गोरखपुर में बिना लेवलिंग हो रहे सड़क-नाला निर्माण से परेशान हैं नगरवासी। डॉ. आर.एन. सिंह ने पुरानी सड़क स्क्रैप करने और वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने की मांग की।

  

गोरखपुर। सड़क और नाला निर्माण में तकनीकी योजना तथा 'लेवलिंग' (समतलीकरण) की अनदेखी को लेकर शहर के वरिष्ठ नागरिक डॉ. आर.एन. सिंह ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि विकास कार्यों का मूल उद्देश्य नागरिकों को सुविधा, स्वच्छता और सुरक्षा प्रदान करना है। लेकिन, बिना दूरदर्शिता और गलत तरीके से किए जा रहे सड़क व नाला निर्माण कई परिवारों के लिए जीवनभर की परेशानी का कारण बन रहे हैं।

 

प्राकृतिक ढाल प्रभावित होने से बढ़ा बैकफ्लो का खतरा

डॉ. सिंह के अनुसार, 30 से 50 वर्ष पहले बनाए गए अधिकांश मकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का प्लिंथ लेवल (कुर्सी का स्तर) सड़क से करीब एक से डेढ़ फीट ऊंचा रखा गया था, ताकि वर्षा जल की निकासी सुगम रहे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई स्थानों पर नालों के स्लैब का स्तर ही भवनों के प्लिंथ से एक से डेढ़ फीट तक ऊंचा कर दिया जा रहा है। इससे जल निकासी का प्राकृतिक ढाल प्रभावित होता है और बारिश तथा सीवर का पानी उलटे घरों की ओर जाने का खतरा बढ़ जाता है।

 

उन्होंने जटाशंकर स्थित हनुमान मंदिर के आसपास की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां नाले का स्तर आसपास के घरों से काफी ऊंचा दिखाई देता है। उनका कहना है कि ऐसी स्थितियां शहर के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिल रही हैं और इनके समाधान के लिए निर्माण शुरू करने से पहले सड़क, नाला और भवनों के मौजूदा स्तर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण होना अनिवार्य है।

 

बिना स्क्रैपिंग के सड़क बनाने से घट रही मकानों की कीमत

डॉ. सिंह ने सड़क मरम्मत की कार्यप्रणाली पर भी तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई जगह पुरानी सड़क को हटाए या पर्याप्त रूप से 'स्क्रैप' किए बिना ही समय-समय पर उसके ऊपर नई सामग्री डाल दी जाती है। इससे सड़क का स्तर लगातार ऊंचा होता जाता है और पुराने मकानों के प्रवेश द्वार तथा प्लिंथ सड़क के स्तर से नीचे चले जाते हैं। नतीजतन, बारिश के दौरान सड़क का पानी, कीचड़ और कचरा सीधे लोगों के घरों में प्रवेश करने लगता है।

 

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि इसका सबसे अधिक बुरा असर बुजुर्गों और बच्चों पर पड़ता है। ऊंची सड़क अथवा नाले के कारण घरों में प्रवेश और निकास कठिन हो जाता है, जिससे फिसलने और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा नाले का स्तर ऊंचा होने पर गंदे पानी के बैकफ्लो की गंभीर समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। इससे नागरिकों द्वारा अपनी वर्षों की गाढ़ी कमाई और मेहनत से बनाए गए मकानों की उपयोगिता तथा बाजार मूल्य दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

 

उत्तरप्रदेश के नियोजन मानकों और प्रोजेक्ट्स की अनदेखी

डॉ. सिंह की इस चिंता को उत्तर प्रदेश के मौजूदा नियोजन मानकों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। 'उत्तर प्रदेश मॉडल बिल्डिंग बायलॉज-2025' में ड्रेनेज सिस्टम को सड़क का एक अभिन्न हिस्सा बताते हुए पर्याप्त ढाल रखने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है, ताकि पानी बिना रुकावट स्वतः निकासी की ओर प्रवाहित हो सके। इसी तरह उत्तर प्रदेश में शहरी जल निकासी और सीवरेज से संबंधित परियोजनाओं पर भी व्यापक स्तर पर काम चल रहा है।

 

सरकारी अभिलेखों में गोरखपुर जिले में राप्ती नदी में गिरने वाले आठ नालों के इंटरसेप्शन, डायवर्जन और एसटीपी (STP) से संबंधित बड़े प्रोजेक्ट्स का उल्लेख है। डॉ. सिंह ने कहा कि जब सरकार और संबंधित विभाग आधुनिक शहरी जल निकासी की योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, तब स्थानीय स्तर पर सड़क और नाला निर्माण में लेवलिंग, ढाल और भवनों के प्रवेश स्तर जैसी बुनियादी बातों की अनदेखी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।

 

प्रशासन के समक्ष रखीं प्रमुख मांगें

डॉ. सिंह ने स्थानीय प्रशासन से मांग की है कि, रिहायशी क्षेत्रों में सड़क निर्माण से पहले पुरानी सड़क की सतह को आवश्यकतानुसार अनिवार्य रूप से 'स्क्रैप/हटाकर' ही नई सड़क का निर्माण किया जाए। नाला निर्माण से पहले सड़क, नाले और आसपास के भवनों के प्लिंथ लेवल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण (लेवल मैपिंग) अनिवार्य किया जाए।

डॉ. सिंह ने अंत में कहा कि सड़क और नाला निर्माण केवल सिविल इंजीनियरिंग का काम नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, संपत्ति और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा विषय है। इसलिए निर्माण एजेंसियों और संबंधित विभागों को तत्काल ऐसी कार्यप्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिससे आज किया गया विकास कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए समस्या न बन जाए।

 

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