21 की उम्र में बंगाल के गवर्नर पर गोली चलाने वाली वीरांगना बीना दास की प्रेरक कहानी। जानिए कैसे एक महान स्वतंत्रता सेनानी का अंत ऋषिकेश में गुमनामी में हुआ।
वरुण कुमार
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे अनगिनत वीर-वीरांगनाओं के त्याग, साहस और बलिदान से भरा है, जिन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं में से एक थीं बीना दास - वह निर्भीक क्रांतिकारी, जिन्होंने महज 21 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च प्रतिनिधियों में से एक, बंगाल के गवर्नर पर गोली चलाकर औपनिवेशिक सत्ता की नींव हिला दी थी।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और संस्कारों में मिली राष्ट्रभक्ति
बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल के कृष्णानगर में हुआ था। उनके पिता बेनी माधव दास एक प्रसिद्ध शिक्षक और ब्रह्म समाज से जुड़े समाज सुधारक थे, जो अपने विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए जाने जाते थे। उनकी माता सरला देवी ने निराश्रित महिलाओं के लिए ‘पुण्याश्रम’ की स्थापना की थी।
बड़ी बहन कल्याणी दास भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थीं। घर में शिक्षा, सामाजिक चेतना और देशभक्ति के माहौल ने बीना के मन में ब्रिटिश शासन के दमनकारी नीतियों के खिलाफ गहरा आक्रोश भर दिया था।
दीक्षांत समारोह और कांप उठी ब्रिटिश हुकूमत
6 फरवरी 1932 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बी.ए. की डिग्री लेने पहुंचीं 21 वर्षीय बीना दास ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर एक अत्यंत जोखिम भरा निर्णय लिया।
जैसे ही बंगाल के तत्कालीन गवर्नर और इंग्लैंड क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सर स्टेनली जैक्सन ने भाषण देना शुरू किया, बीना दास ने अपनी पिस्तौल निकाली और गवर्नर पर निशाना साध दिया। गोली जैक्सन के कान के पास से निकल गई और पूरे सभागार में हड़कंप मच गया। सुरक्षाकर्मी लेफ्टिनेंट कर्नल सुहरावर्दी ने उन्हें काबू करने का प्रयास किया, लेकिन बीना ने पकड़े जाने तक संघर्ष जारी रखा।
जेल की कठिन यातनाएं और अटूट निष्ठा
गिरफ्तारी के बाद बीना दास पर मुकदमा चलाकर उन्हें 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। पुलिस द्वारा दी गई कठिन यातनाओं और दबाव के बावजूद उन्होंने अपने किसी भी क्रांतिकारी साथी का नाम उजागर नहीं किया। उनका यह कदम यह साबित करता है कि क्रांति केवल हथियार उठाना नहीं, बल्कि अपने साथियों के प्रति निष्ठा बनाए रखना भी है।
आजादी के बाद का जीवन और दुखद अंत
1947 में देश आजाद होने के बाद बीना दास 1951 तक पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य रहीं। हालांकि, समय के साथ वह सार्वजनिक जीवन से दूर होती चली गईं और उनका अंतिम समय बेहद गरीबी व मुफलिसी में बीता।
सन् 1986 में ऋषिकेश में सड़क के किनारे उनका लावारिस शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान काफी समय बाद हो सकी। एक महान स्वतंत्रता सेनानी का इस तरह गुमनामी में अंत होना भारतीय इतिहास का एक अत्यंत मार्मिक और पीड़ादायक प्रसंग है।
21 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देने वाली वीरांगना बीना दास का जीवन आज भी देश की युवा पीढ़ी को साहस, संकल्प और राष्ट्रनिष्ठा की प्रेरणा देता है।
- - लेखक - लेखक एवं कवि
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