देश के हाईवे और एक्सप्रेसवे पर ट्रैफिक जाम खत्म करने के लिए सरकार ला रही है 'डायनेमिक टोल' मॉडल! पीक आवर्स (व्यस्त समय) में सफर करने पर देना होगा 20% तक ज्यादा टोल टैक्स। जानिए कैसे बदलेगा फास्टैग का नियम और जनता पर क्या होगा असर। पूरी रिपोर्ट कंचनक्रांति पर।
कंचन क्रांति ब्यूरो, दिल्ली।
अगर आप रोजाना या अक्सर नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे से सफर करते हैं, तो यह खबर सीधे आपके बजट को प्रभावित करने वाली है। केंद्र सरकार देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगने वाले ट्रैफिक जाम से निपटने के लिए एक ऐसी नई व्यवस्था पर विचार कर रही है, जो आपकी यात्रा के समय के हिसाब से आपकी जेब ढीली करेगी। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नए प्रस्ताव के तहत, अगर आप व्यस्त समय (पीक आवर्स) में हाईवे पर निकलेंगे, तो आपको 20 प्रतिशत तक अधिक टोल शुल्क चुकाना पड़ सकता है। वहीं, कम ट्रैफिक वाले समय (नॉन-पीक आवर्स) में टोल दरें सामान्य या उससे कम रहेंगी।
क्या है 'डायनेमिक टोल प्राइसिंग' का यह नया फॉर्मूला?
सरकार जिस नई व्यवस्था पर मंथन कर रही है, उसे तकनीकी भाषा में डायनेमिक टोल प्राइसिंग मॉडल कहा जाता है। यह ठीक उसी तरह काम करेगा जैसे विमानों का किराया या ओला-उबर जैसी कैब कंपनियों का 'सरचार्ज' काम करता है—यानी डिमांड और ट्रैफिक ज्यादा, तो किराया भी ज्यादा।
दुनिया के कई विकसित देशों की तर्ज पर तैयार हो रहे इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य यात्रियों को अलग-अलग समय पर यात्रा करने के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि सुबह और शाम के समय एक्सप्रेसवे पर वाहनों का दबाव संतुलित किया जा सके और लोगों को जाम से मुक्ति मिले।
फास्टैग से खुद-ब-खुद कटेंगे पैसे, पायलट प्रोजेक्ट से होगी शुरुआत
विशेषज्ञों और मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था को लागू करने के लिए पूरे सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल और ऑटोमैटिक बनाया जाएगा:
फास्टैग (FASTag) से ऑटो-डिटेक्शन: अलग-अलग समय के अनुसार टोल शुल्क स्वतः (Automatically) कट जाए, इसके लिए एडवांस फास्टैग और डिजिटल टोलिंग सिस्टम का उपयोग किया जाएगा।
पहले मिलेगी टाइमिंग की जानकारी: जनता को पहले से ही यह बताया जाएगा कि किस हाईवे पर कौन सा समय 'पीक ऑवर' माना जाएगा, ताकि लोग अपनी यात्रा की प्लानिंग पहले से कर सकें।
चुनिंदा रूटों पर ट्रायल: यदि इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिलती है, तो इसे सीधे पूरे देश में थपने के बजाय शुरुआत में कुछ चुनिंदा एक्सप्रेसवे और भारी ट्रैफिक वाले नेशनल हाईवे पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा।
राहत या आफत? आम जनता और विशेषज्ञों में छिड़ी बहस
मंत्रालय के इस प्रस्ताव के सामने आते ही सोशल मीडिया और परिवहन विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। इस मॉडल को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं:
प्रबंधन का तर्क: ट्रैफिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे बड़े शहरों के एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स (जैसे दिल्ली-गुरुग्राम, दिल्ली-नोएडा या मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे) पर सुबह-शाम लगने वाले कई किलोमीटर लंबे जाम से राहत मिलेगी। लोग पीक आवर्स में निकलने से बचेंगे, जिससे ईंधन और समय दोनों की बचत होगी।
आम आदमी की चिंता: दूसरी तरफ, नौकरीपेशा और रोजाना सफर करने वाले वाहन चालकों में इसे लेकर भारी नाराजगी है। दैनिक यात्रियों का कहना है कि दफ्तर आने-जाने का समय फिक्स (सुबह 9 और शाम 6 बजे) होता है, जिसे बदला नहीं जा सकता। ऐसे में रोजाना ऑफिस जाने वालों के लिए यह व्यवस्था सीधे तौर पर उनकी जेब पर एक नया और अतिरिक्त आर्थिक बोझ साबित होगी।
कंचनक्रांति का आकलन: मंत्रालय ने फिलहाल साफ किया है कि इस योजना पर अभी सिर्फ मंथन चल रहा है और अंतिम फैसला सभी हितधारकों के सुझावों के बाद ही लिया जाएगा। लेकिन यदि यह लागू होता है, तो भारतीय सड़कों पर सफर करने का तरीका और खर्च हमेशा के लिए बदल जाएगा।
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