जो किसी देश की सरकार दूसरे देश से आयात किए जाने वाले सामान पर लगाती है।

अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह अपने कृषि, डेयरी, पोल्ट्री और आनुवंशिक रूप से संशोधित उत्पादों के बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले। रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों और भुगतान तथा बीमा प्रणालियों में सख्ती के कारण वैश्विक स्तर पर रूसी तेल के परिवहन में बाधाएं पैदा हुई हैं। इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने भी रसद संबंधी चुनौतियां बढ़ी हैं। अब भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों को प्रभावित करने वाले एच-1बी वीजा नियमों को कड़ा करने के संकेत भी दिए जा रहे हैं।

अमेरिका ने भारत पर कूटनीतिक और आर्थिक दबाव मुख्य रूप से शीत युद्ध के दौर से ही अलग-अलग रूपों में बनाया। उस समय भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। इसके बाद 1990 के दशक में परमाणु नीति और आर्थिक सुधारों के दौर में तथा हाल के वर्षों में रूस से तेल आयात और व्यापार नीतियों को लेकर भी यह दबाव देखने को मिला है।

भारत के गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल होने और सोवियत संघ के प्रति उसके झुकाव के कारण अमेरिका असहज रहा। भारत के 1974 के पहले परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा’ के बाद अमेरिका ने परमाणु तकनीक और सहायता पर कड़े प्रतिबंध लगाए तथा भारत पर दबाव बनाया। वर्ष 1993 से 1997 के दौरान बिल क्लिंटन प्रशासन ने मानवाधिकार, परमाणु मुद्दों और आर्थिक उदारीकरण को लेकर भी भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की।

हाल के वर्षों में, विशेषकर 2025-26 के दौरान, अमेरिकी प्रशासन ने रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बंद करने या घटाने के लिए भारत पर टैरिफ और आर्थिक दबाव की नीतियां अपनाई हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की ओर से भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों और कृषि बाजारों को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने को लेकर समय-समय पर आपत्तियां और व्यापारिक दबाव सामने आते रहे हैं।

अमेरिका द्वारा व्यापारिक प्रतिबंधों, टैरिफ और सैन्य हस्तक्षेपों के जरिये डाले जा रहे दबाव पर वैश्विक प्रतिक्रिया बंटी हुई है। अधिकांश विकासशील और स्वतंत्र देश इसे एकतरफा दबाव या दादागीरी के रूप में देखते हैं, जबकि पश्चिमी देशों और नाटो की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संयमित या समर्थक रही है।

भारत ने रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ के दबाव को खारिज किया है। भारत का कहना है कि उसके लिए ऊर्जा सुरक्षा और 1.4 अरब लोगों की जरूरतें सर्वोपरि हैं। वहीं, चीन ने अमेरिकी कार्रवाइयों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन और वर्चस्ववादी नीति के रूप में देखा है। रूस ने अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव की कड़ी निंदा करते हुए इसे आधारहीन बताया है। क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों ने भी अमेरिकी नीतियों की आलोचना की है।

मध्य पूर्व के ऊर्जा-संपन्न देश अमेरिकी दबाव और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हैं। ये देश किसी भी बड़े युद्ध को टालने के लिए कूटनीति और संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ने भी एकतरफा सैन्य हस्तक्षेपों और दबाव की नीतियों पर चिंता जताई है तथा इन्हें वैश्विक शांति के लिए खतरनाक बताया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों के खिलाफ टैरिफ को आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। ट्रंप ने कई मौकों पर अमेरिका की वैश्विक शक्ति और प्रभाव को रेखांकित किया है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों को आलोचक वैश्विक सहयोग और बहुपक्षवाद के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की इस नीति से दुनिया में आर्थिक और सामरिक तनाव बढ़ सकता है।

हालांकि, अमेरिकी दबाव के सामने भारत ने झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के संकेत दिए हैं। कई अन्य देश भी ट्रंप के टैरिफ वार और अड़ियल रवैये से नाराज हैं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए भारत में शीर्ष स्तर पर विचार-विमर्श जारी है। विशेषज्ञों की सलाह है कि अमेरिका के दबाव और व्यापारिक नीतियों से निपटने के लिए भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए, आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना चाहिए तथा रूस, यूरोपीय संघ और ग्लोबल साउथ के अन्य देशों के साथ संबंधों को अधिक विविधतापूर्ण बनाना चाहिए।

भारत को अपनी विदेश और ऊर्जा नीतियों का संचालन राष्ट्रीय हितों के आधार पर करना चाहिए, न कि किसी बाहरी महाशक्ति के दबाव में। अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखते हुए रूस, यूरोपीय संघ और पश्चिम एशिया के देशों के साथ स्वतंत्र संबंध भी जारी रखने चाहिए। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों का उपयोग करते हुए वैश्विक व्यवस्था को अधिक बहुध्रुवीय बनाने पर जोर देना चाहिए।

केवल एक देश या बाजार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने की दिशा में काम करना होगा। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी, ताकि तकनीकी प्रतिबंधों का असर कम किया जा सके। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान तंत्रों को बढ़ावा देने पर भी विचार करना चाहिए।

यह मौजूदा स्थिति का एक व्यापक खाका है। हालांकि, अंतिम निर्णय भारत के शीर्ष कूटनीतिज्ञों और राजनीतिक नेतृत्व को ही करना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

 

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